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धर्म एक ‘प्रयोगशाला’

विज्ञान में प्रयोग कर नतीजो पर पहुँचने की परंपरा है।फलां पदार्थ के साथ फलां पदार्थ की क्रिया के परिणामतः फलां पदार्थ की उत्पत्ति,यह विज्ञान हो गया किन्तु वर्तमान में प्रयोग को हर जगह उपयोग में शामिल कर लिया गया है,कोई क्षेत्र अछूता नही है जहाँ प्रयोग न हो रहे हो। हाल ही में चिता के फेरे लगवा कर एक विवाह संपन्न हुआ।यकीन मानिये चिता भी चिंताग्रस्त हो गयी होगी! समाजशास्त्र के विद्यार्थी ‘सोलह संस्कारों’ के विषय में जब पढ़ते है तो विवाह संस्कार और अंतिम संस्कार यह दो अलग-अलग संस्कारो की श्रेणी अन्तर्गत आता है लेकिन विषय में परिवर्तन की चेष्ठा ने दो संस्कारो को समायोजित कर दोनों के योग से एक नवीन संस्कार का सूत्रपात कर दिया।
सदियों से चली आ रही धर्म की परंपराओं में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन एक ‘फैशन’ की भांति रच-बस गया है।युवा वर्ग को नया चाहिए,परिवर्तन हो यह तो प्रकृति का नियम ही है किंतु परिवर्तन के पीछे ‘लक्ष्य’ और ‘तथ्य’ भी तो निहित हो कि ऐसा क्यों हो रहा है! स्वाधीनता के उपरांत जब सदन में प.नेहरू हिन्दू कोड़ बिल पास करवाने के लिए सत्ता छोड़ने तक की बात कह गए थे,वह हिन्दू कोड बिल जिसमें विवाह विच्छेद और पत्नि को पति की संपत्ति में भागीदारी का प्रावधान निहित था।अचानक देश आजादी के बाद राजसत्ता ने धर्मसत्ता के कार्य में इतना बड़ा हस्तक्षेप किया कि पूरा देश अचरज में पड़ गया कि केवल हिन्दू धर्म में ही रूढ़िया है? परंपराओं के परिवर्तन की आवश्यकता केवल हिन्दू धर्म को है?वेदों की माने तो विवाह को एक नही अपितु सात जन्मों का पवित्र बंधन माना गया है। जब यह नियम आ रहा था तब न तो प्रचुरमात्रा में ज्यादा शिक्षित बुद्दिजीवी वर्ग था और न ही बहस हेतु सोशल मीडिया मंच। उदार हिन्दू धर्म के लोगो को समझने में देर नही लगी कि राजसत्ता के इस निर्णय में समय के परिवर्तन का भाव जुड़ा है और यह क़ानूनी रूप से आवश्यक भी है जिससे हिन्दू धर्म की महिलाओं को उनके अधिकार मिल सके। हालांकि विरोध बहुत हुआ किन्तु लोग समझ गए क्योंकि इस निर्णय में महिलाओं के अधिकार निहित थे जो समय के परिवर्तन के साथ उनको मिलने चाहिए थे। हिंदुकोड बिल के परिणामतः हिन्दू महिलाओं को विवाह विच्छेद का कानूनी अधिकार मिल गया लेकिन सिर्फ हिन्दू धर्म की ही महिलाओं को। सभी धर्मों में कमियां थी,परम्पराओ के नाम पर बहुत कुछ गलत था किंतु बाकि धर्मो की रूढियों में परिवर्तन का साहस प.नेहरू भी नही जुटा पाये,यह आज भी बहस का विषय है। हिन्दूधर्म विराट स्वरूप लिए बहुत उदार है सहज ही परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है, हिन्दूकोड बिल के माध्यम से धर्मग्रन्थो के विरूद्ध जाने का जो कार्य हुआ उसे प्रगतिशीलता और समाज में महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने की संज्ञा के तौर पर स्वीकार कर लिया गया किन्तु वर्तमान में ‘चिता पर फेरे’ को किस रूप में स्वीकार किया जाये? धर्मग्रन्थों और पुरातन सभ्यता के विरूद्ध के इस निर्णय के औचित्य परीक्षण की आवश्यकता नही है? इस परिवर्तन का न तो कोई ‘लक्ष्य’ है न ही ‘तथ्य’ है। सिर्फ स्वयं को दुसरो से बेहतर बनाने की दौड़ में धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप बेहद आम सा हो चला है,वे तमाम ‘संत’ जिनको मानने वाले अनुयायियो की संख्या विशाल है, वे अपने अनुयायियो के बीच अपनी सिद्धि-प्रसिद्धि के लिए ऐसे पैतरे अपनाते है जिनका लक्ष्य स्वयं के प्रभुत्व को मजबूत करने के अतिरिक्त कुछ नही है। बेवजह बिना आधारभूत कारणों के गैरवाजिफ परिवर्तन आवश्यक है? ऐसा करने से तो एक परंपरा की शरुआत हो जायेगी,हर कोई अपनी इच्छानुसार आचरण करेगा।परिवर्तन हो,जिसमे परिवर्तन का समाज हितार्थ उद्देश्य निहित हो किन्तु यहा सीधा सा धर्म और परंपराओं की सीमा में अनुचित प्रवेश नजर आ रहा है।जिन्होंने इस नवीन परंपरा का सूत्रपात किया है उनको मानने वाला एक बड़ा वर्ग निःसंदेह इसे स्वीकार भी करेगा क्योंकि एक मर्तबा जहा आस्था अडिग हो जाये वहां औचित्य परीक्षण की आवश्यकता महसूस ही नही होती।आज देश में ऐसे अनेक संत है जिनको मानने वाला एक विशाल अनुयायियो वाला वर्ग है, यदि यह संत परिवर्तन के नाम पर अनुचित रीतियों,रिवाजो,परंपराओं के अंत के विषय में कार्य करे तो जड़ से उन समस्याओं का अंत हो सकेगा क्योंकि उनके कहने का प्रभाव उनको मानने वाले विशाल समुदाय पर तुरंत पड़ेगा लेकिन इस प्रकार अनुचित रूप से धर्म की मूल परम्पराओ में परिवर्तन उसके स्वरूप में परिवर्तन के समान होगा। सभी धर्मों में कुछ कमियां होती है,जो समय के साथ दूर होती जाती है। हिन्दू धर्म ने परिवर्तनों को सबसे तेजी से स्वीकार किया है किंतु अब आवश्यकता औचित्य के परीक्षण की है वरना हिन्दूधर्म की ही अनेक शाखाएं उत्पन्न हो जायेगी जिससे यह धर्म एक सूत्र में एकीकृत नही रह पायेगा। संतो में वर्चस्व की होड़ के चलते नूतन परम्परों को प्रारम्भ करने का चलन बड़ा है लेकिन आवश्यकता स्वयं के बुध्दि प्रयोग की है,गलत बहुत कुछ है किंतु सब कुछ नही।

सौरभ गिरीश जैन
स्वतंत्र टिप्पणीकार
मोबा.08982828283

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