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प्यार,आस्था व विस्वास का पर्व ‘करवा चौथ’

भारतीय संस्कृति में व्रत,पर्व व त्यौहारो का बड़ा विशेष महत्व होता है।प्रत्येक पर्व व त्यौहार एक सन्देश लेकर आते है।अखंड सौभाग्य का प्रतीक करवा चौथ का व्रत भी सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है ।यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मुख्यतः उत्तरी भारत में बड़े उत्साह और उमंग से मनाया जाता है।आधुनिकता के दौर में आज भी भारतीय महिलाये प्राचीन काल से चली आरही परंपराओं को आस्था और विस्वास से निभा रही है। यह भी सत्य है कि आधुनिकता के दौर में परंपराओं का स्वरूप भी कुछ आधुनिक हो गया है।

सरगी
सरगी करवाचौथ व्रत का मुख्य आधार बिंदु है।इसके बिना व्रत अधूरा है।सास अपनी बहू को तारो की छांव में मिठाई,फल,सब्जी,पूरी व सुहाग की वस्तुएं थाल में सजा कर देती है। ये भोजन व्रत करने वाली करती है। इसके पश्चात सुहागिन महिलाएं सुबह स्नान करके शिव परिवार को नमन कर व्रत का संकल्प करने के साथ व्रत की सुरुआत होती है। पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं ।रात्रि में चंद्रोदय पर अध्र्य देकर, पति का चेहरा देखकर उपवास खोलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए बिना जल ग्रहण किए यह कठिन व्रत प्यार, आस्था और विश्वास के साथ रखती है सुहागिन महिलाएं जहां अपने अखंड सौभाग्य के लिए व्रत रखती है तो अविवाहित युवतियां अपने सुंदर और योग्य वर की कामना के साथ में उत्साह से व्रत रखती है । करवा चौथ का त्यौहार राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल में उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

क्या कहती है महिलाएं
अंतरराष्ट्रीय ख्यातिनाम साहित्यकार, लेखक एवं शिक्षविद डॉ अतिराज सिंह बीकानेर का मानना है ;-
करवा चौथ एक पारंपरिक त्योहार है। यह सुहागिन महिलाओं के लिए पति की शुभकामना का संदेश लेकर आता है। इस दिन घर में खुशी का माहौल होता है। इस खुशी के पीछे छिपी है एक पौराणिक कथा।
कहा जाता है कि उम्र पूरी मानकर जब यमराज सती सावित्री के पति सत्यवान का प्राण लेने के लिए आए तो सावित्री अपने पति को बचाने के लिए एक चट्टान की तरह यमराज के सामने खड़ी हो गयी। हारकर यमराज ने सत्यवान के बदले उसे वर माँगने के लिए कहा। अन्य वरदान के साथ सावित्री ने पुत्रवती होने का भी वरदान माँगा। यमराज ने “तथास्तु” कह दिया, परंतु तुरत ही उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। अब हो भी क्या सकता था? उन्हें सत्यवान के प्राण को लौटाना पड़ा।
तब से इस व्रत की महत्ता स्थापित हुयी। यह व्रत निर्जला होता है। करवा चौथ को, सूर्योदय से पहले सुहागिनें सरगी करती हैं जो सासू माँ द्वारा दी गयी होती है। इस दिन महिलाएँ मेहंदी लगाती हैं, सुहाग की चूड़ियाँ व नव वस्त्र – आभूषण धारण करती हैं। पति के लिए शुभकामना करती हुयी शाम को एकत्र होकर गौरी का पूजन कर कथा सुनती हैं। चाँद देखने के बाद पति के हाथ से जल ग्रहण करके व्रत समाप्त करती हैं। निश्चित रूप से हम कह सकते हैं कि ऐसे ही व्रत – त्योहार हमारे स्नेहिल संबंधों तथा सामाजिक, पारिवारिक व पारंपरिक मूल्यों की महत्ता को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं।

प्रसिद्ध साहित्यकार, लेखिका सुवर्णा परतानी हैदराबाद का कहना है :-
भारत धार्मिक परम्पराओं का देश है जहाँ हर रिश्ता एक परम्परा में बँधा है और परिवार समाज का आधार है और इससे जुड़ी कई परम्परायें समाज में देखने मिलती है। इसी आधार पर हिंदू धर्म में करवा चौथ हर नारी के जीवन में सबसे अहम दिन होता है। नारी को शक्ति का स्वरूप माना जाता है, और स्त्री में इतनी शक्ति होती है के वो यदि चाहे तो कुछ भी हासिल कर सकती है। अपने तप,जप और उपवास के ज़ोर पर अपनी सारी मनोकामना अवश्य पूरी कर सकती है। तप और निर्जल व्रत करके,अन्न और जल का त्याग कर वो अपने पति के लम्बी उम्र की कामना करती है और सदा सुहागन का दान माँगती है। लेकिन वर्तमान में समय के अनुसार बदलते वक्त और आधुनिक सोच के कारण परम्परा और त्योहारों के स्वरूप,विधि और रीत में भारी बदलाव आया है। करवा चौथ से जुड़ी भावना,उसके मायने अब बदलकर कुछ आधुनिक हो गए है। जैसे कामकाजी महिला या अति व्यस्त महिलायें अब मेहंदी की जगह टैटू का प्रयोग करने लगी है ताकि ज़्यादा वक्त भी ख़राब ना हो और जल्द छूट भी जाए। श्रद्धा,भक्ति और विश्वास कही पीछे छोड़कर अब पूरा वक्त सजने सँवरने के लिए ब्यूटी पार्लर में गुजरता है। अब पूजा,व्रत की महत्ता से ज़्यादा प्रदर्शन में विश्वास हो गया है। महँगे कपड़े,गहने अब त्योहार की गरिमा से ज़्यादा प्रदर्शन के लिए पहने जाते है । अब पति भी पत्नी का साथ देता है,और उसके साथ व्रत रखता है,इससे पत्नी को सम्बल मिलता है और प्यार भी बढ़ता है। आजकल करवा चौथ ज़्यादातर होटल्स में मनाते है और पति अपने पत्नी को महँगे महँगे गिफ़्ट देता है।
सब कुछ बदल गया है और बदल रहा है ,पर क्या इस आधुनिक करवा चौथ के कारण हम अपनी परम्परा,संस्कृति को तोड़-मरोड़ तो नहीं रहे? इस के पीछे जो भाव ,जो विश्वास ,जो श्रद्धा थी वो कही कहानी बनकर अतीत में तो नहीं खो रही? आधुनिक होना अच्छी बात है पर बिना हमारी परम्परा को धक्का लगते हुए। करवा चौथ का स्वरूप मत बदलो क्यूँ की  नारी के प्रेम,आस्था और समर्पण का त्योहार होता है करवा चौथ। हम है भारतीय,हमें है अपनी संस्कृति का मान, निभाएँगे और रखेंगे , हम सदा इनका सम्मान।

निभाएँगे और रखेंगे ,हम सदा इनका सम्मान। लेखिका निक्की शर्मा” रश्मि” मुम्बई का कहना है :-
सजना है मुझे सजना के लिए.. सही कहा न।सचमुच करवाचौथ के दिन पुरा दिन व्रत करने के बाद भी थकान नहीं लगती।उत्साह रहती है अलग ही क्योंकि आज का दिन पुरा हम बस अपने लिए सोचते हैं।रोज की भागादौड़ी के बीच कुछ समय खुद के लिए निकालते हैं।श्रृंगार के साथ हर पल पति का साथ होता है उस दिन।एक दुसरे के लिए फिक्र,प्यार ,समर्पण एक नयी ऊर्जा से भर देता है जेहन में।करवाचौथ लेकर आता है बहुत सारा प्यार और एक दुसरे का साथ।मेरे लिए तो सबसे बड़ी बात यही है।उस दिन हम दोनों साथ होते हैं हर पल और क्या चाहिए जिंदगी से बस यूं ही साथ बना रहें हमेशा।

शम्भू पंवार
ब्यूरो चीफ,
ट्रू मीडिया,दिल्ली
चिड़ावा।

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