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भाजपा व कांग्रेस दोनों की दुखती रग बना गुजरात

दोनों राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस की प्रतिष्ठा का सवाल बने गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए दोनों ही राजनीतिक पार्टियां एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। एक तरफ कांग्रेस जहां सत्ता हथियाने के लिए जोर आजमाईश कर रही है वहीं भाजपा इसे बचाये रखने के लिए हाथ पांव मार रही है। कुल मिलाकर कहें तो गुजरात एक ऐसी दुखती रग बन गया है जिसका इलाज फिलहाल किसी के पास नहीं है। पिछले 22 सालों से 60 सीटों तक सीमित रही कांग्रेस एकै साधे सब सधै की तर्ज पर इस बार भाजपा से नाराज चल रहे पटेल और पाटीदार समाज को साधने में लगी हुई है। वहीं भाजपा अपनी सत्ता बचाये रखने के लिए हर जतन कर रही है। इससे इतर भाजपा को घेरने के लिए विकास को पागल करार दे रही कांग्रेस के भीतर ऐसे हालात बनने लगे हैं, जिनके कारण उसके समक्ष एक तरफ कुंआ तो दूसरी तरफ खाई जैसी परिस्थितियां निर्मित होती दिखाई दे रही हैं।
कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में गहरा प्रभाव रखने वाले अहमद पटेल के मामले को लेकर कांग्रेस मुश्किल में है। अभी हाल ही में अहमद पटेल से जुडे एक अस्पताल से आईएस आतंकी की गिरफ्तारी से जहां कांग्रेस को घेरने के लिए भाजपा को प्रभावशाली मुद्दा मिला है, वहीं कांग्रेस की दुविधा यह है कि वह अहमद पटेल से दूरी भी नहीं बना सकती क्योंकि इससे उसे मुसलमानों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है, जो कांग्रेस कतई नहीं चाहती। दूसरी तरफ भाजपा से नाराज चल रहे पाटीदार समुदाय ने भी उसके सामने बड़ा धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। जिस तरह से पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को समर्थन करते दिखाई प्रतीत हो रहे थे, उससे कांग्रेस की बांछे खिली हुई थी। उसे उम्मीद थी कि पटेलों के समर्थन से इस बार वह किला फतह कर लेगी, लेकिन यहां भी मुश्किलें दीवार बनकर खड़ी हो गई हैं।
दरअसल, हार्दिक पटेल जिस मुद्दे पर गुजरात में उभरे हैं, उस मुद्दे पर अडिग रहना उनकी राजनीतिक मजबूरी है। इसलिए हार्दिक पटेल ने अब कांग्रेस के सामने यक्ष स्थिति पैदा कर दी है। हार्दिक पटेल ने कांग्रेस से सवाल किया है कि पटेल आरक्षण पर कांग्रेस अपना रुख स्पष्ट करे। हार्दिक ने पूछा है कि कांग्रेस संवैधानिक दायरे में पटेलों को किस तरह से आरक्षण देगी। जाहिर है इस सवाल का जवाब दे पाना कांग्रेस के लिए भी सहज नहीं है क्योंकि पटेलों को आरक्षण तो भाजपा सरकार ने भी दिया था लेकिन कोर्ट ने उसमें अड़ंगा लगा दिया। अब हार्दिक ने कांग्रेस से सफाई मांगकर उसके सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है। वैसे कांग्रेस ने इसके लिए तीन फार्मूले भी सुझाए हैं लेकिन अभी बात बनी नहीं है।
बहरहाल, गुजरात चुनाव में इस बार सबसे खास बात यह भी है कि राज्य में मुख्यमंत्री रह चुके नरेद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री के रुप में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह से राज्य में उनके ताबड़तोड़ दौरे हो रहे हैं उससे एक बात तो साफ है कि भाजपा के लिए भी इस बार गुजरात चुनाव लोहे का चना ही साबित हो रहा है। यानी आसानी से जीत नहीं मिलने जा रही है। हां, अच्छी बात यह है कि गुजरात चुनावों में चाहे विरोधी दलों की बयानबाजी हो या फिर भाजपा नेताओं के बयान, सभी अब विकास की बात करते दिखाई दे रहे हैं। यानी गुजरात में अब विकास ही राजनीतिक मुद्दा है।
वैसे जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत दर्जन भर केंद्रीय मंत्री गुजरात में धुआंधार प्रचार कर रहे हैं उससे खुद कांग्रेस के कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक भी यह बात स्वीकार करने लगे हैं कि कांग्रेस की स्थिति में सुधार अवश्य हो सकता है, परंतु सरकार नहीं बन सकती। तमाम किंतु परंतु के बावजूद राजनीतिक स्थितियां जो तस्वीर प्रदर्शित कर रही हैं, वह यह स्पष्ट कर रही हैं कि फिलहाल नरेन्द्र मोदी का तोड़ अब तक कांग्रेस ढूंढ नहीं पाई है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस का उनसे मुकाबला कर पाना फिलहाल टेड़ी खीर ही साबित हो रहा है।
बहरहाल, गुजरात चुनाव में जिस प्रकार से राजनीतिक प्रचार किया जा रहा है, उससे यह साफ लग रहा है कि सत्ता के दोनों दावेदारों में घबराहट है। न केवल घबराहट बल्कि अपना अस्तित्व बचाए रखने के सशंकित जिजीविसा भी है। ऐसे में कौन किस परिणति को प्राप्त होगा, यह कहना फिलहाल मुश्किल है। हां, जीत के दावे दोनों तरफ से जरुर किये जा रहे हैं। दूसरी तरफ गुजरात की जनता मौन है। ऊंट किस करवट बैठेगा यह 18 दिसंबर को पता चलेगा।

बद्रीनाथ वर्मा

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