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बजट में कर सुधार का रोडमैप जारी करने का सुझाव

नयी दिल्ली। प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने सरकार को अगामी बजट में कर सुधार का रोडमैप जारी करने का सुझाव देते हुये कहा है कि इससे निवेशकों को अधिक पारदर्शिता मिलेगी और सभी छूट को समाप्त कर न्यूनतम वैकल्पिक कर (एमएटी) को 20 फीसदी किया जाना चाहिए ताकि भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकें। वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ आज यहां बजट पूर्व परिचर्चा के दौरान अर्थशास्त्रियों ने कई सुझाव दिये। उन्होंने कहा कि सरकार को वित्तीय सुदृढ़ीकरण जारी रखना चाहिए। किसी कारण से यदि वित्तीय लक्ष्याें को हासिल नहीं किया जा सकता है तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिये। उन्होंने वृहद अर्थव्यवस्था की स्थिरता से समझौता किये बगैर बुनियादी ढाँचे में निवेश को प्रोत्साहित करने के साथ ही छोटे एवं मझौले उद्यम और निर्माण क्षेत्र को आर्थिक तौर पर सक्षम बनाने के उपाय किये जाने की सिफारिश की। इसके साथ ही महंगाई को चार से छह प्रतिशत के दायरे में रखने को ध्यान में रखते हुये किसानों को उनके उत्पादों के बेहतर मूल्य दिये जाने की भी वकालत की है।

श्री जेटली के साथ इस परिचर्चा में भाग लेने वालों में जे.पी. मॉर्गन के मुख्य भारतीय अर्थशास्त्री साजिद चिनॉय, एनआईएफपी निदेशक डॉ. रतिन रॉय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के जीन ड्रेज, जॉश फेल्मन, बिजनेस स्टैंडर्ड के अध्यक्ष टी.एन. निमन, ओएक्सयूएस इंवेस्टमेंट के प्रबंध निदेशक सुरजीत एस. भल्ला, आदित्य बिड़ला समूह के मुख्य अर्थशास्त्री अजीन रनाडे, आईआईएफटी के निदेशक मजोज पंत, फोरम फाॅर स्ट्रेटिजिक इनिशियेटिव के अध्यक्ष अरविंद वीरमानी, जेएनयू के सीईएसपी के एसोसियेट प्रोफेसर हिमांशु, एनसीएईआर के महानिदेशक शेखर शाह, एचएसबीसी की मुख्य भारतीय अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी, फाइनेंशल एक्सप्रेस के प्रबंध संपादक सुनिल जैन, विश्व बैंक की लीड अर्थशास्त्री रिंकु मुरगल, सेंटर फॉर पाॅलिसी रिसर्च के पार्थ मुखोपाध्याय और आईसीआरआईईआर के निदेशक एवं मुख्य अर्थशास्त्री रजत कथुरिया शामिल थे। इस दौरान नीति आयोग के उपायक्ष राजीव कुमार और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष एवं नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय भी मौजूद थे। अर्थशास्त्रियों ने सरकारी कंपनियों में विनिवेश पर अधिक जोर देने का सुझाव देते हुये कहा कि इससे न/न सिर्फ अतिरिक्त राजस्व मिलेगा बल्कि इससे वित्तीय अंतर को पाटने और आवश्यक व्यय के लिए संसाधन भी जुटाया जा सकेगा। उन्होंने वृद्धा पेंशन को 200 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये और विधवा पेंशन को 300 रुपये से बढ़कार 500 रुपये करने का सुझाव देते हुये कहा कि मातृत्व लाभों को पूरी तरह से क्रियान्वित किया जाना चाहिये और यह लाभ दो बच्चों तक ही मिलना चाहिये। साथ ही सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के भुगतान तंत्र को और सशक्त बनाया जाना चाहिए।
कॉर्पोरेट क्षेत्र की मांग का समर्थन करते हुये अर्थशास्त्रियों ने सभी तरह की छूट को समाप्त कर कॉर्पोरेट कर को 20 फीसदी किया जाना चाहिए क्याेंकि भारतीय उद्योग इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे। उन्होंने न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) को कम करने और दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ में इक्विटी को शामिल करने की सिफारिश की। रोजगार सृजन के लिए एसएमई, औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्र सहित सभी श्रम आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन देने का सुझाव देते हुये कहा कि कर प्रशासन को करदाता के अनुकूल बनाये जाने की जरूरत है। कृषि बीमा योजना की समीक्षा करने की अपील करते हुये अर्थशास्त्रियों ने कहा कि इसे प्रभावी बनाया जाना चाहिए। इससे न/न सिर्फ फसल बर्वाद होने को कवर किया जाना चाहिए बल्कि कीमतें गिरने पर भी बीमा का लाभ मिलना चाहिए।
वित्तीय सुदृढ़ीकरण के लिए उन्होंने दीर्घकालिक न्यू इंडिया बांड से लेकर वित्त, पेंशन और इंफ्रास्ट्रक्चर बांड जारी करने के भी सुझाव दिये। नीतिगत सुधार के जरिये निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निवेश संवर्द्धन इकाई बनाने की सिफारिश करते हुये उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में गैर कृषि कार्यों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अर्थशास्त्रियों ने अधिकाधिक क्षेत्रों को खाेलने की वकालत करते हुये रक्षा क्षेत्र में निजी और सरकारी निवेश बढ़ाने की सिफारिश करते हुये कहा कि इस क्षेत्र में अपार संभावनायें हैं। कुछ अर्थशास्त्रियों ने मनरेगा के तहत दैनिक मजदूरी को न्यनूतम दैनिक वेतन के स्तर पर ले जाने या बाजार दर पर तय करने का भी सुझाव दिया। उन्होंने बैंकिग क्षेत्र में सुधार के लिए भी सुझाव दिये। उन्होंने कर अनुपालन के लिए कर को तर्कसंगत बनाने और कर अनुपालन लागत को कम करने की सिफारिश की और कहा कि अधिकाधिक राेजगार सृजन के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाकर 25 फीसदी की जानी चाहिए और एसएमई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
अर्थशास्त्रियों ने अधिक से अधिक सब्सिडी को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के दायरे में लाने की सिफारिश करते हुये कहा कि इससे रिसाव रोकने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही उन्होंने श्रम सुधार को लागू करने और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए कोष उपलब्ध कराने के लिए कहा।
इस दौरान श्री जेटली ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में शिथिलता के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। पिछले तीन साल में यह दुनिया में सबसे आगे रही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014-15 से लेकर 2016-17 के दौरान भारत की औसत विकास दर 7.5 प्रतिशत रही है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियों में सुधार दिखा है और गिरावट के रुख पर ब्रेक लगा है।
वित्त मंत्री ने कहा कि वित्तीय सुदृढ़ीकरण के रोडमैप का पालन किया जा रहा है। इसी के तहत वर्ष 2015-16 में वित्तीय घाटा जीडीपी का 3.9 प्रतिशत, वर्ष 2

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