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डोकलाम विवाद का शांतिपूर्ण हल मोदी सरकार की बड़ी सफलता

अजीत डोभाल के चीन दौरे से पिघलना शुरू हुई थी बर्फ

दो महीने से ज्यादा चले डोकलाम विवाद का आज अंत हो गया है और दोनों देशों में यह सहमति बनी है कि दोनों देश अपने सभी विवाद बातचीत के जरिए सुलझायेंगे। चीन लगातार इस बात पर अड़ा हुआ था कि भारतीय सैनिकों की वापसी के बिना बातचीत संभव ही नहीं है लेकिन भारत बार-बार जोर देकर यह
कहता रहा कि बातचीत से ही मुद्दा सुलझेगा। चीन का रूख आक्रामक था लेकिन भारत की तरफ से संयमित टिप्पणियाँ ही सामने आईं हैं। भारत की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि भारत विश्व समुदाय को समझाने में कामयाब रहा है कि चीन धौंस के बल पर पिछले समझौतों का उल्लंघन कर जबर्दस्ती सीमा
विवाद पैदा कर रहा है। विश्व समुदाय की तरफ से भारत के रूख को सराहा गया और अमेरिका, जापान, इजरायल सहित कई देशों ने चीन को सलाह दी कि बातचीत से वह अपना मुद्दा सुलझाये और अंतत: चीन को मानना पड़ा। दरअसल 3 से 5 सितंबर तक चीन में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का शियामेन में
आयोजन किया जाएगा और डोकलाम विवाद के चलते अब तक यह साफ नहीं हो पाया था कि प्रधाननमंत्री नरेन्द्र मोदी इसमें भाग लेंगे या नहीं लेकिन अब अनुकूल माहौल में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर डोकलाम की छाया नहीं पड़ेगी और अनुकूल माहौल में सम्मेलन सम्पन्न होगा। इस मुद्दे को
शांतिपूर्वक सुलझाने और दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, सुषमा स्वराज और विदेश सचिव की भूमिका सराहनीय रही है, जिसके कारण विवाद का शांतिपूर्ण हल संभव हो सका है।
दरअसल अगले ही साल चीन में चुनाव होने हैं और चीनी कम्पनियां का अरबों-खरबों रूपयों का निवेश भारत में लगा है. ऐसे में चीन ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहता जिससे उसकी बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था का डूबने की स्थिति बने। इस विवाद से बर्फ पिघलनी तब शुरू हुई थी जब इसी माह भारतीय राष्ट्रीय
सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने चीन का दौरा किया था और अपने समकक्ष यांग छी से डोकलाम समेत कई अन्य मुद्दों पर बातचीत की थी। भारत को उम्मीद थी कि बातचीत से मुद्दा हल हो जायेगा। हालांकि 1962 की भूल से सबक लेकर भारत पूरी तरह चौकन्ना था और हर तरह से चीन का मुकाबला
करने को तैयार था, लेकिन भारत का ज्यादा जोर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के समक्ष अपनी बात रखने और राजनायिक वार्ता के जरिए मुद्दा सुलझाने पर था। चीन का सरकारी मीडिया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के दौरे से कोई समाधान न निकलने का उम्मीद जता रहा था जबकि सोशल मीडिया एवं
दूसरे मीडिया संस्थान उनकी चीन यात्रा से समाधान निकलने का उम्मीद जता रहे थे और भारतीय मीडिया ने भी उनके चीन दौरे से कोई हल निकलने की उम्मीद जतायी थी। भारत ने बार-बार दोहराया है कि 1998 और 2012 के समझौते का चीन को आदर करना चाहिए और साफ किया था कि यदि चीन के
सैनिक पीछे हटेंगे तो भारत के सैनिक भी वापस पीछे हट जाएंगे। आज यह तय हो गया है कि भारत और चीन के सैनिक पीछे हटेंगे और एक-दूसरे की चिंताओं को समझते हुए सभी मुद्दों को शांतिपूर्वक हल किया जायेगा।
डोकलाम विवाद की छाया चीन के साथ हुए अन्य समझौतों पर भी पड़ने लगी थी और इस साल चीन ने अब तक ब्रह्मपुत्र और सतलुज नदी के पानी से जुड़े आंकड़े भारत के साथ साझा नहीं किए हैं। दोनों देशों के बीच 2006 में एक संधि हुई थी और इस संधि के तहत चीन हर साल मॉनसून के दौरान इन
दोनों नदियों का हाइड्रोलॉजिकल डेटा भारत को देता आया है। लेकिन इस साल इस संधि का उल्लंघन करते हुए चीन ने अभी तक इन दोनों नदियों में पानी की उपलब्धता से जुड़े आंकड़े भारत को नहीं दिए हैं। इसके नतीजा के फलस्वरूप पूर्वी व उत्तर-पूर्वी भारत के कई जिले बाढ़ का अनुमान लगाने में विफल
रहे और व्यापक इंतजाम न होने के कारण ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने खुलासा किया था कि चीन पिछले तीन महीने यानी मई से ही वाटर डाटा साझा नहीं कर रहा है। इससे पहले दोनों देश पानी के बारे में आंकड़े साझा करते रहे हैं। चीन द्वारा आंकड़ा साझा नहीं करने
और कितना पानी तिब्बत से निकलने वाली नदियों में छोड़ा जा रहा है, इसकी जानकारी नहीं देने से बिहार-बंगाल समेत भारत के पूर्वोत्तर इलाके में इन दिनों बाढ़ आई हुई है। चीन ने भारत आने वाली नदियों पर चुपचाप कई बांध बना रखे हैं जो भारतीय भौगोलिक क्षेत्र के लिए खतरा हैं। दरअसल, चीन के पास तिब्बत एक बड़ा हथियार है। तिब्बत, पानी और कीमती धातुओं सहित प्राकृतिक संसाधनों का खजाना है और चीन के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा औजार है। तिब्बत के विशाल पठार से ही एशिया की अधिकांश बड़ी नदियां निकलती हैं, जो भारत समेत अन्य देशों में बहती हैं। भारत की तीन बड़ी नदियां तिब्बत से निकलती है। पहली सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र है, जिस पर चीन ने कई बांध बना रखे हैं। 2700 किलोमीटर लंबी यह नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश और असम होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। अगर चीन ब्रह्मपुत्र पर बने बांध को खोल देता है तो पूर्वोत्तर भारत में जल प्रलय से गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। दूसरी बड़ी नदी सतलुज है, जो तिब्बत से निकलकर हिमाचल प्रदेश और पंजाब से गुजरते हुए पाकिस्तान में सिंधु नदी की सहायक नदी बन जाती है। इसी पर भाखड़ा और नंगल डैम बने है। तीसरी नदीं सिंधु है जो कश्मीर होते हुए पाकिस्तान में जाकर बहती है और अरब सागर में मिलती है। अगर चीन ने इन नदियों पर बने बांध को खोल दिया तो उत्तरी भारत के कई राज्यों में जल प्रलय आ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन इन नदियों पर बने बांध खोल दो तो पंजाब जलमग्न तो होगा और भाखड़ा डैम भी ठप्प हो जाएगा।

इससे पहले भी कई बार भारत और चीन की फौजें आमने-सामने आयी हैं। 1967 में चीन के साथ लड़ाई हो ही गई थी और उसमें काफी जानें गईं थीं। लेकिन भारतीय सेना ने चीन को सिक्‍किम क्षेत्र से पूरी तरह खदेड़ दिया था। चीनी सैनिक से सिक्‍किम को खाली करा लिया गया था। उसके बाद ही सिक्‍किम
भारत में शामिल हुआ था, लेकिन साल 1975 में सिक्‍किम को राज्‍य का दर्जा दिया गया था। इसके बाद 1986 में सुमदोरोंग चू में करीब दो लाख भारतीय सैनिकों को तैनात किया गया था। चीन की सेना से आमना-सामना हुआ था। लेकिन उस समय हिंसा नहीं हुई थी। लेकिन दोनों देशों की सेनाओं के बीच
30 साल से कोई गोली नहीं चली है। उसके बाद ली कछियांग 2013 में और 2014 में शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान भी चीनी सैनिकों ने सीमा पर पड़ाव डाला था। हालांकि बाद में बातचीत से मामला हल कर लिया गया था। छोटी-मोटी कई घटनाएं हुई हैं लेकिन उसमें कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया
है। अब जब भारत-चीन में आम सहमति बन गई है कि दोनों देशों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए कोई ठोस समाधान निकाला जायेगा और सभी मुद्दों का शांतिपूर्वक बातचीत से हल निकाला जायेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि चीन अपने पड़ोसी देशों के साथ सौहार्दपूर्ण माहौल बनाने की कोशिश करेगा और पूर्व
व भविष्य में होने वाले समझौते पर अमल करेगा।

विजय शर्मा
430, ए, नानकपुरा, हरि नगर
दिल्ली-110064

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