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तीखी मिर्च: ‘मैं भी चैकीदार हूं’ की भेड़ चाल

वर्तमान में राजनीति को भेड़ चाल का चोला पहनाया जा रहा है। एक आगे-आगे चला नहीं कि सारे उसके पीछे, चाहे गड्ढे में न गिर जायें। नेताजी ने बोल दिया कि ‘मैं चैकीदार हूं’, तो सब बन गये चैकीदार। सोशल मीडिया में सभी ने पोस्ट कर दिया ‘मैं भी चैकीदार’। अपने घरों को तो ढंग से देखा नहीं जाता, चले चैकीदार बनने। चुनाव जीतकर केवल अपनी विधानसभा को विकास दे नहीं सकते, चले हैं देश का चैकीदार बनने। अगर सभी नेता चैकीदार ही बनना चाहते हैं तो फौज में भर्ती हो जाओ। तब पता चलेगा कि चैकीदार क्या होता है और चैकीदारी करना क्या होता है। ट्रैफिक पुलिस बनकर सड़कों पर यातायात की ही चैकीदारी करके देख लो। सिर्फ ‘मैं भी चैकीदार’ बोलने से और सोशल मीडिया में पोस्ट करने से बदलाव नहीं आयेगा।
चैकीदारी का इतना ही शौक है तो तब कहां थे, जब मुंबई सीरियल ब्लास्ट हुये थे। कोयम्बटूर धमाके के वक्त कुम्भकरण की नींद क्यों सो रहे थे इतने चैकीदार। जैश ए मोहम्मद ने जम्मू कश्मीर विधानसभा में हमला किया, तब क्यों नहीं सामने आये इतने चैकीदार। संसद पर हमला हुआ, अक्षरधाम मंदिर में हमला हुआ, इन दिनों चैकीदार छुट्टी पर थे क्या? दिल्ली में दिवाली से दो दिन पूर्व सीरियल बम ब्लास्ट हुये। दीवाली के खुशियों के पटाखों से पहले बम के धमाकों से रक्त की नदियां बहीं। इन दिनों किसी को याद नहीं आई कि ‘मैं भी चैकीदार’ पोस्ट कर दूं। मुंबई ट्रेन धमाके, जयपुर विस्फोट, असम में धमाके, 26/11 का आतंकी हमला और पठानकोट हमला हुआ। न जाने हमारे देश में कितनी बार रक्त की नदियां बहीं। लेकिन किसी भी चैकीदार को होश नहीं था, बस राजनीति की गद्दियां ही गर्म की जा रहीं थीं। रोते हुये देशवासी, लोगों की मौत और सैनिकों की शहादत पक्ष-विपक्ष में बहस का मुद्दा बनी है। लेकिन तब चैकीदारी का किसी को ख्याल नहीं।
बेहिसाब चैकीदारों के सामने हमारे देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई जा रही है। हमारे देश वाले हमारा धन लूटकर रफू-चक्कर हो रहे हैं और चैकीदार आंखें खोलकर सो रहे है। न हत्यायें रूक रहीं है, न बलात्कार, न लड़ाई-झगड़े कम हो रहे हैं, न चोरी-डकैती। गाय को अब भी काटा जा रहा है। धर्म-जाति में अब लोगों में लड़ाई है। क्या कर लिया इतने चैकीदारों ने, सोशल मीडिया में लिख देने से चैकीदारी नहीं होगी। मीटू का हैसटैग पाॅप्यूलर हुआ तो सोशल मीडिया में सभी मीटू-मीटू में लग गये। चायवाला टैगलाईन बन गया तो सारे चायवाले खुश और बचे-कुचे भी बन गये चायवाला। टैगलाईन और हैसटैग को फाॅलो करने में सभी को मजा आता है। अभी ‘नकलची बंदर’ होने की ताजा-तरीन टैगलाईन आई है। सोशल मीडिया में नज़र नहीं आया कि ‘मैं भी नकलची बंदर हूं’।
राजशाही की ऐंठ में जब कोई मंत्री पद को खुद के लायक न समझता हो। वही, अगर फेसबुक में ‘मैं भी चैकीदार’ पोस्ट करने लगें, तो हास्यास्पद स्थिति तो बनती ही है। जो अभी चैकीदारी कर रहा है, उसे ही करने दो। भेड़ चाल चलने से चैकीदार नहीं बदल जायेगा। चुनाव की चैकी का द्वार भी खुलेगा और उस द्वार के अंदर जनता भी होगी। बहरहाल, काशी हो या किच्छा, सब है जनता की इच्छा। चुनाव की चैकी के द्वार से कौन चैकीदार बनकर बाहर आता है।

राज शेखर भट्ट
83/1, बकराल वाला, देहरादून ;उत्तराखण्डद्ध
8859969483
Email : [email protected]

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