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जीएसटी का मकड़जाल

जीएसटी की विसंगतियां जग जाहिर हो गई है। जीएसटी परिषद् की हर मीटिंग में करों में बदलाव देखा जा रहा है। करों में व्यापक सुधार के लिए जीएसटी लागू की गई थी मगर यह जन राहत के स्थान पर सरकार के गले का फांस बन कर रह गई है।
भारत सरकार ने जीएसटी की दरों में बदलाव कर जनता को राहत देने की एक बार फिर कोशिश की है। बताया जाता है गुजरात के चुनाव को देखते हुए राहत की यह वर्षा की गई है। हालाँकि यह अलहदा है कि संसद में जीएसटी को लागू करने के पक्ष में अपना समर्थन देकर कांग्रेस अब वादाखिलाफी पर उतर आयी है और इसे गबर सिंह टैक्स घोषित किया है। इस समय देश में नोटबंदी और जीएसटी का पोस्टमार्टम हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी सरकार और उसके विरोधियों में जंग छिड़ गई है। सरकार का मानना है कि उनके अच्छे कदमों का असर शीघ्र नहीं तो कुछ समय बाद अवश्य सकारात्मक देखने को मिलेगा।
जीएसटी काउंसिल ने हाल ही अपनी गोहाटी की बैठक में 213 उत्पादों पर टैक्स की दरें घटा दी हैं। उसने आम इस्तेमाल वाली 178 वस्तुओं को 28 फीसदी टैक्स के दायरे से हटाकर 18 फीसदी के दायरे में लाने का फैसला किया है। रोजमर्रा के इस्तेमाल की सैकड़ों वस्तुओं समेत 213 वस्तुओं के टैक्स में कमी का फैसला बुधवार से लागू हो गया है। निर्माताओं और कंपनियों ने अपने उत्पादों के मूल्य में कमी के लिस्ट चिपकानी शुरू कर दी है । इससे उपभोक्ताओं को आशा के अनुरूप लाभ मिलने लगेगा।
सरकार ने बुधवार को इन वस्तुओं पर घटे जीएसटी की अधिसूचना जारी कर दी। कई बड़े रिटेल स्टोरों ने शैंपू, डिटर्जेंट, सौंदर्य उत्पादों के संशोधित टैक्स के हिसाब से नए दामों की सूची अपने यहां चस्पा की है और कई कंपनियों ने विज्ञापन भी जारी किए हैं। इस राहत का फायदा जन साधारण तक कैसे पहुँचता है यह देखने समझने की बात है। हालांकि लोग इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि वाकई उनकी जरूरत की कई चीजें सस्ती मिलने लगेंगी। भारतीय बाजारों में किसी वस्तु का मूल्य बढ़ने के बाद फिर घटने के उदाहरण बेहद कम हैं लिहाजा सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन चीजों पर टैक्स कम हुआ है, वे उपभोक्ताओं को कम दर पर मिलें। ऐसा भी अक्सर देखा गया है कि राहत का पूरा फायदा उपभोक्ता तक नहीं पहुँचता क्योंकि निर्माता उत्पादों का मनमाना मूल्य बढ़ा देते है जिससे सरकार की मंशा पर पानी फिर जाता है और उपभोक्ता भी बाजारवाद का शिकार होकर ठगा सा रह जाता है।

बताया जा रहा है कि जीएसटी में कमी से रेस्टोरेंट और होटल मालिक खुश नहीं है। रेस्टोरेंट के मालिक खाने के मैन्यू में 10 प्रतिशत का इजाफा करने की योजना बना रहे हैं। ऐसा होने से जीएसटी में आई कमी का फायदा लेने से ग्राहक वंचित रह जाएंगे। अगर दूसरे सेक्टर के विक्रेता भी ऐसी ही योजना बना रहे हों तो फिर जीएसटी दरों में बदलाव के पीछे का मकसद व्यर्थ हो जाएगा। सच तो यह है कि जीएसटी का स्वागत होने के बावजूद इसे लेकर भ्रम का वातावरण बन गया था। इससे न तो व्यापारी ही खुश थे न ही उपभोक्ता। ग्राहकों को लगा कि उनका बजट अचानक गड़बड़ा गया है। कारोबारी टैक्स के बढ़े रेट से नहीं रिटर्न भरने की जटिल प्रक्रिया से परेशान थे। अब उनके लिए भी कई राहत की घोषणा की गई है। उन्हें फॉर्म 3-बी भरने में राहत दी गई है। अब वे इसे 31 मार्च तक फाइल कर सकते हैं। 1.5 करोड़ से कम टर्नओवर वाले कारोबारियों को 15 फरवरी तक का समय दिया गया है। कंपोजिशन स्कीम का दायरा 1 करोड़ से बढ़कर 1.5 करोड़ करने से छोटे कारोबारियों को लाभ होगा। इससे व्यापारियों का पेपर वर्क कम होगा। घरेलू आइटम सस्ते होने से घर के बजट में सुधार होगा। अभी मंहगाई के दौर में चीजें मंहगी होने से लोग बेहद परेशान है। साबुन आदि फिलहाल मार्केट में काफी मंहगे हैं। जीएसटी की कई दरें पहले बहुत ज्यादा थीं।

जीएसटी लागू करने के पीछे सोच यह थी कि विलासिता वाली वस्तु के उपभोग पर ज्यादा टैक्स लेकर जरूरत की चीजों पर जनता को टैक्स में राहत दी जाए। पिछले कुछ समय में देश में सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए हैं । जिन्हें विलासिता की वस्तु कहा जा रहा है दरअसल वे मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के इस्तेमाल की भी चीजें हो गई हैं। यह वर्ग सिर्फ जीवन की बुनियादी चीजों के सहारे नहीं जीता। उसे और भी बहुत कुछ चाहिए। जीएसटी के मकड़जाल को अब तक व्यापारी वर्ग भी पूरी तरह समझ नहीं पाया है और न ही यह जनता के गले उत्तर पाया है ,आम आदमी को जिस राहत की बात कही गई है उसका फायदा अब तक उपभोक्ता को नहीं मिल पाया है और यही कारण है की लोग आज भी जीएसटी को लेकर भ्रम में है। सरकार को चाहिए की भ्रम के इस मकड़ जाल को तोड़ कर जीएसटी की मंशा और भावना के अनुरूप जनता को त्वरित लाभ का मार्ग प्रशस्त करें।
सच्ची बात तो यह है कि नोटबंदी, जीएसटी, फर्जी कंपनियां, कालाधन आदि पर हर जगह चर्चा का बाजार गरमाया हुआ है। मगर उन गरीबों के वास्तविक हालात पर चर्चा नहीं हो रही है, जिनके नसीब में दो जून रोटी भी नहीं। जिन गरीबों को भूख सता रही है उनकी आर्थिक स्थिति को केन्द्र मानकर बहस नहीं हो रही है। जब तक गरीब परिवारों की स्थिति में सुधार नहीं होगा तब तक जीएसटी या अन्य कोई टैक्स या राहत की बात बेमानी होगी। जीएसटी को गरीबोन्मुखी बनाकर हम समाज के पिछड़े और गरीब गुरबों को लाभान्वित कर सकते हैं ।

लेखक वाणिज्य एवं अर्थशास्त्र की व्याख्याता है

डॉ मोनिका ओझा
134 गुरु नानक पुरा, राजा पार्क
जयपुर – 302004 राजस्थान

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