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पुस्तक समीक्षा : नारी संघर्ष का आइना है ” देहरी के अक्षांश पर”

कविता संग्रहः देहरी के अक्षांश पर
विधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य 120 रुपये
लेखिकाः डा. मोनिका शर्मा

स्त्री का संपूर्ण जीवन एक बिखरा हुआ पन्ना है जिसे एक किताब में नहीं बांधा जा सकता। स्त्री के जीवन संघर्ष और अंर्तमन की पीड़ा को समझना आसान नहीं है। स्त्री का जीवन ही एक कविता संग्रह है। इस जीवन को कोई दूसरा परख और पढ़ नहीं सकता। अगर कोई ऐसा कर सकती है तो वह स्त्री ही होगी। क्योंकि जो एक स्त्री, मां, बेटी और पत्नी नहीं है वह इस संघर्ष और जीवन के विविध आयाम को नहीं समझ सकती। स्त्री क्या और क्यों है अगर आप समझना चाहते हैं तो डा. मोनिका शर्मा के कविता संग्रह देहरी के अक्षांश पर, को जरुर पढ़ें। यह कविता संग्रह बेहद उम्दा है। इसमें स्त्री के जीवन संघर्ष को बेहद करीब से जिया गय है। हर पहलू पर बड़ी बेवाकि से कविताओं के माध्यम से महिलाओं की पीड़ा और आतंरिक भावनाओं को उकेरा गया है। संग्रह की हर कविता आपकों बेहद गहराई में ले जाती है। कविताओं में नारी के ऐसे पहलुओं को भी छुवा गया है जिसकी कल्पना तक आप नहीं कर सकते हैं। हर कविता में स्त्री का एक नया रुप दिखता है। कविताओं के सारे चरित्र को बेहद संजीदगी और शालीनता से जिया गया है।
डा. मोनिका शर्मा किसी परिचय की मोहताज नहीं है। देश की सम्मानित पत्र, पत्रिकाओं, अखबारों में उनके कालम अनवरत प्रकाशित होते हैं। आकाशवाणी मे ंएंकरिंग के साथ वह ब्लागर भी हैं। महिलाओं और बच्चों पर उनका लेखन काबिले गौर है। वह हमेंशा ज्वलंत मसलों को अपने लेखन में उठाती हैं। संस्कृति और संस्कार को वह बेहद संजीदगी से ओढ़ती और दशाती हैं। बाल लेखन पर भी उनकी अच्छी पकड़ है। मोनिका जी के कविता संग्रह देहरी के अक्षांक पर में कुल 100 कतिताएं संकलित हैं। पढ़ने के बाद हर कविता आपको आगे बढ़ने के लिए उत्पे्ररित करती है। पाठक को कविताएं कभी बोझिल नहीं लगती। सरल सपाट भाषा शैली में कविताएं लिखी गई हैं। कविताएं अपना मुकाम हालिस करने में कामयाब हुई हंै। कविताओं में कहीं बनावट या कल्पनाशीलता नहीं दिखती है। कविताओं के पढ़ने से लगता है कि यह चरित्र खुद जिया गया है। एक स्त्री के जीवन के आंतरिक संघर्ष अगर इसे दस्तावेज का कहा जाए ता अच्छा रहेगा। एक के बाद हर दूसरी कविता आपको पढ़ने को मजबूर करती है। कविताओं को पढ़ने से लगता है कि यह हर स्त्री के आतंरिक जीवन और उसके संघर्षों का आइना है।

मोनिका शार्मा का यह कतिवा संग्रह मां को समर्पित है। पहली कविता यात्रा से प्रारम्भ होकर स्त्री का संघर्ष शिखर पर अकेलापन पर खत्म होता है। संग्रह का पहला शीर्षक यात्रा पूरे संग्रह का निचोड़ रखती है। जिसकी पहली कविता …मुट्ठी भर सपनो और अपरिचित अपनों के बीच, देहरी के पहले पायदान से आरंभ होती है, गृहिणी के जीवन की अनवरत यात्रा। धुरी शीर्षक में बेहद कम शब्दों में उन्होंने क्या लिखा है। घर परिवार की धूरी वह, फिर भी अधूरी वह। इसके बाद अधूरे स्वप्न, रिपोर्टकार्ड, गुशलखाना, घर, स्त्री की छबि, उड़ान के लिए, मां, संदूकची जैसी कविताएं महिलाओं के जीवन दर्शन की जमीनी पड़ताल करती दिखती है। डा. मोनिका ने अपने मन की बात में स्वयं लिखा है कि कुछ देखा जिया सा शब्दों में ढालना हो तो कतिवाएं सोच समझ कर नहीं लिखी जाती हैं। जब ह्दय आहत होता है तों भावनाएं शब्दों के माध्यम से कागज के पन्नों पर उतर कविताओं का आकार लेती हैं। एक स्त्री परिवार में अपनी भूमिका पत्नी, मां, सास, ननद, बेटी, दादी के अनेक रुप में कैसे समायोजित करती है यह कोई स्त्री ही बता सकती है। स्त्री के उसी चरित्र का दस्तावेज है देहरी के अक्षांश पर। यह किताब आप जरुर पढ़े तभी आप एक स्त्री को संपूर्ण समझ पाएंगे।

स्वतंत्र लेखक और पत्रकार
प्रभुनाथ शुक्ल

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