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पचास वर्षों में भारतीय जीवन में आई खुशहाली

69 फीसदी भारतीयों का मानना है कि 50 साल में उनकी जिंदगीं में खुशहाली आई है। इनका मत है कि उस समय की बजाय हमारी मौजूदा जिंदगी अच्छी है। यह जानकारी पीउ रिसर्च सेंटर के एक सर्वे से सामने आई है। इस रिसर्च में 38 देशों के करीब 40 हजार लोगों को शामिल किया गया था। इस लिस्ट में सबसे ऊपर वियतनाम है, जहां के 88 फीसदी लोगों का कहना है कि उनकी मौजूदा जिंदगी अच्छी है। वहीं तीसरे नंबर पर दक्षिण कोरिया है, जहां के 68 फीसदी लोगों का मानना है कि मौजूदा जिंदगी अच्छी है। भारत सहित ये तीनों देश ऐसे हैं, जहां पर 60 के दशक के बाद से आर्थिक बदलाव देखने को मिले हैं।
इसके अलावा दक्षिण कोरिया के 68 फीसदी, जापान, तुर्की और जर्मनी के 65 फीसदी और नीदरलैंड और स्वीडन के 64 फीसदी और केन्या 65 फीसदी लोगों ने मौजूदा जिंदगी को अच्छा बताया है। इसके अलावा ऐसे देशों की संख्या भी काफी है, जहां के लोगों का कहना है कि उनकी मौजूदा जिंदगी अच्छी नहीं है। अमेरिका के 41 फीसदी, इटली के 50 फीसदी, ग्रीक के 53 फीसदी, नाइजीरिया के 54 फीसदी, केन्या के 53 फीसदी, वेनेजुएला के 72 फीसदी और मेक्सिको के 68 फीसदी लोगों का कहना है कि उनकी मौजूदा जिंदगी अच्छी नहीं है।
इस सर्वे में यह जानने की कोशिश की गई है कि आज से 50 साल पहले जो हालात थे, उस समय की जिंदगी और मौजूदा जिंदगी में से कौनसी अच्छी है। देखा जाए तो 50 साल पहले विश्व का माहौल कुछ अलग था। उस समय अमेरिका और इसके साथी देश सोवियत संघ के साथ शीतयुद्ध में उलझे हुए थे। उस दौरान कंप्यूटर और मोबाइल फोन केवल विज्ञान तक ही सीमित थे। वहीं अभी हालात बदल गए हैं। आज के समय तकनीक ने भी बहुत ज्यादा विकास कर लिया है। ऐसे में भी अमेरिका जैसे देश के 41 फीसदी लोगों का मानना है कि उनकी मौजूदा जिंदगी अच्छी नहीं है।
भारत को 1947 में आजादी मिली थी। आजादी के बाद देश की प्रगति और खुशहाली के लिए पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से जनकल्याण की विभिन्न योजनाओं और विकास कार्यक्रमों को तेजी से अमलीजामा पहनाया गया । आजादी के बाद निश्चय ही देश ने प्रगति और विकास के नये सोपान तय किये हैं। पोस्टकार्ड का स्थान ई-मेल ने ले लिया है। इन्टरनेट से दुनिया नजदीक आ गई है। मगर आपसी सद्भाव, भाईचारा, प्रेम, सच्चाई से हम कोसों दूर चले गये हैं। समाज में बुराई ने जैसे मजबूती से अपने पैर जमा लिये हैं। लोक कल्याण की बातें गौण हो गई हैं। शासन-प्रशासन की प्रणाली पंगु हो गई है। भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार के रूप में प्रतिस्थापित कर लिया है। बाढ़ खेत को खाने लगी है। सेवा के लिए आने वाले लोग रावण और कुंभकरण से दिखाई देने लगे हैं। सफेद कुर्ते और पाज़ामे को देखकर डर लगने लगा है। जिस गली ओर चैराहे पर ये पोशाकें दिखने लगती हैं, उन्हें देखकर लोग सहम जाते हैं। अनियमितता, भ्रष्टाचार और लाल फीताशाही हमारे सिस्टम का एक अंग बन गई है। देश के नेताओं और कर्णधारों ने भ्रष्टाचार को पनपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
गरीब आज भी रोजी-रोटी और कपड़े के लिए मोहताज है, वहीं हमारे प्रतिनिधि कहे जाने वाले कथित शूरमाओं के पास गोदामों में अनाज और हवेलियों में स्वर्ण मुद्राएं भरी पड़ी हैं। कई केन्द्रीय और राज्यों के मंत्रियों तक को भ्रष्टचार के नाग ने निगल रखा है और वे जेलों में बंद हैं। आई.ए.एस. अफसरों को भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। देश और प्रदेश में आये दिन भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों को पकड़ कर जेल में डाला जा रहा है। इनके घरों से लाखों-करोड़ों की बेहिसाब सम्पत्तियाँ और नकदी बरामद की जा रही है।
शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज उठाने वाले प्रताड़ित किये जा रहे हैं। रक्षक ही भक्षक बन गये हैं। ऐसे में देशवासियों के जागने का समय आ गया है। भ्रष्टाचार और समाज को गलत राह पर ले जाने वाले लोगों को उनके गलत कार्यों की सजा देने के लिए आमजन को जागरूक होने की महत्ती जरूरत है। देश को बचाने के लिए कमर कसनी होगी।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले 50 वर्षों में देश में काफी कुछ बदलाव देखने को मिला है। बिजली ,पानी, उद्योग, कल कारखान े,सिंचाई आदि सभी क्षेत्रों में आशातीत प्रगति देखने को मिली है। इस अवधि में अमीर की अमीरी कई गुणा बढ़ी वहीँ गरीबी भी तेजी से बढ़ी। आम आदमी को रोटी ,कपडा और मकान की बुनियादी सुविधा पूरी तरह नहीं मिली। पचास साल में जनसँख्या में भी बहुत तेजी से वृद्धि हुई जिसके फलस्वरूप बुनियादी सुविधाएँ सीमित हो गई। पचास साल का बदलाव तभी फलीभूत होगा जब आम आदमी के चेहरे पर मुस्कान आएगी और यह मुस्कान तभी आएगी जब उसे रोटी ,कपडा और मकान की सुविधा निर्विघ्न रूप से हासिल होगी।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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