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जानें कौन थीं गौरी लंकेश और हिंदुत्व को लेकर क्या थी उनकी सोच

बैंगलुरू। वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की मंगलवार को बैंगलुरू में तीन अज्ञात हमलवारों ने गोली मारकर हत्या कर दी। जिस वक्त गौरी को गोली मारी गई,उस वक्त वो बैंगलुरू के राजाराजेश्वरी नगर में अपने घर के बाहर खड़ी थीं।

उनकी हत्या के बाद से कर्नाटक के साथ ही देश की सियासत गरमा गई है। क्योंकि उन्हें खुले तौर पर दक्षिणपंथी विचारधारा का विरोधी माना जाता था। ऐसे में उनकी हत्या को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं।

यहां हम बताएंगे कि आखिर कौन थीं गौरी लंकेश, कैसे उनका पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ और किस तरह वो हमेशा दक्षिणपंथी विचारधारा के निशाने पर रहीं।

1962 में पैदा हुई गौरी लंकेश के पिता पी लंकेश खुद भी एक पत्रकार थे और कन्नड़ में लंकेश पत्रिका नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका निकालते थे। बाद में गौरी इसकी संपादक बनीं। पत्रकार होने के साथ गौरी लंकेश एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं।

लंकेश ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत बैंगलुरू में ही एक अंग्रेजी अखबार से की थी। यहां कुछ वक्त काम करने के बाद वो दिल्ली चली गईं। कुछ साल दिल्ली में बिताने के बाद वो दोबारा बैंगलुरू लौट आईं और यहां 9 साल तक संडे नाम की एक मैग्जीन में बतौर कॉरेसपॉन्डेंट काम किया।

पिता की मौत के बाद उनके भाई इंद्रजीत और उन्होंने पत्रिका लंकेश की कमान संभाली।कुछ साल तो उनके और भाई के रिश्ते ठीक रहे। मगर साल 2005 में नक्सलियों से जुड़ी एक खबर के चक्कर में भाई और उनकी बीच खटास पैदा हो गई। दरअसल भाई ने खबर के जरिए नक्सलियों को हीरो बनाने के आरोप लगाए। इसके बाद दोनों के बीच का विवाद खुलकर सामने आ गया।

दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि भाई इंद्रजीत ने उनके खिलाफ पुलिस थाने में ऑफिस के कम्प्यूटर,प्रिंटर चुराने की शिकायत कर दी। वहीं गौरी ने भाई के खिलाफ ही हथियार दिखाकर धमकाने की शिकायत दर्ज करा दी।

इसके बाद गौरी ने अपना खुद की साप्ताहिक कन्नड़ गौरी लंकेश पत्रिका निकालनी शुरू कर दी। वो खुले तौर पर हिंदुत्ववादी राजनीति की मुखालफत करती थीं। साल 2003 में भी उन्होंने संघ परिवार की उस कोशिश का भी विरोध किया था। जिसके तहत बाबा बुदन गिरी में मौजूद गुरू दत्तात्रय बाबा बुदन दरगाह के हिंदूकरण की बात सामने आ रही थी।

इतना ही नहीं साल 2012 में उन्होंने एक प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया। जहां गौरी ने मैंगलोर के साम्प्रदायिक संस्थाओं पर बैन लगाने की वकालत की। इसी दौरान उन्होंने खुले तौर पर हिंदुत्व की विचारधारा को आड़े हाथों लिया और कहा कि हिंदू कोई धर्म नहीं है,बल्कि समाज का एक ऐसा सिस्टम है,जिसमें महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता है।

साल 2014 में भी गौरी लंकेश का भाजपा की तऱफ से खुलकर विरोध हुआ था। क्योंकि उस वक्त राज्य की कांग्रेस सरकार ने उन्हें नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने के लिए बनाई गई कमेटी का सदस्य बना दिया था। इस पर भाजपा के प्रतिनिधिमंडल ने सीएम सिद्धारमैया से मुलाकात कर उन्हें कमेटी से हटाने की भी मांग की थी। लेकिन तत्कालीन सीएम ने उन्हें नहीं हटाया।

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