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डिजिटल बाजारबाद के आइने में बलरामुखी !

ओडिशा से इंसानी रिश्तों को बेजार करने करने वाली एक खबर आयी है। जिसमें भद्रक जिले का रहने वाले बलराममुखी ने मोबाइल और शराब की लत पूरी करने के लिए अपने 11 माह के एक बेटे को तेइस हजार रुपये में बेंच दिया। इस पर उसकी पत्नी ने भी प्रतिरोध नहीं जताया। दो हजार रुपये उसने मोबाइल खरीदने पर खर्च किया जबकि बाकि पैसे की शराब उड़ा दिया। जबकि सात सौ रुपये का पायल उसने अपनी इकलौती बेटी के लिए खरीदा। पुलिस उसे गिरफतार कर पूछताछ कर रही है। हलांकि देश और दुनिया में इस तरह की घटनाएं आम हैं। लेकिन इसकी मूल में शून्य होती मानवीय संवेदना और आर्थिक विषमता मुख्य वजह है। साल भर पूर्व चीन की राजधानी पेइंिचंग के एक युवक ने आईफोन की शौक पूरी करने के लिए अपनी 18 दिन की बेटी को सोशल नेटवर्किंग साइट पर दो लाख से अधिक कीमत में बेंच दिया था। इसकी वजह उसकी नाबालिग पत्नी थी जिसने पार्ट टाइम जाब और स्कूलिंग के लिए ऐसा कदम उठाया था। राजस्थान में 2013 में जुर्माना भरने के लिए एक पिता ने अपनी बेटी का सौदा किया कर डाला था। इसी साल मार्च 2016 में इंदौर के खरगौन जिले में एक व्यक्ति ने अपना कर्ज चुकाने के लिए पत्नी को बेंचने का विज्ञापन फेसबुक पर लोड़ किया था। हैदराबाद में पैसे की लालच में दुबई के शेखों को लड़कियों को बेंचना कभी आम बात थी। इस तरह की घटनाएं एक, दो चार नहीं हजारों में हैं। रिश्तों को दांव लगाने, बाजर में नीलाम करने का रिवाज आखिर कहां से आया। इस पर भी गौर करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। महाभारत काल में भी पांडवों ने महारानी द्रौपदी को चैसर में पराजित होने के बाद अंतिम दांव पर लगा लगा दिया था। जिसकी परिणति महाभारत का यु़द्ध रहा। हमारे समाज और इंसानी रिश्तों की जाने यह कैसी बिड़ंबना है। एक तरफ गुड़गांव के रेयान इंटरनेशल स्कूल में मासूम प्राद्युम्न की हत्या से जहां पूरा देश स्तब्ध है। बेटे को न्याय दिलाने के लिए मां-बाप सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जबकि इसी समाजिक तानेबाने और इंसानी संबंधों का दूसरा पहलू यह भी है कि कर्ज चूकाने, शौक पूरी करने के लिए एक पिता, पति बेटी और बेटों अपनी पत्नी को कौड़ियों के भाव नीलाम कर रहा है। हमारी सामाजिक संरचना और मानवीय संवेदना की यह कितनी वकट त्रासदी है, हम कह नहीं सकते हैं। यह डिजिटल क्रांति की अकुलाहट या सिर्फ गिरते सामाजिक मूल्यों की एक घिनौती तस्वीर। 

यह कोंसने का नहीं सोचने का वक्त है। हम किसी सरकार, व्यक्ति, व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते हैं। सच तो यह है कि हम जिस आर्थिक, समाजिक विकास एंव समता, समानता की बात करते हैं वह बेहद खोखली है। हम देश को सिर्फ नारों से चलाने के आदि हो गए हैं। हमारी सोच में सिर्फ राजसत्ता दिखती है राजधर्म हासिए पर है। एक विजय के बाद हम दूसरी की तैयारी में लग जाते हैं, हमने यह कभी गौर करने की जहमत नहीं उठायी कि जनता से जो वायदे किए थे क्या उस पर खरे उतरे हैं ? सबको समान विकास के अवसर उपलब्ध कराने की जुमलेबाजी हमें बंद करनी होगी। सोच अच्छी रखना, नीतियां बनाना बुरी बात नहीं है, लेकिन वास्तविक जमींन पर उनकी परिणति कितना हुई है इसकी भी समीक्षा जरुरी है। हमें आलोचनाओं की परवाह करने के बजाय संभावनाओं की पड़ताल करनी चाहिए। यह तथ्यगत है कि सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन होगी यह संभव नहीं है। विकास और सूचना प्रद्यौगिकी की पहुंच अभी तक आम आदमी तक नहीं पहुंच पायी है। हमारे लोगों के पास इतने रोजगार के अवसर मुहैया नहीं है कि लोग अपनी आम जरुरतों का शौक आसनी से पूरा कर पाएं। उन्हें बलराममुखी जैसे लोगों की तरह अपने बेटे को बेचना पड़ रहा है। स्वाधीन भारत के इतिहास में गरीबी मिटाने पर खूब रिहर्सल हुआ लेकिन गरीबी आज तक नहीं मिट पायी। आर्थिक विसंगति और सामाजिक विसमता की खाई और चैड़ी होती गयी। हम लोगों के हाथ में काम भले नहीं दे पाए लेकिन दारु की बोतलें पकड़ा, उन्हें जिंदगी तबाह करने और समाज में विकृतिया पैदा करने का अधिकार जरुर दे दिया। अब शराबबंदी और दूसरी चोंचलेबाजी कर पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन बलराममुखी जैसे लोगों की त्रासदी का क्या होगा। उस पर भी कभी हमने गौर करने की सोची जो एबुलेंस के अभाव में पत्नी का शव कंधे पर रख 40 किमी का सफर तय करता है। मेरे जेहन में कभी वह दशरथ मांझी भी आया जिसने रास्ते के अभाव में पहाड़ को काट सड़क बना दिया। क्या ऐसी बिडंबनाओं और विषमताओं को लक्ष्म इस तरह के दुर्गम इलाकों में सड़क बनाने का काम किया। हलांकि जिस शख्स ने बच्चा खरीदा, वह कानून रुप से गुनाहगार जरुर हो सकता है। लेकिन उसने अपनी पत्नी की खुशी के लिए उस बच्चे को खरीदा। क्योंकि कुछ साल पहले उसका बेटा मर गया था और पत्नी डिप्रेशन का शिकार हो चली थी, जिसे बचाने के लिए उसने बच्चा खरीदा। हलांकि उसने कानून को हाथ में लिया। जितना गुनाह मासूम बच्चे को बेचने वाले पिता बलराममुखी का है उससे कम खरीदने वाले शोमनाथ भारती का नहीं है। लेकिन उसका उद्देश्य गलत नहीं था, कम से कम वह मुखी से कहीं अधिक बेहतर ढंग से उसका पालन पोषण करता। लेकिन इस तरह की गैर कानूनी और असंवैधानिक छूट किसी को दी भी नहीं जा सकती है। क्योंकि इससे सामाजिक व्यवस्था बिगड़ने का बड़ा खतरा है। इसके लिए हमारे समाज में गोद जैसी कानूनी प्रथा है।
हलांकि इस घटना के बाद कई सवाल भी पैदा हो रहे है कि बलराम मुखी वास्तव अगर मोबाइल का शौकीन था, तो उसने मोबाइल पर सिर्फ दो हजार रुपये ही क्यों खर्च किए। उसके पास और अधिक पैसे थे, लेकिन वह सारे पैसे अच्छे स्मार्टफोन पर खर्च करने के बजाय शराब पर उड़ा दिये। इससे यह साफ जाहिर होता है सेलफोन एक बहाना था, वह शराब का इतना आदती चुका था कि आर्थिंग तंगी के अभाव में उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था जिसकी वजह से उसने इस तरह का अमानवीय कदम उठाया। लेकिन इस तरह की घटनाएं हमारी समाजिक व्यवस्था के लिए काला कलंक हैं। सरकार और समाज को इस पर मिलकर काम करना होगा। जिससे सामाजिक विकृतियां पैदा करने वाली ऐसी स्थितियों पर प्रतिबंध लगाया जा सके। इसके लिए सरकार, समाज और दूसरी कड़ियों को एक साथ मिल कर काम करना होगा। हम घटनाओं पर सिर्फ राजनीति कर, सरकारों को कटघरे में खड़ा कर स्थितियां नहीं बदल सकते हैं। इसके लिए खुद को बदलना होगा। तभी देश, बदलेगा, समाज बदलेगा और लोग बदलेंगे।

प्रभुनाथ शुक्ल

लेखकः स्वतंत्र पत्रकार हैं

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