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भारत छोडो आंदोलन और आज का भारत

भारत, संस्कृति और सभ्यता का धनी देश । प्राचीन काल में सोने की चिड़िया की उपमा से सुषोभित देश। फिर आखिर देश को कौन सी जड़ता ने अगोश में समाहित किया, कि जिस गंदगी, गरीबी, जातिवाद को देश निकाला आजादी के पूर्व दे देना चाहिए था। उसकी अपील लोकतांत्रिक परिवेश में आजादी के लगभग 70 वर्ष के बाद देश का प्रधानमंत्री मन की बात में कर रहा है। ऐसे में इसका उत्तर ढ़ूढे  तो पता चलता है, कि कालांतर में राजनीति  और सामाजिक व्यवस्था ने ऐसी करवट ली, कि देश का बंटाधार हो गया। हमारे देश का यह दुर्भाग्य ही है, कि जिस जातिवाद और सांप्रदायिकता को पीछे छोड़ने की बात भारत छोड़ों आंदोलन की 75 वीं वर्षगांठ पर याद आ रही है, उसके सबसे बड़े पोषक हमारी राजनीतिक परिपाटी ही रही हैं लोगों को धर्म-सम्प्रदाय के बंधन में बांधकर सियासी हितपूर्ति और छलावा आजादी के बाद से हमारी राजनीति का एक अहम पहलू बनकर रह गया। जिसका ही कारण है, कि आज देश में गरीबी-अमीरियत की खाई दिन-ब-दिन  ओर गहरी होती जा रही है। सत्ता पिपासा की चाहत ने लोकतंत्र में जो परिवारवाद और जातिवाद की धुरी विकसित की। वह भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर में पर्याय बन गई। 

राजनीतिक  दलों में खासकर क्षेत्रीय दलों का साम, दाम, दंड और भेद चारों ने जातिवाद और क्षेत्रीयता पर आकर टिक गया, और अभी भी निरंतर प्रगतिशील है। उत्तर-प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में तो क्षेत्रीय दलो ने अपनी जातिवादी व्यवस्था को राजनीति में उपहार स्वरूप मिली पैतृक संपत्ति समझ ली। भले ही जिसकी जड़े बीते उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के जीतने के पश्चात टूटने लगी है। भारतीय राजनीति की क्षेत्रीय राजनीतिक व्यवस्था में स्थिति इतनी जटिल हो गई, कि जाति-विशेष  के मसीहा जन्म लेने लगे। उत्तरप्रदेश जैसे सूबों में तो दलित की जनसंख्या तो राजनीतिकारों का दलित प्रेमी बनने का ढोंग रचने में तनिक परहेज नही। क्या भारतीय संविधान में इसी भारत की कल्पना थी? समता, स्वतंत्रता और अवसर की समता कहां विलुप्त हो गए? 

              जब  देश की कुल पूंजी का 58 फीसद मात्र दस लोगों के हाथों में सिमट गया। किसान की फसल का उचित मूल्य नहीं, और उसी किसान की फसल बिसात टमाटर के रूप में बाजार में 100 रूपये किलो बिक रहा है। फिर कहां कि समता? जिस देश में गंगा-जमुनी तहजीब रही है, अगर उस देश में राम, रहीम में फर्क देखा जा रहा है। फिर कहां गई मानवता और  सामाजिकता? अगर बीते आजादी के सत्तर वर्ष बाद भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने यह बात रखने का सबल जुटाया है, कि देश सामाजिक बुराईयों से दूर हो, तो इसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति और सामाजिक सरोकार की आवश्यकता  है, जिसका प्रयास राजनीतिक  और सामाजिक दोनों स्तर पर होना चाहिए। अगर राजनीति ने जातिवाद, सम्प्रदायिक और क्षेत्रवाद की आग में घी डालने का काम किया है। तो हमारे सामाजिक ताने-बाने ने भी अपनी बीती स्थिति से सबक न लेकर घोर अनर्थ किया। देश में साम्प्रदायिकता जातिवाद और क्षेत्रीयता की जड़े पराधीनता के वक्त भी थी, जिसके कारण देश गुलाम हुआ, लेकिन देश की बदकिस्मती की आजादी के बाद भी देश की आवाम इससे कोई सीख न ले सकी, और शहीद महापुरूषों के बलिदान और त्याग पर पानी फेरने का कार्य किया। 

    आज के दौर में क्या यह सोचनीय विषय नही, कि अगर गांधी के विचारों और दिनचर्या को देश के सामाजिक परिवेश में निवर्हन किया जाता, तो देश के प्रधानमंत्री को लाल किले की प्राचीर से स्वच्छता का पाठ नहीं पढ़ाना पड़ता। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की राजनीतिक भूल कि गांधी के विचारों को देश की आजादी के बाद से ही भूलाने का ढोंग रचा गया। और याद भी किया गया , तो मात्र सत्ता और कुर्सी की खातिर। 

 ऐसे में अब देश का अगर प्रधानसेवक ने मन की बात में अगले पांच वर्ष का एजेंड़ा इन कुरीतियों से भारत मुक्त बनाने की बात की है। तो यह स्वच्छ समाज और वातावरण के निर्माण की दिशा  में सार्थक पहल हो सकती है। जिसके लिए सभी राजनीतिक दलों और समाज को एक साथ खड़े होना चाहिए। वह भी निस्वार्थ भाव से। मोदी ने देशवासियों से जातिवाद, गंदगी, गरीबी और सांप्रदायिकता से मुक्ति दिलाने का नारा तो बुलंद किया, लेकिन यह भी दुर्भाग्य है, कि जब तक भारतीय राजनीति स्वच्छ नहीं होगी। संसद के सदस्य स्वच्छ छवि के नहीं होगे। वे स्वच्छ विचार देश को कैसे दे पायेंगें? इसलिए मोदी को पहले स्वच्छ संसद बनाने के अपने चुनावी वायदे पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। 

 जब देश को नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने अंग्रेज भारत छोड़ने आंदोलन की शुरूआत की थी। तो उसके 75 वर्ष बाद मोदी के मन की बात के तार आपस में जुड़ते है। उस वक्त भी देश इन समस्याओं से दो चार हो रहा था। जो अभी भी व्याप्त है। इसके इतर हमारे संविधान की अंदुरूनी विचारधारा भी स्वतंत्रता आंदोलन की मूल भावना है।  इसके साथ संविधान ने समता, स्वतंत्रता और सबको न्याय का संकल्प दिया। मोदी ने जयप्रकाश  और लोहिया को मन की बात में याद किया। जो गांधी के विचारों से प्रेरित थे। ऐसे में अब देश में इन महापुरूषों के राजनीतिक फायदे हेतु इस्तेमाल न होकर इन बुराईयों के समूल खत्मे  के साथ एक नए बेहतर भारत की तस्वीर साकार होनी चाहिए, जिसमें गरीब को मकान, भूखे को खाने और सभी का समुचित विकास हो। ऐसी नीति का निर्माण हो। लेकिन ऐसा संभव है, यह तो भविष्य ही तय करेगा। 

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