National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

डिजिटलाइजेशन से संभव है भ्रष्टाचार पर रोक

सरदार पटेल की जयंति 31 अक्टूबर से एक बार फिर देश में सतर्कता जागरुकता सप्ताह पूरे धूमधाम लंबे चैड़े भाषणों, संकल्पों और सेमिनार आयोजित कर मनाया गया हैं। एक सप्ताह तक केन्द्र व राज्य सरकारों और इनके उपक्रमों में आयोजनों का दौर चला, एक से एक भाषण हुए और भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने का संकल्प हुआ। इसके साथ ही रिश्वत नहीं लेेने और नहीं देने की शपथ ली गई। यह अंतहिन सिलसिला अनवरत रुप से देश में चला आ रहा है। पर संतोष की बात यह है कि देश को इन दो ढ़ाई सालों में किसी बड़े घोटाले या स्केण्डल से दो चार नहीं होना पड़ा। यह अपने आप में बड़ी और संतोष की बात इसलिए हो जाती है कि एक समय था जब आए दिन घोटालें ही देश के मीडिया की शुर्किया बनते रहते थे। दरअसल डिजीटलाइजेशन पर जोर होने से भ्रष्टाचार पर बहुत कुछ रोक संभव है। काम में देरी ही भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण बनता है। समय सीमा में काम होने लगे तो किसी को गलत तरीके अपनाना ही नहीं पड़े। एक खास बात यह कि लाख विरोध के बावजूद आॅनलाइन लेन-देन या यों कहे कि आॅनालाईन भुगतान से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। डिजिटल भुगतान से पारदर्शिता आई है। यही कारण है कि सरकार लगातार डिजीटल भुगतान को प्रोत्साहित कर रही है। नोटबंदी और जीएसटी से इसे और अधिक बढ़ावा मिला है। सरकारी योजनाओं में सब्सिडी का सीधे खातों में हस्तांतरण के प्रभाव साफ दिखने लगे हैं। लाखों की संख्या में फर्जी पेंशन या अन्य सुविधा लेने वाले ना केवल चिहिंत हुए हैं अपितु सिस्टम से बाहर भी हुए हैं। एक लाख से अधिक मुखोटा कंपनियों की पहचान और उन्हें डीरजिस्टर्ड करने की पहल संभव हो सकी है।  हांलाकि देश में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के फरवरी 1964 में गठन के साथ ही भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने का संकल्प किया गया। सतर्कता आयोग को 1998 से संवैधानिक दर्जा भी दिया गया। एक की जगह 3 सदस्यीय आयोग बन गया। केन्द्रीय व राज्य सतर्कता आयुक्तों की नियुक्ति के साथ ही केन्द्र व राज्य सरकारों के कार्यालयों व उपक्रमों में मुख्य सतर्कता अधिकारियों की नियुक्ति होने लगी है। हांलाकि ट्र्ांसपरेंसी इन्टरनेशनल की रिपोर्ट में कोई विशेष सुधार नहीं हो पाया है।  सूचना का अधिकार,सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार पर नजर रखने के लिए सतर्कता आयुक्तों की व्यवस्था, प्रतिवर्ष 31 अक्टूबर से सतर्कता दिवस, सप्ताह, पखवाड़ों का आयोजन, भ्रष्ट आचरण न करने की शपथ और भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना या बाबा रामदेव जैसे आंदोलनों के बावजूद भ्रष्ट देशों की सूची में अभी हमारा देश काफी आगे हैं। पिछले दिनों ट्रान्सपरेन्सी इन्टरनेशनल द्वारा बर्लिन में जारी 176 देशों की सूची के अनुसार भारत अब 79 वीं नंबर पर है। दूसरी तरफ न्यूजीलैण्ड और डेनमार्क पहले नंबर पर है। दूसरे शब्दों में न्यूजीलैण्ड व डेनमार्क में भ्रष्टाचार लगभग नहीं के बराबर है। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में भ्रष्टाचार पर अंकुश पहली आवश्यकता बन गई है। देखने की बात यह है कि अब देश में भ्रष्टाचार का तरीका भी बदलने लगा है। एक समय था जब सरकारी कार्यालय भ्रष्टाचार के गढ़ माने जाते थे, पर अब उसका स्थान संस्थागत भ्रष्टाचार लेता जा रहा है। पहले दफ्तरों में रिश्वत बड़ी बात मानी जाती थी, इसके बाद भ्रष्टाचार के नए केन्द्र के रूप में स्पेक्ट्रम, गेम्स, रियल स्टेट या अन्य इसी तरह के केन्द्र सामने आए, जिसमें भ्रष्टाचार का वॉल्यूम भी अधिक देखने को मिला, पर नोटबंदी और जीएसटी के साथ ही डिजीटल भुगतान ने भ्रष्टाचार के इन नए माध्यमों पर कमोबेश अंकुश लगाने में सफलता प्राप्त की है। अब बैंक खातों के आधार से लिंक और धीरे धीरे आधार की अनिवार्यता से स्थिति में सुधार माना जा सकता है। पर इस सबके बाद भी समाज मेें आय के क्षेत्र में लगातार बढ़ता गेप आर्थिक विसमता का कारण बनने लगा है और इसका दुष्परिणाम सामने आने में है। आर्थिक विश्लेषकों द्वारा विकास दर को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है तो इस चिंता से भ्रष्टाचार पर रोक की चिंता को जोड़ लिया जाए तो निश्चित रूप से विकास दर को बढ़ाया जा सकता है अपितु विकास दर में बिना कुछ अतिरिक्त किए ही दो से ढ़ाई प्रतिशत की वृद्धि अर्जित की जा सकती है। दरअसल भ्रष्टाचार के कारण निवेश का माहौल भी खराब होता है। निवेशक निवेश के समय अपनी सुविधाएं देखता है, निवेश का माहौल देखता है, आधारभूत सुविधाएं चाहता है और यह चाहता है कि उसका निवेश अनावश्यक रूकावटों की भेंट तो नहीं चढें। हांलाकि केन्द्र और उसकी पहल पर अब राज्य सरकारों द्वारा निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए एकल विण्डों और अन्य कदम उठाए जा रहे हैं। यहां तक की इस तरह का सिस्टम बनाया जा रहा है जिसमें सीधे आॅनलाईन ही आवेदन से लेकर स्वीकृति तक की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सके। इसकी नियमित मोनेटरिंग भी हो रही है पर अभी तक आशाजनक परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं। इज आॅफ डूइंग मेें 100 देशों में भारत का शुमार होना शुभसंकेत माना जा सकता है।  इस सबके बावजूद हमें यह स्वीकारना होगा कि राज्यों में मुख्य सतर्कता आयुक्तों के साथ ही कमोबेस सभी सरकारी कार्यालयों में सतर्कता आयुक्तों की व्यवस्था अपना असर नहीं दिखा पाई है। सर्तकता दिवस पर संदेश जारी हो जाता है, सतर्कता सप्ताहों, पखवाड़ों का आयोजन हो जाता है पर संभवतः केन्द्रीय मुख्य सतर्कता आयुक्तालय या किसी सतर्कता आयुक्त द्वारा स्वप्रेरणा से भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया हो, ऐसा उदाहरण अभी सामने नहीं आया है। राज्यों में लोकायुक्त जॉंच होती भी है तो उस पर ठोस कार्यवाही नहीं दिखती।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार भ्रष्टाचार के प्रति सजग है और देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए वचनवद्ध भी है। अच्छी बात यह है कि पिछले दो तीन सालों में केन्द्र ही नहीं किसी राज्य में भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने व्यवस्था को पारदर्शी बनाने पर जोर दिया है। सही भी है कि समय पर पारदर्शी तरीके से काम होने लगे तो भ्रष्टाचरण ही नहीं अन्य कई समस्याओं से निजात पाई जा सकती है। काम में देरी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। सही समय पर काम हो तो आमजन का विश्वास जमता है। अब आम जन में भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध खुलकर आवाज उठने लगी है, ऐसी स्थिति में समय रहते ठोस प्रयास करते हुए सार्वजनिक जीवन में शुचिता लानी होगी। भ्रष्टाचार के मामलों के उजागर होने पर उनसे सख्ती से निपटना ही होगा। कमोबेश यह सकारात्मक पक्ष यह है कि देश में भ्रष्टाचार व कदाचार को लोग निशाने पर लेने लगे हैं। इससे भ्रष्टाचार का मीटर धीमे चलने लगा है। अंततोगत्वा इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए जीरो टोलरेंस को अमली जामा पहनाना ही होगा।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar