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पद्मावती : विरोध कब और क्यों

समाज समय के साथ बदल रहा है । माना भारतवर्ष लोकतांत्रिक देश है और अपने मत और विचार को सबके सामने प्रस्तुत करना हमारा अधिकार भी है परंतु क्या इस तरह का परिवर्तन जिसमें ठहराव न हो क्या वो स्थिर रह पायेगा ?

अब पद्मावती फिल्म पर मचे बवाल पर भय की हल्की सी चादर धुँआ सा पसरा रहा है । हिंदु समाज का इस प्रकार का रवैया देश को क्या संदेश देना चाह रहा है यह समझ से परे है ।
फिल्म जो देखा न गया हो उस पर धर्म के ठेकेदारों ने जो हंगामा मचाया वही हंगामा यदि , भ्रष्टाचार , आतंकवाद कश्मीर मुद्रा और अयोध्या मुद्दों पर उठाया होता तो शायद आज ये मुद्दे फैसलों में बदल गये होते ।
मनोरंजन को किसी भी धर्म , समुदाय या जाति विशेष से न जोड़ा जाय ।

पद्मावती जैसे कई ऐतिहासिक फिल्में बनाई जा चुकी हैं और उसे सराहा भी गया है ।
पहला सराहनीय पक्ष ये है कि आज भी जनता एकजुट होना नहीं भूली है परंतु यही एकजुटता सही फैसले पर टिकी रहे यह महत्वपूर्ण है ।

इस विषय पर राजनीतिक पार्टियाँ अपनी रोटी सेकने में लगी हैं । हमें भूलना नहीं चाहिए चुनाव नजदीक है । राजनेता ने अपना बयान दिया है कि फिल्म के लिए पैसे कहाँ से आये उसका जाँच होना चाहिए । अब तो आँखों में सुरमा लगाकर सोने से बेहतर है , इन राजनीतिक पार्टियों के मनसा को देखें और समझे । कहीं ऐसा न हो एक भेड़ के कुँए में गिरते देख सारे के सारे अंधे कुँए मे जा गिरे ।

मौलिक अधिकारों के प्रति सचेत रहना उत्तम है परंतु भावुकता में उठाया गया विरोध गलत है । करनी सेना ने तो अपने बयान से भारतीय संस्कृति पर एक और दाग लगा दिया । नाक काटने की बात कहकर इन लोगों ने समस्त स्त्री जाति का अपमान किया है ।
बात अश्लीलता की है तो क्या दौलत , शोहरत और नाम के लिए ऐसे कई फिल्म है जिसमें वस्त्र तो छोड़िये साहब शब्दों से पूरी स्त्री जाति को नंगा किया जा रहा है । बाज़रीकरण और सस्ती लोकप्रियता के लिए स्त्रियों को विभिन्न नामों व उपनामों से नवाजा जा रहा है तब विरोध क्यों नहीं है । विरोध दृश्यों व नग्नता पर होना चाहिए । अश्लीलता पर होनी चाहिए । शोषित अदाकारों के लिए होनी चाहिए ।

पुरूषवादी मानसिकता नृत्य को विकृत रूप देने से नहीं चुकी है ।
राधा – मीरा की भक्ति ऐसी की पूरा जन झूम उठे । मुरली की मधुर तान पर हमारी भक्ति कालिन काव्य में रासलीला का वर्णन बखूबी किया है ।
जातिगत व धार्मिक विवाद को लेकर कट्टरपंथी लोगों द्वारा किया जाने वाला विरोध का अतिशय रूप कहीं हमें गलत दिशा में ले जाकर न छोड़े ।

दूसरे पक्ष पर ध्यान क्रेन्द्रित करें तो हम देखेंगे कि धर्मभीरूता के आड़ में कई राजनीतिक दल अपनी दुकानें चला रहें हैं । उस पर मीडिया और सस्ते अफवाहों का क्या कहना । राजस्थान , चित्तौड़ , कोयमवटूर में धार्मिक संगठनों व अन्य संस्थाओं के द्वारा विरोध को मुख्य पृष्ठ पर लाने का काम मीडिया ही कर रही है । विक्रम सिंह शेखावत , कांग्रेस नेताओं ने भी अपनी रोटियाँ सेंकनी प्रारंभ कर दी है । महारानी पद्ममीनी केवल स्थान या जाति विशेष की गौरव नहीं वल्कि पूरे भारत का गौरव है ।

हर साल कुछ ऐसे फिल्मों का निर्माण होता है जो इतिहास को दोहराते हुये नयी पीढ़ियों को संदेश देते हैं । कुछ कल्पनाओं व कुछ नवीनतम विचारों के समायोजन से इतिहासकारों से जानकारी एकत्रित कर फिल्म निर्माता ऐसी फिल्मों का निर्माण भी करते हैं । यदा – कदा फिल्म प्रसारित होने से पहले फिल्मकार अपनी फिल्म की लोकप्रियता के लिए भी उन दृश्यों को पहले दिखा देते हैं जिनसे विवाद उत्पन्न हो । इन्हीं विवादों को भूना कर फिल्मकार अच्छी – खासी रकम कमा लेता है और फिल्म सुपरहिट होता है । टीआर पी बढ़ाने का ये सबसे सरल उपाय है । कुछ भड़काऊ संवाद और कुछ विवादित दृश्य काफी होता है जनता को भटकाने के लिए ।

अब साहित्यिक सामग्री की ही बात ले तो रचनात्मक तथ्यों पर नवीनतम प्रयोग आपेक्षित है । देशकाल का प्रभाव साहित्यकार यदि अपने साहित्य में न पेश करें तो समसामयिक विषयों , घटनाओं का चित्रण हमें नहीं मिल पायेगा । कवि , लेखक , साहित्यकार , अपने रचनाओं में नवीनतम निर्माण शैली का समावेश करें तो क्या समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा । यह विचार विचारणीय है ।

प्रगतिशील समाज स्वस्थ भारत का दर्पण है । परिवर्तन व नये विचारों को सही रूप में स्वागत करें । अफवाहों से अपनी झोली न भर कर सत्य से रूबरू होकर देश को नया आयाम देना होगा । पद्ममावती एक वैचारिक युद्ध है जिसे समाज को नये चुनौती के रूप पहचानना है । चाहे अंजाम जो भी हो परंतु जनता की एकजुटता तो सराहनीय है । एक स्वर में जनता , नेता सभी बोल पड़े है ।

अब बोल को शोर नहीं बनाने देना है । शोर को सही दिशा और दशा देना होगा । विवेक और धैर्य को रेलगाड़ी में बैठाकर चाय की चुस्कियों और मित्रों के साथ आराम से पी लेने में जीवन की सार्थकता होगी ।
ये बात और है कि आपको कौन सी फिल्म देखनी है । चुनौतियों को चाय की चुस्कियों में पीने को तैयार हैं क्या आप ?

लेखिका
मल्लिका रुद्रा ” मलय – तापस “
चिरमिरी , छत्तीसगढ़

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