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भारत मेरे सपनों का

मैंने जन्म तो कहते हैं, आज़ादी की खुली हवाओं में लिया। जब देश में महापुरुषों की बजाय ठग पुरुषों का जमावड़ा उत्पन्न हो गया था, और धीरे-धीरे इसका दायरा असीमित होता जा रहा हैं। हाँ हम आज़ादी का 71वाँ जन्मदिन मना रहें हैं, तो बात कर रहें हैं, मेरे सपनों का आज़ाद भारत। मेरे सपनों के आज़ाद भारत में युवाओं की फ़ौज ड्रग्स की लत में अंधी हो। समाज पर असामाजिकता की चादर चढ़ी हो। प्रकाश और ज्ञान की ज्वाला की जगह अज्ञान और बदसलूकी का अंधेरा छा जाए। सामाजिकता अपने आपे को तोड़कर हैवानियत पर उतारू हो जाए। बेटे को पैसे और अपने ऐशोआराम की फितरत में अपने उसी मां-बाप के बुढ़ापे का खेवनहार न बनकर उनके मौत में भागीदार बने। जिन्होंने उनको जब वो जमीं पर पैर ऱखने के क़ाबिल नही थे, फ़िर भी चलना सिखाया। राजनीति अर्थनीति और भ्रष्टनीति में तब्दील हो जाए। मां गंगा के जल को पवित्र करने के नाम पर अपवित्रता का खजाना भी लूट लिया जाए। लुटियंस की दिल्ली में दिलवाले और जनतंत्र के हितों को देखकर मुँह चुराने वालों की और गिरगिट जैसे रंग बदलने वालों की महफ़िल जम जाए। बुद्ध की बारात  में सब अपनी नगीयत पर उतारू हो जाए। आवाम के प्राण पखेरू उड़ जाने पर सियासत चमकाने वालों की कोई कमी न हो। आज़ादी और महापुरुषों के नामों का प्रयोग जब तक सियासी रोटी सेंकने में न हो, तब तक राजनीति का असली आलिंगन महापुरुषों के साथ कहाँ सम्पन्न हुआ दिखता हैं। देश की आज़ादी के साथ अगर नेताओं ने अपनी प्रतिभा का परिचय जनता को गुमराह करने, ठगी करने भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने, अपने विकास रूपी तने को बचाने की कोशिश में न की, फ़िर राजनीति में रहने का क्या अर्थ। भले ही नेताओं का विकास रूपी तना हमेशा नाम औऱ पहचान बदलकर आता हैं, लेक़िन आना भी चाहिए। तभी तो ये नेताओं की मंडली आज़ादी के असली अर्थ को चरितार्थ कर सकते हैं। 
    देश में विकास के चर्चा होगी, लेक़िन उसमें विकास का स्वरूप काल्पनिक नहीं दैहिक और वास्तविक होगा। जो रूप बदलकर सत्ता की छत्रछाया में समाज को नित्य नए करतूतों से रास रचाते रहेंगे। देश गुलामी की चादर को तो त्याग देगा, लेक़िन अंधविश्वास रूपी चोटी हमेशा समाज में कटती रहेगी। समाज की चोटी कटेगी, राजनीति अपना मसाला तैयार कर राजनीतिक हवनकुण्ड में आहुति देती रहेगी। समाज में विचारों के नाम पर स्वार्थ की साधना हो। जोड़-तोड़ की राजनीति में सब एक ही रंग में रंगीत हो। लोकतंत्र में रक्तरंजित सत्ता साधना की पिपासा हो। आदमी चांद पर हो, वास्तविकता का आंगन शून्य हो। संस्कृति की आड़ में राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह की राजनीति प्रबल हो। भले ही उससे जनता का हित हो । या अनर्थ हो। ग़रीब दूर करने , शिक्षा को सभी को मुक्कमल बनाने का दावा कागजों पर हो। नेता आसमान को छुए, जनतांत्रिक व्यवस्था के रखवाले लोग टूटी सड़कों पर कीचड़ों में सने रहें। कमल कीचड़ में खिले, लेक़िन आज़ादी के वक्त से कीचड़ में रहने वाला कीचड़ में ही निपटकर राम नाम को प्यारा हो जाए, क्योंकि आज़ादी के पहले भी राम नाम ही सत्य था, और रहेगा। बाकी सब गत्य ही रहेगा। अगर यहीं हमारे महापुरुषों गांधी, नेहरू, बालगंगाधर तिलक, विवेकानन्द का आज़ाद स्वरूप भारत हैं। तो नहीं चाहिए ऐसा भारत । जिसमें स्वछंदता पर राजनीति हावी हो। विकास के नाम पर विकास रूपी जिन्न हावी हो। राजनीति की बारात में सभी अपना घर भर रहें हो। ऐसा आज़ाद भारत नहीं चाहिए, हमें और हमारे परिवेश को। जिसमें गरीबीयत की बात न हो, बुराइयों को दूर करने की बात न हो। महापुरुषों को भुलाने की बात हो।
 
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