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भारत की कूटनीति से चीन की दादागिरी खत्म

भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद सुलझ गया है। दोनों देशों के बीच परदे के पीछे चल रही कूटनीतिक वार्ताओं के बाद सेनाएं हटाने पर सहमति बन गई। टकराव वाली जगह से सेनाओं का हटना शुरु भी हो गया है। डोकलाम समझौता कई प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ गया। पर अंत भला सो भला। भारत ही नहीं समूचे विश्व ने राहत की साँस ली है। इससे एक बारगी युद्ध की स्थिति टल गई है। हालाँकि सदा की तरह ड्रेगन ने अपनी टांग यह कहकर ऊपर रखने का प्रयास किया है की चीन डोकलाम सीमा पर गश्त करता रहेगा। समझौते के अनुरूप दोनों देशों की सेना पीछे हट गई है। युद्ध की धमकियों पर आमादा चीन की यह कूटनीतिक हार है। भारत ने विश्व जनमत को अपने पक्ष में करने में सफलता हासिल करली थी। अमेरिका,जापान और रूस जैसे शक्तिशाली देश भी लगातार भारत का समर्थन कर रहे थे। ड्रेगन इस विवाद में नितांत अकेला पड़ गया था। उसकी युद्ध की गीदड़ भभकियों से भारत नहीं डरा और अपने स्टैंड पर मजबूती से खड़ा रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखा दिया कि भारत की अहमियत क्या है। भारत शुरू से ही विवाद को बातचीत के जरिये सुलटाना चाहता था मगर चीन अपनी दादागिरी से बाज नहीं आरहा था। आखिर विश्व जनमत के आगे उसे झुकना पड़ा। कूटनीतिक मोर्चे पर इसे भारत की बड़ी जीत समझा जा रहा है।
विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके बताया है कि हाल के हफ्तों में भारत और चीन के बीच डोकलाम की घटना के मद्देनजर कूटनीतिक स्तर पर वार्ताएं चल रही थीं। इस बातचीत में हमने अपने हित और चिंताओं पर बात की। इसके आधार पर यह सहमति बनी है कि डोकलाम से सेनाएं हटाई जाएंगी और यह प्रक्रिया शुरु हो गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ब्रिक्स सम्मेलन के लिए प्रस्तावित तीन सितंबर से चीन दौरे के पहले इसे भारत की कूटनीतिक विजय के तौर पर देखा जा रहा है।
डोकलाम में चीन द्वारा सड़क निर्माण के काम में लगाए गए बुलडोजर, टेंट व अन्य निर्माण सामग्री हटा ली गई है। डोकलाम मुद्दे पर भारत अपनी बात पर कायम था और पीछे हटने को तैयार नहीं था। चीन को स्पष्ट संदेश दे दिया गया था। आखिरकार दोनों देश समझौते तक पहुंच गए। इसे कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की बड़ी जीत बताया जा रहा है। ब्रिक्स के अन्य देशों का भी दबाव दोनों देशों पर जल्द विवाद निपटाने को लेकर बना हुआ था। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निश्चित रूप से भारत की कूटनीतिक जीत है। इस विवाद के निपटारे से क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति की स्थापना में मदद मिलेगी। चीन की ओर से जिस तरह से लगातार युद्ध की धमकी दी जा रही थी उससे माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया था। लेकिन भारत लगातार अपनी ओर से संयम बनाए रखा।
चीन से युद्ध की आवाजों के बावजूद कारोबारी कारणों से भारत आश्वस्त था कि चीन अतिवादी कदम नहीं उठाएगा। भारत की ओर से चीन को जितना निर्यात किया जाता है, उसके मुकाबले भारत को चीन का निर्यात पांच गुना है।
सैन्य तैयारी के स्तर पर भी डोकलाम में भारत की पोजिशन मजबूत बताई जा रही है और 1967 में इस इलाके में भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे। भारत की ओर से लगातार राजनयिक माध्यमों से हल निकालने की वकालत की गई। अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इसे परिपक्व व्यवहार माना गया। सूत्रों के मुताबिक, कई स्तरों पर बातचीत हुई। इसमें विदेश सचिव, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और टॉप डिप्लोमेट लगातार जुटे रहे और दोनों पक्षों को स्वीकार्य हल निकाला जा सका। भारत, चीन और भूटान की सीमाओं के जंक्शन डोकलाम पर जून मध्य के बाद से तनाव बना हुआ था। डोकलाम इलाका भूटान का है, लेकिन चीन इस पर दावा जताता रहा है। 16 जून को चीन की सेना की कंस्ट्रक्शन टीम भारी संख्या में मशीनों और वाहनों के साथ आई और सड़क बनाने की कोशिश करने लगी। भूटान के सैनिकों ने उनसे कहा कि यह एकतरफा कदम 1988 और 1998 की संधि का उल्लंघन है। चीन के सैनिकों के न मानने पर भूटान के साथ तालमेल से भारतीय सैनिकों ने दखल दिया, क्योंकि डोकलाम में सड़क से भारत की सुरक्षा को भी खतरा था। नॉर्थ ईस्ट को शेष भारत से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर खतरे में था। भारत के सैनिकों ने सड़क निर्माण रुकवा दिया।
भारत के बीच में आने से चीन भड़क गया और उसने कहा कि भारतीय सेना चीन की सीमा में घुस आई है। दोनों ओर से 300-300 सैनिक 120 मीटर की दूरी पर टेंट लगाकर जम गए। सैनिकों की तैनाती बढ़ने पर भी अटकलें लगी थीं। चीन की ओर से युद्ध की धमकियां दी जाने लगीं। करीब 40 साल बाद सीमा पर फिर से गोली चलने की शंका जताई जाने लगी, लेकिन यहां एक्सपर्ट इस बात पर एकमत थे कि व्यापारिक समीकरणों को देखते हुए चीन युद्ध नहीं करेगा

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
9414441218

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