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भारत की कूटनीतिक जीत और इसके मायने

भारत के दलबीर सिंह भंडारी, इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस यानी आईसीजे में न्यायाधीश चुने गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी संस्था आईसीजे की स्थापना 1946 में हुई थी। आईसीजे में कुल 15 जज होते हैं, जिनका चुनाव 9 वर्षों के लिए किया जाता है। इनमें से कार्यकाल पूरा होने के कारण 5 जजों को हर 3 वर्ष बाद चुना जाता है। यह चुनाव यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली और यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल दोनों में एक साथ होता है तथा जीत के लिए किसी भी प्रत्याशी को दोनों चेंबर्स में बहुमत की जरूरत होती है। यानी यूनाइटेड नेशन जनरल असेंबली में 193 में से 97 वोट तथा सुरक्षा परिषद में 15 में से 8 वोटों की जरूरत होती है। इस बार फ्रांस, ब्राजील, सोमालिया, और लेबनान के प्रत्याशियों को आसानी से चुन लिया गया था । यानी इन को संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में आसानी से बहुमत मिल गया था। शेष रही पांचवी सीट पर भारत और ब्रिटेन के बीच कड़ा मुकाबला था। इसमें भारतीय जज दलवीर भंडारी को यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली के 193 में से 183 वोट मिले हैं। जबकि सुरक्षा परिषद के सभी 15 वोट भारत को ही मिले हैं। इन दोनों जजों में से किसी एक को चुनने के लिए 11 राउंड की वोटिंग हुई थी। पिछले हफ्ते जब वोटिंग शुरू हुई थी तो ब्रिटिश जज क्रिस्टोफर ग्रीनवुड को यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली में सिर्फ 68 वोट मिले थे, जबकि भारतीय जज दलवीर भंडारी को 121 वोट मिले थे। हालांकि सुरक्षा परिषद में जस्टिस ग्रीनवुड को 9 वोट मिले थे और जस्टिस भंडारी को 5 वोट मिले थे, क्योंकि ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय अदालत का संस्थापक सदस्य है, लेकिन फिर भी 71 साल के इतिहास में पहली बार ब्रिटेन का कोई भी जज इस अदालत में नहीं होगा। यह बात ब्रिटेन ने कभी सोची भी नहीं होगी। ब्रिटेन को यह समझ आ चुका था कि उसकी हार तय है, इसीलिए ब्रिटेन वोटिंग प्रक्रिया से पीछे हट गया और यू एन में ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने चिट्ठी लिख कर कह दिया था कि अब वोटिंग में और समय खराब करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ब्रिटेन को लगा कि वह महासभा में हार जाएगा तो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि खराब जाएगी। इसके बाद होने वाली फाइनल वोटिंग में जस्टिस भंडारी को यूनाइटेड नेशन जनरल असेंबली के 183 और सुरक्षा परिषद के सभी 15 वोट मिल गए थे। जिससे जस्टिस भंडारी की जीत हुई। जस्टिस भंडारी 27 अप्रैल 2012 से आईसीजे में जज थे और अब दूसरी बार आईसीजे में जज चुने गए हैं। इससे पहले जस्टिस भंडारी भारतीय सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट में जज रहे चुके हैं। जिस समय कुलभूषण जाधव को लेकर आईसीजे में सुनवाई चल रही थी, उस समय भी जस्टिस भंडारी आईसीजे के 11 जजों में से एक थे। आईसीजे में ब्रिटेन के प्रत्याशी द्वारा नाम वापस लेना दर्शाता है कि कूटनीति की दुनिया में भारत की साख ब्रिटेन के मुकाबले बढ़ रही है। महाशक्ति देश अब समझने लगे हैं कि आने वाला समय भारत और चीन का है, लेकिन लोकतांत्रिक देश न होने के कारण अधिकतर देश चीन पर भरोसा नहीं करते हैं। वही ब्रिटेन की ओर ताक रहे देशों को यह लगने लगा है कि ब्रिटेन की अपेक्षा भारत से बेहतर संबंध बनाए रखना उनके लिए ज्यादा फायदेमंद है।
आईसीजे में इन देशों का समर्थन इस बात को प्रमाणित करता है। यह भारत के लिए एक बहुत अच्छी खबर है। इससे कूटनीतिक दुनिया में भारत का कद बढ़ गया है। आईसीजे में जस्टिस भंडारी की जीत सुनिश्चित करने के लिए विदेश मंत्रालय ने पूरा जोर लगा दिया था। भारत के लिए यह जीत इसीलिए भी बड़ी है क्योंकि भारत किसी जमाने में अंग्रेजों का ही उपनिवेश था और आईसीजे मे भारत ने उन्हीं अंग्रेजों को हरा दिया जिन्होंने हम पर 200 वर्षों तक राज किया था। माना जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र के स्थाई सदस्य अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन के उम्मीदवार के पक्ष में थे। इसके बावजूद भारत की जीत ने यह संदेश दिया है कि अब वक्त ब्रिटेन जैसी बड़ी बड़ी शक्तियों का नहीं बल्कि नई उभरती हुई ताकतों का है। जिनमें भारत भी शामिल है और यह बात दुनिया के बड़े-बड़े देशों को स्वीकार करनी होगी। ब्रिटेन यह समझ चुका था कि अगर वह अडकर जीतने की कोशिश करता है, तो इससे उसके भारत के साथ संबंध खराब हो सकते हैं और आज के दौर में दुनिया की कोई भी ताकत भारत के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहती है। वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में भारत का महत्व बढ़ा है। इस जीत से साबित हुआ है कि महासभा के सदस्य सुरक्षा परिषद की मनमानी पर रोक लगा सकते हैं। कुलभूषण जाधव के मामले में अंतिम फैसला दिसंबर में आना है। ऐसे में जस्टिस भंडारी का चुना जाना अहम है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश के चयन में सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों को कोई भी वीटो प्राप्त नहीं होता है, इसी कारण पी-5 समूह किसी भी प्रत्याशी के विरुद्ध वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है। पी- 5 देशों की वीटो पावर एक अलोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की स्थिति में सुरक्षा परिषद अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन नहीं कर पाता है। भारत की जीत मूलतः पी-5 के विरुद्ध लोकतंत्र की जीत है। महत्वपूर्ण मामलों पर महाशक्तियों में मतभेद की स्थिति में वीटो पावर अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। जैसे आतंकी मौलाना मसूद अजर के मामले में चीन ने बार- बार वीटो दुरुपयोग किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सुरक्षा परिषद का गठन हुआ। युद्ध में विजेता रहे अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस ने वीटो अधिकार सहित इस परिषद में स्थाई सदस्यता को हडप लिया है। उसके बाद परिषद के सदस्यों की संख्या बढ़कर 15 तक पहुंच गई है लेकिन इन्होंने किसी और को वीटो का अधिकार नहीं दिया है। भारत के प्रस्ताव पर 193 सदस्य देश सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग पर चर्चा के लिए तैयार हो गए हैं। चीन ने इसमें भी अड़ंगा डालने की कोशिश की है। भारत की कूटनीतिक जीत से एक सकारात्मक माहौल का निर्माण होगा तथा इससे सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की दावेदारी को बल मिल सकता है। अब समय आ गया है कि सभी सदस्य देश सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता के लिए समर्थन करें। ताकि दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए भारत भी वीटो का प्रयोग कर सके।

अश्विनी शर्मा
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
विद्यार्थी पत्रकारिता एवं जनसंप्रेषण
[email protected]

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