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जातिवादी चक्की में कब तक पिसेगा, देश

सभ्य समाज में व्यक्ति का महत्व होना चाहिए, उसके जाति का नहीं। हमारी युवा पीढ़ी को यह बात अपने ह्रदय में उतारनी होगी। भेदभाव और सामाजिक वैमनस्यता का दुष्परिणाम समाज और देश ने किस क़दर उठाया। वह किसी से छिप नहीं सका। फ़िर ऐसे में कुछ सवाल ज्वलंत रूप से खड़े होते हैं, कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद भी देश जाति और धर्म से ऊपर उठ क्यों नहीं पाया? उत्तर सीधा सा है, जनता को राजनीति ने उस स्तर तक शिक्षित और जागरूक होने नहीं दिया। जिससे उनकी राजनीतिक दुकान बंद हो सके। तभी तो देश के किसी भी कोने से कभी कोई दलित का मसीहा, तो कोई मुस्लिम का मुक़द्दर बनकर अपनी राजनीतिक गोटी साँचे में ढालने की फितरत पाल लेता है। गुमराह जनता होती है। रस कोई और पीता है। देश की युवा पीढ़ी को इस फूट डालो और राज्य करो, कि राजनीतिक बेला को अस्त करना होगा। तभी स्वस्थ और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण हो सकेगा। आज जिस वक़्त देश में 35 वर्ष से कम उम्र के लगभग 65 फ़ीसद आवाम देश में निवास करती हैं। अगर उस दौर में नित्य-नए जातिवादी संगठन का आभिर्भाव हो रहा है। तो यह सूचित करता है, कि देश ने विकास और उन्नति के नाम पर कितनी ही तरक्की कर ली हो। लेकिन वह राजनीति की गुलाम अभी भी बनी हुई है, और राजनीतिकार उन्हें जिस तरफ़ नचाना चाह रहें हैं, युवा भी उसी के गिरफ्त में उलझा हुआ है।

देश में अगर आज के वक़्त जब प्रतिभा और अपने आत्मबल पर दुनिया उन्नति की ओर अग्रसर है। उस वक़्त हमारे देश में वर्ण व्यवस्था हावी है। तो इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति द्वारा लोगों के विचारों को संकुचित करना, और लोगों को अपने अधिकार के प्रति जागरूक न होना है। यह किस धर्म में लिखा है, कि आदमी आदमी का खून करें। क्या एक सभ्य समाज की यहीं निशानी होती है? क्या ऐसे ही एक सभ्य समाज का निर्माण होगा? समाज का अर्थ क्या होता है? फ़िर उसे छिन्न-भिन्न करने की साज़िश क्यों? कहीं इस साज़िश का मकसद राजनीति साधने की तो नहीं? संविधान भेदभाव और आपसी वैमनस्य के अंत की बात करता है। फ़िर देश में दलित और सवर्ण के नाम पर राजनीति क्यों? दंगे को जाति और धर्म का चोला क्यों पहनाया जाता है। गुजरात में गरबा देखने गए युवक की हत्या, मूंछ रखने के कारण दो लोगों की पिटाई, यह किस समाज की निशानी है। यह तो नहीं हो सकता सर्व धर्म समभाव वाला देश? यह वह भी नहीं जिसमें गंगा यमुनी तहजीब निवास करती हो? यह वह देश भी नही जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया बसेरा करती हो? आज के आधुनिक युग में ऐसी स्थिति क्यों निर्मित की जा रहीं हैं, कि मानवता अपना दम मात्र जाति और धर्म के नाम पर तोड़ रहीं है। यह ऐसे में तो गांधी, अम्बेडकर और राम प्रसाद बिस्मिल के सपनों का भारत नहीं हो सकता। जिसमें मानवता का खून दलित, सवर्ण और पिछड़ी जातियों के नाम पर बहाया जा रहा है। आज के दौर का शासन और सरकारी तंत्र कहता है, कि जुर्म करने वालों को बक्शा नहीं जाएगा। ऐसे में फ़िर समझ नहीं आता, इन असमाजिक तत्वों की हिमाकत कहाँ से असामाजिक कृत्य करने के लिए बढ़ जाती है।

आज के दौर में देश सामन्ती व्यवस्था को भले ही पीछे छोड़ चुका है, लेकिन दुर्भाग्य यह है, कि जिस देश का संविधान नस्ल, भेद, जाति, धर्म और लिंग आदि से ऊपर उठकर समान नागरिकता की बात करता है। उस देश में जातिवादी जड़ें अभी भी इतनी गहरी हैं, कि सहारनपुर, दादरी जैसी घटनाएं करवा देती है। इसकी फेहरिस्त लंबी है। जिसमे मानवता तार-तार हो जाती है, औऱ राजनीति के हैसियतदार अपनी रोटियां सेंकने की बारी का इंतज़ार करने गलते हैं। फ़िर यह स्थिति बाहरी से ज़्यादा देश के अंदर के लोगों के ख़तरे से पीड़ित ज्यादा नज़र आती है। जब देश में सबके कर्तव्य और अधिकार एक से हैं। फ़िर देश में अगड़े और पिछड़ों की राजनीति क्यों? आज के समय में जिस हिसाब से मानवता को तार-तार करने की घटनाएं समाज में बढ़ रहीं है। उसे देखकर समय भी दंश से पीड़ित है। आज के दौर की सबसे बड़ी दुःख की घड़ी है, कि देश के सामने जाति, धर्म , ऊंच-नीच की राजनीति ख़त्म नहीं हुई है, बल्कि अपने पूर्व रूप से भी अधिक कट्टरता को धारण कर चुकी है। यह सही है, भारत अनेकता में एकता वाला देश है, लेकिन वर्तमान में अनेकता अधिक दिख रही है। समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों को सामाजिक, आर्थिक आंदोलन द्वारा बन्द तो किया जा सकता है। परंतु अगर इन्हें राजनीतिक संरक्षण मिले। फ़िर यह क़वायद भी मुश्किल साबित होती है। आज देश के लगभग हर हिस्से से मानवता को तार-तार करने वाली घटनाएं आ रहीं हैं। फ़िर वह छतीसगढ़ हो, ऊना हो, हरियाणा हो, या कोई अन्य प्रदेश। गुजरात का ऊना, हरियाणा का दुलीना की घटना से लोकतंत्र शर्मिंदा होकर अपने-आप पर रो रहा है, लेकिन मानवता है, कि राजनीतिक और भीड़ के प्रश्रय पर उन्मादी होती जा रहीं है। क्या यहीं इक्कीसवीं सदी का भारत है।

जिस दौर में विज्ञान नित-नए कृतिमान रच रहा है, उस दौर में हमारा देश जाति और धर्म की संकीर्ण विचारों में उलझा हुआ है। जब संविधान धर्म और उपासना की स्वतंत्रता देता है, उसके साथ व्यक्तिगत आज़ादी भी प्रदान करता है, उस स्थिति में मात्र गरबा देखने गए लोगों को देवी-देवता के नाम पर पीट कर हत्या करना और दो लोगों को मूंछ रखने पर पीटने का अधिकार आखिर समाज और व्यक्ति को किसने दे दिया? आखिर यह खतरनाक प्रवृत्ति समाज को कहां ले जाएगी? अगर राजनीति भी अपना मुँह दबाकर बैठ जाए, फ़िर इन घटनाओं की जांच-पड़ताल होना भी दूर की कौड़ी साबित होती है। राजनीति का धुर्वीकरण और विदुर्प चेहरा भी इन घटनाओं के बाद सामने आता है। राजनीतिक सिपह-सलाहकार दावा करते हैं, कि विकास की द्रुत गति इन असामाजिक बुराइयों को रौंद देगी, लेकिन वह स्थिति दिखाई नहीं पड़ती। उपलब्ध आंकड़े के मुताबिक 18 मिनट में एक दलित अपराध का शिकार होता है। क्या इसी ढ़र्रे पर चलकर देश नए भारत का सपना सँजो रहा है। अगर देश आधुनिकता की छांव में कलुषित विचारधारा के साथ परिवेश कर रहा है, फ़िर वह गांधी और आज़ादी के वीर सपूतों के सपनों का भारत नहीं हो सकता। संविधान की मूल भावना और निर्देशों को स्पष्ट रूप से धरातल पर लाना होगा, तभी देश में व्याप्त हो रहीं कलुषित विचारधारा से युवाओं को बचाया जा सकता है। उसके साथ भीड़ की जो रूपरेखा हमारे देश में पनप रहीं है, उसको काबू में लाने की लोकतांत्रिक स्तर भरसक प्रयास करना होगा, नहीं उग्र भीड़ आज किसी समाज पर हावी हो रही है, कल वह किसी दूसरे जाति-धर्म को अपना निशाना बनाएगी। ऐसे में सामाजिकता अपना अस्तित्व खो देगा। इसलिए इस खतरनाक प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। तभी सभ्य समाज का निर्माण हो सकता है। उसके साथ युवाओं को यह समझना होगा, और गहन विश्लेषण करना होगा, कि इन सब फ़सानो से देश और समाज को मिला क्या। तब कहीं जाकर इन प्रवृत्तियों को काबू में किया जा सकता है।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन
9457560896

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