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पूजिए नहीं, पहले दानवी समाज से सहेजिये

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। हम विकाशशील से विकसित अवस्था में पहुँच रहें हैं। तो इस बदलाव के दौर में कहीं बेटियों का कत्ल , तो कहीं वंश को आगे बढ़ने के फ़िक्र में कोख़ में कन्या भ्रूण हत्या की जा रहीं है। यह बदलाव के वक्त का कैसा सामाजिक विद्रूप स्याह है। निश्चित रूप से समाज की संस्कृति और सभ्यता एक नए आयाम को अपने आप में समाहित करती जाती हैं, लेकिन सामाजिक कुरीतियां और रूढ़ियां इनको प्रभावित करने का काम भी करती हैं। ऐसे में अगर संस्कृति और सभ्यता मात्र प्रतीकात्मक रूप से अक्षरांश रह जाए तो यह बिगड़ती सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक है। नवरात्रि का पर्व पूर्ण उल्लास के साथ अपने आख़िरी ढलान पर है। बच्चियों को भोजन करके पुण्य कमाने की होड़ मच गईं है। ऐसे में सवालों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन आधुनिक होते समाज के पास इन बहुतेरे प्रश्नों के उत्तर होते हुए भी निरुत्तर लगते हैं। क्या हमारे देश को नहीं पता समाज की धुरी तभी गतिमान होगी, जब स्त्री- पुरुष की जनसंख्या बराबर होगी? क्या अब भी बताना होगा, कि कुलदीपक आदि की रूढ़िवादी मानसिकता का कोई वजूद नहीं? आज स्त्रियां किस क्षेत्र में पुरुषों से पीछे हैं? फ़िर मात्र नौ दिनों तक ही स्त्रियों और बच्चियों के प्रति श्रद्धा और स्नेह का भाव क्यों? क्या समाज में यह भावना निरन्तर नहीं होनी चाहिए। 
                      ऐसे में आंकड़े सिर्फ आहट के दस्तक़ नहीं देते, बल्कि सच्चाई से रूबरू कराते हैं। देश में लिंग-अनुपात के लगातार कम होने के जो आंकड़े हमारे सामने आ रहे हैं, वे न सिर्फ हमारी मानसिकता बताते हैं। यहां तक हमारे समाज के दो- अर्थी व्यहवार को भी व्यक्त करते हैं। साथ- साथ यह भी पता चलता है, कि कन्याभ्रूण हत्या रोकने और अन्य स्तर पर लड़कियों को सुरक्षा देने के सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास निरर्थक हो चुके हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े के मुताबिक देश में लड़कों के मुकाबले कम लड़कियों के पैदा होने होने तक का विषय नहीं है। कुपोषण और अन्य बीमारियों के कारण पांच साल तक के बच्चों की जो मृत्यु-दर है, उसमें लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या ही ज्यादा होती है। पिछले साल ऐसे कुपोषित या रोगग्रस्त 8,42,000 बच्चों को नियानेटल केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था, उनमें सिर्फ 41 प्रतिशत लड़कियां थीं। यह बताता है कि बीमार बच्चों में भी इलाज के लिए हमारी प्राथमिकता लिंग आधारित है। फ़िर हम समाज के सामने दिखावे के द्विअर्थी संवाद क्यों करते हैं? आज हमारा समाज मानसिकता के स्तर पर रुग्णता का शिकार हो चला है। सब को एक- दूसरे की सच्चाई पता है, कि बच्चियों और स्त्रियों के प्रति क्या स्थिति देश मे है। 
 इस आधार पर कहे तो हम लिंग परीक्षण द्वारा बड़ी तादाद में लड़कियों को पैदा होने से ही रोक देते हैं और जो लड़कियां पैदा होती भी हैं, उनके भी जीने की संभावनाएं लड़कों के मुकाबले बहुत कम होती हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार एक दशक में लगभग 70 लाख लड़कियां हमारी गलत सामाजिक सोच की भेंट चढ़ जाती हैं। जो की संख्या की दृष्टि से बुल्गारिया जैसे देश की पूरी आबादी के बराबर है। 
                    तो सवाल तो बहुत हैं, लेकिन बात वर्तमान की कर लेते हैं। नवरात्रि अपने ढलान पर है। अब दिखावे की संस्कृति अपने चरम पर होगी, यह नहीं कि समाज में अब सब दिखावा ही है, लेकिन दिखावे का हिस्सा बढ़ गया है। ऐसे में कन्यापूजन और कन्याओं को भोजन कराके देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ होगी। प्रश्न यहां भी उठता है, कि क्यों आज एक ही कन्या को दस-दस घर पूजन के लिए जाना पड़ता है। उसका कारण भी स्पष्ट है, कन्याओं की उस समाज में कमी जहां उन्हें देवी स्वरूपा और महिलाओं को श्रेष्ठ स्थान देने की बात की गई है। हम कहते हैं,  यत्र नारी पूज्यन्ते तत्र देवता रमन्ते। क्या वास्तव में हम उस वातावरण में आज तलक पहुँच पाए हैं, जहां यह कहा जा सके, कि महिलाओं को उचित स्थान दे पाए हो, फ़िर हम कहाँ से आश कर लेते हैं, देवता के रमने की। एक तरफ़ बात कन्या पूजन की, दूसरी तरफ़ इनकी कम होती संख्या समाज के लिए दोहराव की स्थिति निर्मित करती हैं। क्या हम ऐसा समाज बना पाए हैं, जहां पर प्रतिदिन इनका सम्मान कर पाते हो। फ़िर हमें सोचना होगा, कि हमने कैसा बाहरी खोल ओढ़ रखा है, जो गीदड़ के रूप को ढ़ककर शेर के खोल ओढ़ कर चलने से भी खतरनाक है। हम नौ दिन तो कन्या पूजन की बात करते हैं। उसके बाद उन्हीं अबोध और नाज़ुक बच्चियों को अपनी हवस का शिकार समाज बनाता है। इससे बिगड़ा हुआ और दुश्चरित्र समाज का ओर क्या हो सकता है।
                आए दिन अखबारों के पन्ने बच्चियों से लेकर अस्सी वर्ष तक की वृद्ध महिलाओं के साथ दुष्कर्म की खबरों से भरा अखबार हमें यह बताता है, कि समाज कितना गन्दा हो चला है। फ़िर भी कोई सुधार नहीं दिखता। तो ऐसे में दिखावे की संस्कृति के क्या भलीभूत परिणाम? आज के पश्चिमकरण के दौर में यह कहना भी गलत ही होगा, कि कहां पर बच्चियां सुरक्षित हैं, क्योंकि जान-पहचान, यहां तक उनके ख़ुद के पालनकर्ता की दृष्टि भी जब कुदृष्टि में बदल जाए। फ़िर बेइंतहा की सारी सीमाएं टूट जाती है। समाज इससे और कितने घिनोने स्तर तक गिर सकता है। फ़िर यह सोचना मुश्किल हो जाता है। हद के आखिरी सीमा की पृष्ठभूमि तो घर की दहलीज पर ही लिखी जाती है, जब कन्याभ्रूण हत्या की जाती है। क्या यह किसी बड़े अपराध से छोटा है, क्या। इसके बाद अगर कन्या घर की चौखट पर क़दम रख दे। तो उसे भेदभाव, असुरक्षा, अस्मिता के साथ खिलवाड़, अन्याय और शोषण का अंतहीन समय तक शिकार होना पड़ता है। ऐसे में बहुतेरे सवालात खड़े होते हैं। हमने स्त्रियों और बच्चियों के लिए कैसा वातावरण निर्मित कर दिया है? क्या उनकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ समाज की सुरक्षा को चुनौती देना नहीं है? क्यों नहीं समाज हर बच्चियों में अपनी बहन- बेटी का अक्स देखता?
             ऐसे वक्त में आज हमें संकल्प लेना चाहिए, कि अगर किसी की बहन- बेटी घर की दहलीज से बाहर निकली है। तो वह सुरक्षित घर पहुँचेगी। कन्या पूजन भले न हो, लेकिन उसकी अस्मिता और आबरू की रक्षा होगी। उसके एहसास और आत्मबल का सम्मान हो। समतामूलक समाज उसका अधिकार है, और मिलना चाहिए। अगर हमारा सामाजिक ताना- बाना यह सुनिश्चित करने में असमर्थ है, फ़िर वर्ष में दो बार कन्या पूजन का दिखावा और आडम्बर क्यों? आडम्बर और दिखावा समाज शुरू से करता आया है। अब सोच में बदलाव लाने की भी आवश्यकता है। तभी कन्या पूजन और नवरात्रि की सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
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