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प्रदूषण से सांस लेना भी हो गया है दुर्लभ

पर्यावरण प्रदूषण एक विश्वव्यापी समस्या है। पेड़-पौधे, मानव, पशु-पक्षी सभी उसकी चपेट में है। कल कारखानों से निकलने वाला उत्सर्जन, पेड़ पौधों की कटाई, वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण ने मानव जीवन के समक्ष संकट खड़ा कर दिया है।
लैंसेट जर्नल नामक एक पत्रिका में शुक्रवार को प्रकाशित एक अध्ययन में पर्यावरण प्रदूषण से मानव जीवन को होने वाली हानि की जानकारी दी गई है। मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट में प्रदूषण से होने वाले भयावह खतरे और अकाल मौतों से अवगत कराया गया है। प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारत सबसे टॉप पर हैै। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2015 में वायु, जल, ध्वनि और दूसरे तरह के प्रदूषणों की वजह से दुनिया में सबसे ज्यादा मौत हुईं। प्रदूषण की वजह से उस साल देश में 25 लाख लोगों की जान गई। शोधकर्ताओं ने कहा कि इनमें से अधिकतर मौतें प्रदूषण की वजह से होने वाली दिल की बीमारियों, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और सांस की गंभीर बीमारी सीओपीडी जैसी गैर संचारी बीमारियों की वजह से हुईं। प्रदूषण की वजह से दुनिया भर में प्रतिवर्ष करीब 90 लाख लोगों की मौत होती है जो कुल मौतों का छठा हिस्सा है। अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण इसका सबसे बड़ा कारक है जिसकी वजह से 2015 में दुनिया में 65 लाख लोगों की मौत हुई जबकि जल प्रदूषण (18 लाख मौत) और कार्यस्थल से जुड़ा प्रदूषण (8 लाख मौत) अगले बड़े जोखिम हैं। शोधकर्ताओं में दिल्ली में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) दिल्ली और अमेरिका के इकाह्न स्कूल आफ मेडिसिन के विशेषज्ञ शामिल थे। शोधकर्ताओं ने कहा कि प्रदूषण से जुड़ी 92 फीसद मौत निम्न से मध्यम आय वर्ग में हुईं।
देश की राजधानी दिल्ली में हवा मानक स्तर से ज्यादा है। दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 हमारे देश के हैं। भारत में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण दिल्ली में है। दिल्ली में सांस के रोगियों की संख्या और इससे मरने के मामले सर्वाधिक हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रदूषण पर अपनी चिंता जाहिर की है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में प्रदूषण के बढ़ते खतरे के कारण दिवाली पर पटाकों की बिक्री पर रोक लगाई थी हालाँकि इस रोक का कोई ज्यादा असर देखने को नहीं मिला।
प्रदूषण का अर्थ है हमारे आस पास का परिवेश गन्दा होना और प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना। प्रदूषण कई प्रकार का होता है जिनमें वायु, जल और ध्वनि-प्रदूषण मुख्य है। पर्यावरण के नष्ट होने और औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है जिसके फलस्वरूप मानव जीवन दूभर हो गया है। महानगरों में वायु प्रदूषण अधिक फैला है। वहां चैबीसों घंटे कल-कारखानों और वाहनों का विषैला धुआं इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में सांस लेना दूभर हो गया है। यह समस्या वहां अधिक होती हैं जहां सघन आबादी होती है और वृक्षों का अभाव होता है। कल-कारखानों का दूषित जल नदी-नालों में मिलकर भयंकर जल-प्रदूषण पैदा करता है। बाढ़ के समय तो कारखानों का दुर्गंधित जल सब नाली-नालों में घुल मिल जाता है। इससे अनेक बीमारियां पैदा होती है। इसी भांति ध्वनि-प्रदूषण ने शांत वातावरण को अशांत कर दिया है। कल-कारखानों और यातायात का कानफाडू शोर, मोटर-गाड़ियों की चिल्ल-पों, लाउड स्पीकरों की कर्णभेदक ध्वनि ने बहरेपन और तनाव को जन्म दिया है। हमने प्रगति की दौड़ में मिसाल कायम की है मगर पर्यावरण का कभी ध्यान नहीं रखा जिसके फलस्वरूप पेड़ पौधों से लेकर नदी तालाब और वायुमण्डल प्रदूषित हुआ है और मनुष्य का सांस लेना भी दुर्लभ हो गया है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार वायु प्रदूषण से केवल भारत में 36 शहरों में प्रतिवर्ष 51 हजार 779 व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हो जाती है। कोलकाता, कानपुर और हैदराबाद में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु दर पिछले तीन-चार वर्षों में दुगुनी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रदूषण के कारण हर दिन करीब 150 लोग मर जाते हैं और हजारों लोग फेफड़े और हृदय की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। दूसरी सबसे बड़ी समस्या जल प्रदूषण की है। कारखानों का कचरा, प्रदूषित जल नदी, तालाबों में निःसंकोच छोड़ दिया जाता है। इससे जल स्रोत प्रदूषित हो गये हैं और कालान्तर में यही जल पीने से हमारा स्वास्थ्य बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है और हम अनेक जानलेवा बीमारियों से पीड़ित हो गये। इसके अलावा वृक्षों की अंधाधुंध कटाई ने भी पर्यावरण को बहुत अधिक क्षति पहुंचाई है। विश्व में हर साल एक करोड़ हैक्टेयर से अधिक वन काटा जाता है। भारत में 10 लाख हैक्टेयर वन प्रतिवर्ष काटा जा रहा है। वनों के कटने से वन्यजीव भी लुप्त होते जा रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल के नष्ट हो जाने से रेगिस्तान के विस्तार में मदद मिल रही है।
मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। पर्यावरण के प्रदूषित होने से हमारे स्वस्थ जीवन में कांटे पैदा हो गए है। विभिन्न असाध्य बीमारियों ने हमें असमय अंधे कुए की ओर धकेल दिया है जिसमें गिरना तो आसान है मगर निकलना भारी मुश्किल। यदि हमने अभी से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाला मानव जीवन अंधकारमय हो जायेगा। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आस-पड़ौस के पर्यावरण को साफ सुथरा रखकर पर्यावरण को संरक्षित करे तभी हमारे सुखमय जीवन को सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सकता है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

 

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