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 पंचकूला में हुई मौतों के लिए हरियाणा सरकार पूरी तरह जिम्मेदार

 हरियाणा की खट्टर सरकार हरियाणा में हुई मौतों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है. जिस प्रकार हरियाणा के पंचकूला और सिरसा में लाखों लोगों जमा होने दिया गया, उसके लिए हरियाणा सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है. हरियाणा में जाट आंदोलन से खट्टर सरकार कोई सबक नहीं ले पाई. इस बात की पूरी आशंका थी कि जिस प्रकार से भीड़ इकट्ठा हो रही है, उससे किसी अनहोनी की आशंका बनी हुई थी. सरकार को अंदरखाने इस बात की जानकारी थी कि सजा हो सकती है लेकिन इसके बावजूद पिछले एक हफ्ते से सरकार एवं उसके प्रवक्ता बार-बार यह दावा करते रहे कि सेना और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के अलावा प्रदेश की पुलिस हर स्थिति से निपटने के दावा कर रही थी. लेकिन फैसला आने के तुरंत बाद हिंसा फैलना शुरू हो गई और तीन घंटों में 25 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें एवं हजारों, गाड़ियों सहित निजी और सरकारी इमारतों तथा अन्य सम्पत्ति को नुकसान की खबरें हैं और सरकार चाहे लाख दावा करे, आने वाले दिनों में हिंसा भड़कने से इन्कार नहीं किया जा सकता. सरकार टकराव को टाल सकती थी और कानून व्यवस्था का हवाला देकर वीडियो कांफ़्रेंसिंग के जरिए गुरमीत राम रहीम सिंह की पेशी करवा सकती थी और फिर समय और हालात के अनुसार उनकी गिरफ्तारी कर सकती थी.

लेकिन ऐसा लगता है कि खट्टर सरकार कामपाल प्रकरण और जाट आंदोलन से कुछ नहीं सीख पाई है. प्रशासनिक अनुभव न होने के कारण मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर चुनिंदा बाबुओं, नौकरशाहों और राजनैतिक सलाहकारों के भरोसे सरकार चला रहे हैं. रामपाल प्रकरण के समय तो यह सरकार नई थी लेकिन जाट आंदोलन को दौरान इसकी अनुभवहीनता साफ दिखाई दी थी और उस वक्त भी प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात थे और इस बार तो स्थिति को बिगाड़ने में सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है. धारा 144 के बावजूद लाखों लोगों का सिरसा और पंचकूला में इकट्ठा होना साबित करता है कि खट्टर सरकार कानून-व्यवस्था के मामले में नाकाम साबित हुई है.  जिस प्रकार से आज चुन-चुनकर मीडिया की ओ. बी. वैनों को तोड़ा गया और मीडिया कर्मियों पर हमला किया गया, सरकार की नाकामी की वजह से सम्पन्न हो सका है. असल में पुलिस और प्रशासन का सारा ध्यान सिर्फ कोर्ट को सुरक्षित करने तक सीमित था जबकि पंचकूला और सिरसा की जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था. लेकिन जिस प्रकार लाखों की भीड़ को कोर्ट परिसर के आसपास जमा होने दिया गया था, उससे अनहोनी तो निश्चित ही थी लेकिन यदि दुर्भाग्यवश यदि लाखों की भीड़ यदि कोर्ट परिसर में घुसने में कामयाब हो जाती तो न तो वकीलों, जजों और कोर्ट स्टाफ की जिंदगी खतरे में पड़ सकती थी.

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मामले पर संज्ञान लेते हुए एक दिन पहले ही पुलिस,  प्रशासन से पूछा था कि धारा 144 के बाद आखिर लाखों की भीड़ शहर में कैसे जुट गयी. सरकार के पास इसका कोई जबाव नहीं था और आज की हिंसा के बाद तो हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए डेरा सच्चा सौदा की सारी सम्पत्ति जब्त करके उससे नुकसान की भरपाई करने का आदेश दिया है. लेकिन आज के हालात को देखकर लग रहा है कि हरियाणा में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है. पंचकूला और सिरसा की क्षेत्रीय जनता पिछले चार दिनों से बंधकों जैसा जीवन जी रहे थे लेकिन सरकारी लापरवाही जगजाहिर है. अर्द्धसैनिक बलों, सेना और स्थानीय पुलिस के फ्लैगमार्च की बात की जा रही थी और पिछली रात सड़कों के किनारे और पार्कों में डटे डेरा भक्तों और शरारती तत्वों को बलपूर्वक हटाने की बात कर रही थी लेकिन लाऊड स्पीकर पर घोषणा के अलावा पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों ने कार्रवाई नहीं की, क्योंकि पुलिस और प्रशासनिक उच्च अधिकारियों ने उन्हें इसकी इजाजत ही नहीं दी और हालात को बिगड़ने दिया गया.

वह यदि केन्द्र में कोई दूसरी सरकार होती तो अब तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लग चुका होता लेकिन केन्द्र की भाजपानीत सरकार चुप्पी साधे हुए है. मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देकर इन मौतों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए.

 विजय शर्मा

 

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