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बाल मृत्यु दर में भारत सबसे आगे

हमारे ऋषि-मुनियों के अनुसार भारत माँ के आँगन में जन्म लेने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। यहाँ उत्पन्न प्रत्येक बालिका को देवी और बच्चे-बच्चे को राम का रूप माना जाता है- चंदन है इस देश की माटी तपोभूमि हर ग्राम है। हर बाला देवी की प्रतिमा बच्चा बच्चा राम है। दुःखद विडंबना है कि आज उसी भारत माँ के बच्चे देवी या राम का रूप धारण करने की अवस्था तक पहुँचने से पूर्व ही काल का ग्रास बन जाते हैं। मेडिकल जर्नल लैंसेट की रिर्पार्ट ग्लोबल डिसीज बर्डन स्टडी के अनुसार वर्ष 2016 में पांच वर्ष से कम आयु के 9 लाख बच्चों की मृत्यु अकेले भारत में हुई है, जो दुनिया में सबसे अधिक है।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर में बीआरडी अस्पताल में कई बच्चों की मौत की खबरें सुर्खियों में हैं। वहां हाल ही में 60 से अधिक बच्चों की एक सप्ताह के भीतर मौत हो गई। इनमें से ज्यादातर नवजात थे। वहीं, महाराष्ट्र के नासिक सिविल अस्पताल के विशेष शिशु देखभाल खंड में पिछले महीने 55 शिशुओं की मौत हो गई थी। उत्तर प्रदेश के ही फर्रुखाबाद में जिला अस्पताल में पिछले एक महीने के दौरान ऑक्सीजन की कमी से 49 नवजात बच्चों की मौत के मामला सामने आया था। झारखंड के जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में पिछले 30 दिनों में 64 बच्चों की और 2 महीनों में 100 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल काॅलेज में अगस्त महीने में कुल 296 बच्चों की मौत हो चुकी है। मेडिकल काॅलेज में जनवरी से अब तक 1,256 बच्चों की मौत हुई है। अपर स्वास्थ्य निदेशक कार्यालय से प्राप्त आंकड़े बताते हैं इस वर्ष जनवरी में एनआईसीयू तथा जनरल चिल्ड्रेन वार्ड में 143 और इंसेफलाइटिस वार्ड में नौ बच्चों की मृत्यु हुई है। इसी प्रकार फरवरी में क्रमशः 117 तथा पांच, मार्च में 141 तथा 18, अप्रैल में 114 तथा नौ, मई में 127 तथा 12, जून में 125 तथा 12, जुलाई में 95 एवं 33 और अगस्त माह में 28 तारीख तक एनआईसीयू में 213 तथा इंसेफलाइटिस वार्ड में 83 बच्चों की मौत हुई है।
अब हमारे पास पर्याप्त (और विश्व स्तर पर स्वीकार किए गए) साक्ष्य हैं कि हमारा देश बाल मृत्यु दर के मूल्यांकन में सुधार करने में ज्यादा महत्व नहीं दे रहा है, लेकिन वास्तव में यह शर्मनाक मामला है, जो हमारे देश के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण चिंता का विषय बना हुआ है। बच्चों में ऐसी उच्च मृत्यु दर के कारणों की कोई बड़ी जाँच नहीं हुई है (सिवाय अगर हम गोरखपुर और अन्य सरकारी अस्पतालों में बच्चों की उच्च मृत्यु की हालिया घटनाओं पर केंद्रित चर्चाओं की गणना नहीं करते हैं)। मूल कारणों की जाँच और कोई भी रचनात्मक कार्रवाई न होने के कारण दुर्भाग्य से लड़कियाँ लापता हो रही है। इस प्रकार, हम जोखिम के दायरे में धीरे-धीरे प्रवेश कर रहे हैं। जब देश में बच्चों के स्वास्थ्य की बात आती है, तो स्वास्थ्य को प्रभावित करने में संक्रामक रोग, दस्त, कुपोषण आदि परंपरागत कारण अहम भूमिका निभाते हैं। ग्लोबल आँकड़े बताते हैं कि दस्त एक खतरनाक हत्यारा है – अर्थात् दस्त के कारण बहुत से बच्चों की मौतें हुई हैं और साथ ही यह 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत का चैथा सबसे बड़ा कारण माना जाता है। वर्ष 2015 में दस्त और अन्य संबंधित बीमारियों से करीब 1,00,000 भारतीय बच्चों (5 वर्ष से कम आयु वाले) की मृत्यु की सूचना मिली थी। जबकि दस्त के कारण बच्चों की मृत्यु दर में निश्चित रूप से गिरावट आई है (विशेष रूप से बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान शुरू किए जाने के कारण), लेकिन फिर भी डेंगू और मलेरिया जैसी अन्य बीमारियों से अभी भी लगातार बच्चों की मौतें हो रही हैं।
हालाँकि, पोषण संबंधी मामलों में केंद्र सरकार ने बढ़-चढ़ कर कार्य योजना का शुभारंभ किया है। केंद्र सरकार निर्धारित पोषण लक्ष्यों की उपलब्धियों के आधार पर, देश के विभिन्न जिलों के लिए प्रोत्साहन आधारित पुरस्कार योजना शुरू करने की योजना बना रही है। यह योजना उन जिलों पर विशेष ध्यान देगी, जिनमें कुपोषण से पीड़ित बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। सरकार अपने व्यक्तिगत पोषण स्तरों के आधार पर राज्यों और जिलों को श्रेणीकृत करने की योजना बना रही है। हालाँकि, इस तरह के सामान्य बाल मृत्यु दर में सुधार की योजनाएँ बेहद प्रशंसनीय हो सकती हैं, लेकिन देश में बच्चों के स्वास्थ्य और कल्याण को बेहतर बनाने के लिए भारत को क्या करना जरूरी है और तत्काल आधार वाली आवश्कताएँ क्या हैं, इसके लिए महिला और बाल विकास एवं स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को एक मजबूत कार्य योजना को तैयार करनी होगी।

– देवेंद्रराज सुथार

लेखक जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में अध्ययनरत है।

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