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बेरोजगारी पर भारी है देशभक्ति का खुमार

इस वर्ष हम 71वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। बाजार इस बार पहले से ज्यादा तिरंगे झंडों, बाजू बांधों, पटकों और देशभक्ति के समान से पटा पड़ा है। देशभक्ति पर बाजार हावी है और बाजार ही क्यों डिजीटल इंडिया के दौर में सोशल साइटें भी देशभक्ति के भावों से भरी पड़ी हैं। बाजार में तिरंगा वस्तुओं और झंडे की उसी प्रकार भरमार है, जैसे पहले दीवाली पर पटाखे और फुलझड़ियों और मिठाईयों की होती थी। आने वाले वर्षों में यह बाजार और विकसित होता जायेगा। 15 अगस्त की शाम होते-होते तिरंगों का बाजार सिमट जायेगा और हर जगह इस बात की चर्चा होगी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिला की प्राचीर से क्या कहा और मीडिया में भी वही सुर्खियाँ बनेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिला की प्राचीर से मधुर भाषण देंगे लेकिन बेरोजगार नौजवानों को उम्मीद है कि वह बेरोजगारी खत्म करने के लिए कोई क्रांतिकारी कदम उठायेंगे, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बेरोजगारी गंभीर समस्या है लेकिन सरकार गंभीर नहीं है और उसे लगता है कि केवल प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और मुद्रा योजना से ही बेरोजगारी दूर हो जायेगी, प्रतियोगिता जबकि इसके और साधन व संसाधन जुटाने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री के भाषण के साथ ही यह मंथन भी शुरू हो जायेगा कि आजादी के 71 साल बाद क्या हम सही मायनों में आजाद और विकसित हो पाये हैं?

बाजारवाद और आर्थिक उदारीकरण के दौर में भौतिकवाद ने हमारे आचार-विचार और रहन सहन को भी बदल दिया है। सरसरी दृष्टि से देखने पर लगता है कि भारत वैश्विक विकसित देशों से मुकाबला करने की स्थिति में है। भारत ने विज्ञान, तकनीक, प्रौद्योगिकी में तरक्की की है और यही कारण है कि विश्व की बड़ी-बड़ी कम्पनियां भारत में उद्योग स्थापित कर रही हैं। जब समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है तो भी भारत की अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से स्थिर है लेकिन इसमें एक बड़ा कारण बाजारवाद भी है, जहां छोटे घरेलू निवेशकों की बड़ी भूमिका रहती है जबकि उनके निवेश पर सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती, लेकिन व्यापारी को बाजार चाहिए और बाजार को खरीददार चाहिए। डिजीटलीकरण के दौर में घर बैठे देश-विदेश में बातचीत और लेन-देन सुगम हो गया है। महिलाएं व युवतियां शिक्षित होकर घर से बाहर जाकर नौकरी-पेशा कर रही हैं और गांवों का बड़ी तेजी से शहरीकरण हो रहा है लेकिन इस सबके बावजूद हमारा युवा वर्ग हताश है। प्रतियोगिता चुनिंदा नौकरियों को छोड़ दें तो आर्थिक उदारीकरण के चलते बड़े पैमाने पर ठेके पर भर्तियां की जाती हैं, जहां मजदूर वर्ग से लेकर मध्यम श्रेणी तक के कर्मचारियों का भरपूर शोषण होता है और इसमें केन्द्र एवं राज्य सरकारों के मूक सहमति होती है। श्रम कानूनों को लचीला बनाने की बात होती है लेकिन उनकी हालत यह है कि कानून तोड़ने वालों को 50 या 100 या 500 रूपए ही जुर्माने का प्रावधान है और श्रम अदालतों की तो बात ही छोड़ दें तो अच्छा है। श्रम अदालतों को 6 माह में मामले का निपटारा करने का प्रावधान किया गया है लेकिन वहां 10 से 20 सालों तक मामले लंबित रहने से न्याय का उम्मीद बेमानी है और कई मामलों में तो देखने में आया है कि सुप्रीम कोर्ट तक से जीते हुए मामलों में प्रबंधन कानून का खुलेआम दुरूपयोग करता है और कोर्ट का आदेशों को ठेंगा दिखाकर कर्मचारियों को पुन: निकाल देता है और ऐसा सरकार का शह के बिना संभव नहीं होता है।

हमें आज से 71 साल पहले जीने की आजादी तो मिल गई लेकिन इतने साल बीतने के बावजूद भी गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, आतंकवाद जैसी अनेक समस्याओं से स्वतंत्रता नहीं मिली है। भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है। हमारे देश की जीडीपी करीब 7.5 फीसदी के आसपास  है। लेकिन इसके बावजूद विश्व में जितनी गरीबी है उसका तीसरा हिस्सा सिर्फ भारत में है। 2010 की विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय मानक के हिसाब से भारत की 32.7 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे अपना गुजर बसर करती है। योजना आयोग (अब नीति आयोग) के 2009-10 के आंकड़ों के अनुसार पांच साल में देश में गरीबी 37.2 फीसदी से घटकर 29.8 फीसदी पर आ गई है। लेकिन गरीबी रेखा की सीमा तय करने पर विवाद होता रहा है और सच्चाई भी यही है कि जो सरकारी सीमा है उसमें तो कोई शहरी या ग्रामीण हर दिन भरपेट दो वक्त के खाना भी नहीं खा सकता, प्रतियोगिता चाय, प्रतियोगिता नाश्ता और फल आदि को दूर की बात है। विश्व बैंक के साल 2015 के आंकड़ों के मुताबिक देश की कुल आबादी के 12.4 फीसदी लोग अभी भी गरीबी रेखा से नीचे जीने पर मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की 2014-15 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 194.6 मिलियन करीब 19 करोड़ 40 लाख 60 हजार लोग भुखमरी का शिकार हैं जो विश्व में किसी भी दूसरे देश के मुकाबले सबसे ज्यादा हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एएफओ) ने अपनी रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ फूड इन सिक्युरिटी इन द वर्ल्ड 2015’ में यह बात कही गई है। भारत में भी 1990 तथा 2015 के दौरान भूखे रहने वाले लोगों की संख्या में गिरावट आई है। 1990- 92 में भारत में यह संख्या 21.01 करोड़ थी जो 2014-15 में घटकर 19.46 करोड़ रह गई है। विगत 25 वर्षों में यह 36 प्रतिशत से घटकर 15.2 प्रतिशत रह गई है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2009 में 23 करोड़ 10 लाख लोग भुखमरी का सामना कर रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015 तक वैश्विक स्तर पर भुखमरी आधी किये जाने का लक्ष्य तय किया गया था, प्रतियोगिता जिसे नेपाल और बंग्ला देश को पूरा कर पाये हैं लेकिन भारत अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका है।

सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बेरोजगारी है। यूएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017-18 में देश में बेरोजगारी की दर और बढ़ सकती है। 2015-16 में बेरोजगारी की दर पिछले पांच साल के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। 2012-13 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 15 से 29 साल के युवाओं की बेरोजगारी दर 13.3 फीसदी है। देश में सबसे ज्यादा बेरोजगार 20 से 24 साल के लोग हैं।  देश में 25 फीसदी इस उम्र के लोगों के पास कोई काम-धंधा नहीं है। देश में 25 से 29 साल की उम्र के ऐसे 17 फीसदी युवा हैं जो पूरी तरह बेरोजगार हैं।  20 साल से ज्यादा उम्र के करीब 14 करोड़ 30 लाख ऐसे युवा हैं जो नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। सरकारी दावों के बावजूद देश में करीब 12 करोड़ लोग पूरी तरह बेरोजगार हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 1991 से 2013 के बीच भारत में करीब 30 करोड़ लोगों को नौकरी की जरूरत थी जबकि इस दौरान केवल 14 करोड़ लोगों को रोजगार मिल सका है।

बेरोजगारों की बढ़ती संख्या को देखते हुए मोदी सरकार ने  स्किल इंडिया के तहत 2 अक्टूबर 2016 को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक और दो शुरू की हैं। इन योजनाओं के माध्यम से 2016 से लेकर 2020 तक 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य रखा गया है। रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में सरकार नाकाम रही है और भारतीय मजदूर संघ के अनुसार केवल नोटबंदी की वजह से 20 लाख नौकरियां चली गईं हैं और उसके बाद जो पुन: भर्तियां हो रही हैं, उसमें ठेकेदारी प्रथा बढ़ गयी है और कर्मचारियों का शोषण हो रहा है। राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के प्रतिनिधि चौधरी जिले सिंह का कहना है कि मोदी सरकार बनने के बाद बेरोजगारी और कर्मचारियों का शोषण लगातार बढ़ रहा है और प्राइवेट सेक्टर में तो श्रम कानूनों का निरंतर उल्लंघन हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी कि दर बढ़ेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बेरोजगारी अल्पकालिक तौर पर बढ़ सकती है लेकिन विदेशों की तुलना में भारत में इसका व्यापक असर दिखेगा क्योंकि श्रम बल में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, जबकि रोजगार के मौके कम हैं। देश के सामने बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है। नौजवान शिक्षित हैं लेकिन व्यवसायपरक शिक्षा की कमी से युवा पढ़ाई के बाद भी बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं और यही कारण है कि चपरासी की मामूली सी नौकरी के लिए बी.ए., एम.ए. सहित बड़े-बड़े डिग्रीधारकों के आवेदनों की खबरें सुर्खियाँ बनती हैं।

विजय शर्मा

डब्ल्यू जेड-430 ए, नानकपुरा, हरि नगर

दिल्ली-110064.

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