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तेल ने लगाई अच्छे दिनों को आग

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का फायदा आम जनता तक नहीं पहुंच रहा है। देश में लगातार बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दाम से समाज का हर वर्ग दुखी और परेशान है। 2014 के मुकाबले कच्चे तेल की कीमतें लगभग आधी हो जाने के बावजूद भी पेट्रोल और डीजल के दाम घट नहीं रहे हैं। आखिर 31 रुपये का तेल आम जनता को करीब 70 से 79 रुपये प्रति लीटर क्यों बिक रहा है? इसका सीधा जवाब है- मोदी सरकार द्वारा लगाए गए टैक्सों के कारण। दूसरी तरफ मोदी सरकार का कहना है कि भारत को आधारभूत ढांचे के विकास के लिए पैसा चाहिए इसलिए वो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होने का लाभ ले रही है। मोदी सरकार ने तेल पर अतिरिक्त टैक्स लगाया है जिसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत कम होने के बावजूद भारत में कीमत कम नहीं हो रही है। आज की स्थिति की निष्पक्ष होकर समीक्षा करें तो सरकार मालामाल हो रही है और जनता कंगाल। आम उपभोक्ता आज भी महंगाई की बेरहम मार से पीड़ित है। आम उपभोक्ता वस्तुओं के भाव आसमान पर हैं और जनता धरती पर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए यह अवधि सुकून भरी है। कच्चे तेल की कीमतें हाहाकार की स्थिति से नीचे आकर धीरे-धीरे सरकार की पकड़ में आने लगी हैं। मगर कीमतों में गिरावट का पूरा फायदा सरकार आम जनता को नहीं दे रही है। इसमें सरकार के अपने हित निहित है। जनता चाहती है कि कच्चे तेल के भावों में गिरावट का उसे पूरा फायदा मिलना ही चाहिये। मगर स्थिति अनुकूल होने के बावजूद ऐसा नहीं होने से जनता में भारी आक्रोश उत्पन्न हो रहा है। अच्छे दिनों के इंतजार को तेल पलीता लगा रहा है।
आज अधिकतर लोगों के पास आवागमन के साधन है। इन साधनों को चलाने के लिए पेट्रोल और डीजल के ईंधन की जरूरत है। रोटी कपड़ा और मकान के साथ आज सबसे अहम जरूरत पेट्रोल और डीजल की है। अब सवाल यह पैदा होता है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत इतनी कम है, फिर भारत में कीमतें बढ़ती क्यों जा रही हैं। इसका फायदा किसे हो रहा है। अगर केंद्रीय करों की बात करें, तो केंद्र में बीजेपी सरकार के आने के बाद से केंद्र सरकार की कमाई भी तीन गुणा से ज्यादा बढ़ गई है।
पेट्रोल और डीजल के भावों में आग लगी हुई है। अच्छे दिनों की राह में आम आदमी की जेब पर लगातार डाका पड़ रहा है। देश के ज्यादातर राज्यों में पेट्रोल की कीमत 70 रुपये से पार हो गई है जबकि डीजल का भाव 60 रुपये प्रति लीटर के आसपास है। गुरुवार (14 सितंबर) को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 70.39 रुपये प्रति लीटर, कोलकाता में 73.13 रुपये प्रति लीटर, मुंबई में 79.5 रुपये प्रति लीटर और चेन्नई में 72.97 लीटर रही।पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। इस साल 16 जून से पूरे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम में हर दिन बदलाव की व्यवस्था (डेली डाइनैमिक प्राइसिंग) लागू कर दी गई है। तब से फ्यूल के दाम में उतार-चढ़ाव के बाद 13 सितंबर 2017 को दिल्ली में पेट्रोल 70.38 रुपये और डीजल 58.72 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गए।
पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम से आम लोगों के साथ-साथ मीडिया में भी खलबली मची है। मीडिया ने समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए पिछले तीन वर्षों में कच्चे तेल और आज के बढ़ते भावों का लेखाजोखा प्रस्तुत कर देश के आम आदमी का ध्यान खींचा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कच्चे तेल के दाम लगातार कम होना। 26 मई 2014 को जब मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण लिया था तब कच्चे तेल की कीमत 6330.65 रुपये प्रति बैरल थी जबकि प्रति डॉलर रुपये की कीमत 58.59 थी। लेकिन, 11 सितंबर 2017 को कच्चे तेल की कीमत करीब-करीब आधी घटकर 3368.39 रुपये प्रति बैरल पर आ गई जबकि प्रति डॉलर रुपये की कीमत 63.89 रही। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में जब कच्चे तेल के दाम करीब-करीब आधे हो गए, तो पेट्रोल-डीजल के दाम घट क्यों नहीं रहे? दिल्ली में 7 जून 2014 को पेट्रोल 71.51 रुपये और डीजल 57.28 रुपये प्रति लीटर था। इसी साल 1 मई से पुदुचेरी, विशाखापत्तनम, उदयपुर, जमशेदपुर और चंडीगढ़ के 109 पेट्रोल पंपों पर डेली डाइनैमिक प्राइसिंग लागू की गई थी। इस व्यवस्था को 16 जून से पूरे देश में लागू कर दिया गया। इसके तहत अब रोज सुबह 6 बजे पेट्रोल-डीजल के दाम बदल जाते हैं।
इस साल 1 जुलाई से देश में लागू हुई जीएसटी से पेट्रोल-डीजल को बाहर रखा गया है और इन पर केंद्र एवं राज्यों के अलग-अलग टैक्स अब भी लग रहे हैं। अगर केंद्रीय करों की बात करें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र में बीजेपी सरकार के आने के बाद से डीजल पर लागू एक्साइज ड्यूटी में 374 प्रतिशत और पेट्रोल पर 126 प्रतिशत का इजाफा हो चुका है। इस दौरान केद्र सरकार को इस मद से हुई कमाई भी तीन गुना से ज्यादा बढ़ गई है। इस दौरान राज्य सरकारों की ओर से लगाए जा रहे सेल्स टैक्स और वैट का भी विस्तार हुआ है।
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की ओर से 27 मार्च 2017 को लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, अप्रैल 2014 में 10 राज्यों ने डीजल पर 20 प्रतिशत से ज्यादा वैट लगा रखे थे, लेकिन अगस्त 2017 में ऐसे राज्यों की तादाद बढ़कर 15 हो गई। इसी तरह, अप्रैल 2014 में डीजल पर सबसे ज्यादा 25 प्रतिशत वैट छत्तीसगढ़ ने लगा रखा था जबकि अगस्त 2017 में यह आंकड़ा 31.06 प्रतिशत तक पहुंच गया जो आंध्र प्रदेश का है। अप्रैल 2014 में 17 राज्यों ने पेट्रोल पर कम-से-कम 25 प्रतिशत वैट लगा रखे थे और अगस्त 2017 में ऐसे राज्यों की संख्या बढ़कर 26 पर पहुंच गई। अप्रैल 2014 में पेट्रोल पर सबसे ज्यादा 33.06 प्रतिशत वैट पंजाब ने लगा रखे थे, लेकिन अगस्त 2017 में 48.98 प्रतिशत के साथ महाराष्ट्र टॉप पर पहुंच गया।
केन्द्र सरकार ने उत्पाद शुल्क के रूप में और राज्य सरकारों ने वेट, सेस एवं अन्य उपकरों के रूप में तेल से भारी धन राशि वसूल की है। अर्थात् जो फायदा जनता तक पहुंचना चाहिये था उसके मार्ग में सरकारें अवरोध बन कर खड़ी हो गईं। फलस्वरूप एक बड़ा प्रतिशत सरकार के राजस्व की भेंट चढ़ गया। सरकारों का कहना है कि हमने जो धनराशि वसूली है वह जनता के भले के लिए ही है क्योंकि अंततोगत्वा यह धनराशि विकास कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं को आगे बढ़ाने के काम ही आयेगी।

बाल मुकुन्द ओझा

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