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पार्टिशन: 1947 मूवी रिव्यू

कलाकार : हुमा कुरैशी, मनीष दयाल, ओम पुरी, माइकल गैम्बन, जिलियन एंडरसन, ह्यू बोनविले

निर्देशक : गुरिंदर चड्ढा

मूवी टाइप : Biography

अवधि : 1 घंटा 53 मिनट

इस फिल्म की रिलीज से बहुत पहले ही फिल्म का ट्रेलर उस वक्त सोशल मीडिया में वायरल हो गया, जब फिल्म में लेडी मांउटबेटन और देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू के बीच संबंधों को लेकर अटकलों का बाजार गरम हो गया। शायद यही वजह रही कि भारत में इस फिल्म को रिलीज करने से पहले फिल्म की डायरेक्टर गुरिंदर चड्ढा कई मेजर सेंटरों पर मीडिया से रूबरू हुईं और उन्होंने इन अटकलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

एक सवाल के जवाब में गुरिंदर ने कहा, ‘मेरी फिल्म भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लेडी माउंटबेटन के संबंधों पर आधारित नहीं है।’ दरअसल, इस फिल्म की कहानी ब्रिटेन से भारत आए आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के दौर को दर्शाती है। इस फिल्म को बनाने के लिए गुरिंदर को काफी वक्त लगा। उन्होंने फिल्म के एक-एक सीन पर पूरा होमवर्क करने के बाद भारत आकर कई इतिहासविदों के साथ लंबी बातचीत करने के बाद ही इस प्रॉजेक्ट पर काम शुरू किया।

जब आप करीब दो घंटे की इस फिल्म को देखने के लिए बैठते हैं तो फिल्म के आखिरी सीन तक कहानी और किरदारों के साथ बंधकर रह जाते हैं। यहां खास तौर से चड्डा ने माउंटबेटन के किरदार को सशक्त बनाने के लिए काफी मेहनत की है। दरअसल आज की युवा पीढ़ी लॉर्ड मांउटबेटन के बारे में बहुत कम जानती है। इसके अलावा देश किन हालातों में आजाद हुआ, इस बारे में भी युवा पीढ़ी को ज्यादा जानकारी नहीं है। ऐसे में चड्ढा ने अपनी इस फिल्म की कहानी को हल्के अंदाज में बयां करने और दर्शकों की हर क्लास को किरदारों के साथ बांधने के लिए लव स्टोरी को भी फिल्म का हिस्सा बनाया है।

स्टोरी प्लॉट: फिल्म की शुरुआत अंग्रेजी शासन के आखिरी कुछ दिनों से होती है, जब ब्रिटिश सरकार लॉर्ड माउंटबेटन को भारत भेजती है। दरअसल, यह सरकार चाहती थी कि भारत को दो हिस्सों में बांटने के बाद ही आजाद किया जाए। जहां माउंटबेटन को बंटवारे से पहले हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच टकराव रोकने का था, वहीं उन्हें उस वक्त मुस्लिम लीग नेता के जिन्ना और कांग्रेस के नेता जवाहर लाल नेहरू के बीच की अनबन सामना भी करना था। आखिरी वायसराय व्यक्तिगत तौर पर नहीं चाहते थे कि भारत को दो भागों में बांटा जाए। इसके साथ ही फिल्म में आलिया ( हुमा कुरैशी) और जीत (मनीष दयाल) की प्रेम कहानी भी चलती है। ये दोनों अलग-अलग धर्म से हैं और एक दूसरे को काफी प्यार करते हैं, दोनों ही वायसराय के ऑफिस में काम करते हैं। हालात ऐसे बनते हैं कि दोनों को देश के विभाजन के बाद अलग होना पड़ता है।

फिल्म में विभाजन से पहले के दिनों में वायरराय हाउस में होने वाली गतिविधियों और वहां के हालात को डायरेक्टर ने दमदार तरीके से पेश किया है। गुरिंदर चड्ढा की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने फिल्म में गानों को भी ऐसे ढंग से फिट किया है कि वो कहानी का अहम हिस्सा बन गए हैं। फिल्म में ओम पुरी ने भी एक अहम किरदार निभाया है। हुमा कुरैशी की यह पहली अंतरराष्ट्रीय फिल्म है। आलिया के किरदार में हुमा ने शानदार ऐक्टिंग की है। भारत में रिलीज होने से पहले यह फिल्म 67वें बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में ‘वायसराय हाउस’ टाइटल से पेश की गई। फिल्म का संगीत ए.आर. रहमान ने दिया है, फिल्म के माहौल पर रहमान का संगीत पूरी तरह से फिट है। अगर आप भारत-पाकिस्तान विभाजन के पीछे के हालातों के साथ-साथ माउंटबेटन के बारे में अच्छे से जानना चाहते हैं तो इस फिल्म को एक बार जरूर देखें।

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पार्टिशन: 1947 मूवी रिव्यू
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