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धरती के देवता खोफ के साये में

आम आदमी को जीवनदान देने वाले धरती के देवता यानी की डाॅक्टर दूसरों को तनाव रहित रहने की भले ही लाख सीख देते हो पर जो आंकड़े सामने आ रहे हैं वे बेहद चिंतनीय और गंभीर है। जहां एक और एक जुलाई को बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी राय की याद में पूरे देष में नेषनल डाॅक्टर्स डे मना कर डाॅक्टरों को सम्मानित किया जा रहा था ठीक उसी समय आईएमए द्वारा कराए गए अखिल भारतीय सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़े सामने आए जो अति प्रतिष्ठित प्रोफेसन को लेकर ना केवल चैंकाने वाले अपितु आंख खोलने वाले भी है। इण्डियन मेडिकल एसोसिएषन द्वारा कराए गए सर्वें में उभर कर आया कि देष के 82.7 फीसदी डाॅक्टर अपने काम को लेकर बेहद तनाव में रहते हैं। चैंकाने वाले नतीजे यहां तक है कि इस प्रतिष्ठित प्रोफेसन से डाॅक्टरों का मोह भंग होता जा रहा हैं और स्थिति यहां तक देखने में आ रही है कि अपने बच्चों को इस प्रोफेसन से दूर रखने तक का सोचने लगे है।
दरअसल डाॅक्टर्स अपनी सेवाषर्तों और कार्यस्थल पर सुरक्षा व अन्य परिस्थितियों को लेकर अधिक असंतुष्ट है। आधे से ज्यादा डाॅक्टरों को तो अब कार्य स्थल पर हिंसा का डर सताए रहता है। कब कौन उन पर हाथ उठा ले या लापरवाही का आरोप लगाते हुए पुलिस में एफआईआर दायर कर दे या मुकदमा कर दे, इसका डर बना रहता हैं। वहीं कार्य प्रकृति को देखते हुए 7 घंटें चैन की नींद भी सोना डाॅक्टरों के नसीब में नहीं दिखता। काम का दबाव, मरीज की स्थिति, मरीज के तिमारदारों की मनोदषा, चिकित्सालय में उपलब्ध साधन संसाधन, नेता-अफसरों की हाजिरी आदि ऐसी स्थितियां है जिनसे आए दिन डाॅक्टरों को दो चार होना पड़ता है। तस्वीर का एक पहलूं यह भी है कि जनमानस में डाॅक्टरों के प्रति सम्मान में भी कमी आई है। हांलाकि इस के लिए बहुत कुछ अस्पतालों के उद्योगों के रुप में बदलाव भी एक कारण है। एक अन्य कारण देष में डाॅक्टरों की कमी भी है। जहां दुनिया के कई देषों में कुछ सौ लोगों पर एक डाॅक्टर उपलब्ध है वहीं हमारे यहां हजारों पर एक डाॅक्टर की सुविधा उपलब्ध है। सरकारी चिकित्सालयों ही नहीं अब तो निजी चिकित्साकेन्द्रों में भी मरीजों का दबाव बेतहासा बढ़ रहा है। अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ती जा रही है। जिस अनुपात में चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए था वह नहीं होने से काम का दबाव अधिक बढ़ा है। देष में नए मेडिकल काॅलेज खोलने के बाद भी चिकित्सकों की कमी बरकरार है। सरकारी मेडिकल कालेजों में सीटे सीमित होने और निजी कालेजों में अत्यधिक फीस होने के कारण भी ज्यादा चिकित्सक नहीं आ पा रहे हैं। इसके साथ ही लाख प्रयासों के बावजूद गांवों मंे आज भी चिकित्सक जाने को पूरे मन से तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि बड़े अस्पतालोें में मरीजों का दबाव बढ़ता जा रहा है। देष के किसी कोने में किसी भी बड़े अस्पताल में खुलने से पहले ही मरीजों की लंबी कतार देखने को मिल जाती है।
चिकित्सक पेषे के सम्मान मंे कमी का एक कारण निजी क्षेत्र में चिकित्सा उद्योग का विस्तार होना भी है। आज देष में निजी क्षेत्र में बड़े बडे अस्पताल खुल गए हैं। गु्रफ आॅफ कंपनीज की तरह इनका संचालन होने लगा है। भारी भरकम फीस और इन अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों को निजी क्षेत्र की तरह लक्ष्य आधारित पैकेज के कारण मरीजों की जांच आदि का लंबा सिलसिला और फीस आदि से आमजन प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही इससे चिकित्सकीय पेषे पर भी प्रभाव पड़ा है। सरकारी चिकित्सालयों में जहां काम के बोझ और अत्यधिक कार्यभार से चिकित्सकों का तनाव में रहना व आए दिन बदसलूकी के समाचारों से चिकित्सकों का तनाव में रहना स्वाभाविक भी है। खासतौर से इन अस्पतालों के रेजिडेन्ट डाॅक्टरों की कार्य परिस्थितियों को समझना आवष्ष्यक है। एक और जहां मरीज के परीजनों का धैर्य जबाव देता है तो दूसरी और अत्यधिक कार्य बोझ के कारण डाॅक्टर के उत्तर देने के तरीके से ही कहासुनी होना आम बात होती जा रही है। चिकित्सकीय लापरवाही की षिकायतें भी आम होती जा रही है। हांलाकि इसके लिए पूरी तरह से सभी चिकित्सकों को दोषी या दोषमुक्त नहीं ठहराया जा सकता है। पर आए दिन समाचार पत्रों में इस तरह के समाचार आमबात होती जा रही है। चिकित्सालयों में कामबंद का सड़क पर आना आम होता जा रहा है।
जहां एक और सरकारी चिकित्सालयों में मरीजों का दबाव बढ़ता जा रहा है और उसके अन्य कारणों में से एक कारण यह भी है कि अधिकांष मामलों में मरीज की स्थिति गंभीर होने पर निजी चिकित्सालयों द्वारा भी सरकारी चिकित्सालयों को रेफर करना है, वहीं निःषुल्क इलाज की सुविधा भी एक कारण है। सबसे अच्छी और सकारात्मक बात यह है कि देष में आज भी लोगो का सरकारी अस्पतालों व सरकारी चिकित्सकों के प्रति अधिक विष्वास कायम है। निजी चिकित्सालयों में लाख सुविधाएं हैं पर उनका व्यवसायीकरण आमआदमी के गले नहीं उतरता वहीं आम आदमी की पहुंच से बाहर होना भी है। यही कारण है कि सरकारी चिकित्सक अधिक तनवाग्रस्त रहते हैं। प्राप्त आंकड़ों का विष्लेषण किया जाए तो 56 प्रतिषत डाॅक्टर सप्ताह के सात दिनों में 7 घंटें भी चैन की नींद पूरी नहीं कर पाते। 46 फीसदी से अधिक डाॅक्टरों को कार्यस्थल पर हमेषा मिसहेपनिंग का डर सताए रहता है। मरीजों के दबाव के कारण सही मायने में मरीज को जितना समय दिया जाना चाहिए वह नहीं दे पाते और इससे मरीजों के साथ न्याय भी नहीं हो पाता। इसके अलावा मरीज और उसके परीजनों की मनोदषा कब उग्र हो जाए यह डर तो हमेषा सताए रहता है। ऐसे में दूसरों को तनावमुक्त करने में जुटे डाॅक्टर स्वयं तनाव में रहने लगे है।
धरती के साक्षात भगवान को डर के साए से निकालने के लिए सरकारी प्रयासों मंे तेजी लानी होगी। अस्पतालों में मिसहेपनिंग को रोकने के उपाय खोजने होंगे क्योंकि मरीजों की मनोदषा को भी समझना होगा। वहीं देष में डाॅक्टरों की कमी को दूर करने की स्थाई योजना बनानी होगी। निजी क्षेत्र के चिकित्सा उद्योगों के लिए भी कण्डक्ट कोड बनाना होगा ताकि निजी चिकित्साकेन्द्र तक आमआदमी की सहज पहुंच हो सके। इसके साथ ही चिकित्सकों को भी इस अतिप्रतिष्ठित प्रोफेसन के सम्मान की रक्षा करने के हर संभव प्रयास करने होंगे।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,
रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
फोन-0141-2293297 मोबाइल-9414240049

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