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भारत में बढ़ती सुंदरता की चाहत और कॉस्मेटिक बाज़ार

मानुषी छिल्लर ने प्रियंका चोपड़ा सुष्मिता सेन और रीता रीता फारिया जैसी गिनी-चुनी महिलाओं के बाद एक बार पुनः मिस वर्ल्ड का खिताब देश को दिलवाया है । मिस वर्ल्ड में अपना परचम लहराने के बाद एक बार फिर मानसी छिल्लर जैसी महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय माटी में कितनी ताकत और मेहनती महिलाएं है, जो आसमाँ से लेकर खेल के मैदान कहीं पर पुरुषों से पीछे नहीं हैं, लेकिन क्या आज के दौर में ऐसा नहीं कहा जा सकता, कि सौंदर्य बाजार और मानुषी छिल्लर एक- दूसरे क पर्याय बन सकते हैं। पिछले 17 वर्षों से देश की कोई महिला विश्व सुंदरी बनी नहीं, तो ब्यूटी प्रोडक्ट्स बेचने के लिए नया चेहरा विदेशी कम्पनियों को मिला नहीं। यह इसलिए क्योंकि बाज़ार में नित्य नए की मांग होती है। तो क्या अब ब्यूटी प्रोडक्ट्स की कम्पनियां मध्यमवर्गीय घर मे मानुषी के जरिए अपने उत्पाद पहुचाने की कोशिश करेंगी, तो इसमें संदेह की कोई गुंजाइश बनती नहीं। बीते कुछ महीनों से देश की अर्थव्यवस्था जहां तिनके के सहारे चल रही थी, वही वर्तमान दौर में कॉस्मेटिक बाज़ार भी अब सुधरते अर्थव्यवस्था में नई सम्भावना को तलाशते हुए नज़र आ सकता है।

इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि जब नब्बे के दौर में भारतीय महिलाएं विश्व सुंदरियां बनी थी, तब कॉस्मेटिक बाज़ार में बड़ा बदलाव देखने को मिला था। उस दरमियान इन विश्वसुंदरियों के बल पर ही ब्यूटी प्रोडक्ट घर घर का हिस्सा बन गए थे। हमाम, लाइफ बॉय ,बोरोलीन और हिमानी जैसे उत्पाद की जगह रेवलॉन, ओले, गार्नियर जैसे विदेशी उत्पाद देश की मंडी में अपनी धाक जमा लिए थे। तो क्या मानुषी के मिस वर्ल्ड बनने के बाद वही स्थिति पुनः दोहराई जा सकती है। 1996 की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रति व्यक्ति का ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर खर्चा मात्र 24 रुपए था। 1995 तक हेयर जेल का कारोबार 40 करोड़ और मेकअप का कुल कारोबार 100 करोड़ था। और जैसे ही देश में ब्यूटी पेजेंट का खिताब आता है, 1996 में पोंड्स जैसे अकेले उत्पाद का कारोबार 317 करोड़ के करीब पहुँच जाता है। वर्तमान में भारतीय कॉस्मेटिक इंडस्ट्री 422 अरब की है। एसी नील्सन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में गोरेपन की क्रीम का बाजार 2010 में 2,600 करोड़ रुपये था, और 2025 तक एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक यह कारोबार 13 खरब होने की सम्भावना है। इस समय जब मानुषी को विश्व सुंदरी का खिताब दिया गया है, उस दरमियान यह सहज कहा जा सकता है, कि सभी बड़े ब्रांड भारत के हर घर तक अपनी तस्दीक़ देना चाहते हैं, जिसमें मानुषी का विजेता बनकर उभरना उन कंपनियों के लिए लाभ का सौदा हो सकता है, जो भारत को अपना कारोबारी अड्डा बनाना चाहती हैं। भारत में सुंदर और छरछरी काया का क्रेज़ काफ़ी तेजी से बढ़ रही है। सांवले रंग का मजाक उड़ाया जाता है। उसी की आड़ में बड़े पैमाने पर गोरेपन की क्रीम या उत्पादों की बिक्री होती है। यह उस देश की घोर विडम्बना ही कही जाएगी, जहां स्त्री को पूजनीय दृष्टि से देखा जाता है, उसी देश में वैवाहिक विज्ञापनों व साइटों पर भी गोरी व सुंदर लड़की की मांग की जाती है। उसी का फ़ायदा उठाकर विदेशी ब्यूटी प्रोडक्ट्स का बाजार काफ़ी फल- फूल रहा है।

ऐसे में कुछ चुनिन्दा सवाल यही, क्या हरियाणा की माटी, अपने इस छोरी की सुंदरता पर नाज़ करते हुए लिंगानुपात के 867 के आंकड़े को पीछे छोड़कर बच्चियों के जन्म को प्रोत्साहित करेगी, या होगा ढाक के तीन पात। आज के दौर में जिस हिसाब से महिलाएं समाज मे अपनी पहचान बना रहीं हैं, वह पुरूषवादी मानसिकता को तोड़ने के लिए काफ़ी है, लेकिन समाज की पुरातन जड़ता के बादल न छटना चिंता का विषय है, और ये बातें ज़्यादा कष्टकारी जब हो जाती हैं, जब अख़बारी पन्नों की खबरें बनती हैं, कि पुरूष तो पुरूष महिलाएं भी कुलदीपक की चाहत में बच्चियों को मार देती हैं। मानते हैं, कि घर-परिवार का दबाव रहता है, लेकिन अपने सम्मान और वजूद के लिए महिलाओं को मोर्चा खोलना होगा, नहीं तो मिस वर्ल्ड आदि का पुरुस्कार मात्र सौंदर्य-प्रसाधनों के विज्ञापन करने से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा। इसके साथ समाज में सुन्दर दिखने की जो गला काट प्रतियोगिता चल रही है, वह भी स्वस्थ समाज और जीवन की दृष्टि को हेय बनाती है। इस प्रथा को तिलांजलि देना होगा, क्योंकि सुंदरता की चाहत कभी कभी जान पर भारी भी पड़ जाती है। आज समाज इकीसवीं सदी में जी रहा है, जहां पर प्रतिभा और हुनरमंद होना ज़्यादा मायने रखता है। उस दौर में इस रवायत को बंद करने के लिए अभिवावकों को अपने बच्चों और बच्चियों को बचपन से ही रंग, जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करने की शिक्षा देनी चाहिए। लेकिन पहली बात यहीं बड़े-बुजुर्गों की सोच तो बदलें।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लेखन
9457560896

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