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भारी विरोध के बाद ​बैकफुट पर राजे सरकार, सेलेक्ट कमेटी को सौंपा विवादित बिल

जयपुर। राजस्थान में विवादित विधेयक पर भारी विरोध के बाद वसुंधरा सरकार बैकफुट पर आ गई है। इसके बाद राज्य सरकार ने यह विधेयक सिलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया है। सिलेक्ट समिति को विधेयक सौंपे जाने का अर्थ है कि यह विवादित बिल अब ठंडे बस्ते में चला गया है। लोकसेवकों और जजों के खिलाफ परिवाद (शिकायत) पर जांच से पहले सरकारी अनुमति की अनिवार्यता वाले इस बिल को लेकर कांग्रेस लगातार विरोध कर रही है। इससे पहले सोमवार को विधानसभा में पेश कर दिया गया। लेकिन चौतरफा विरोध के चलते राज्य सरकार को कदम पीछे हटाने पड़े हैं। मंगलवार को विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही प्रतिपक्ष कांग्रेस ने जमक र हंगामा किया और यह बिल वापस लेने की मांग की। सरकार इस मामले में पहले ही अपनी मंशा बना चुकी थी। हंगामे के बीच ही बिल को प्रवर समिति को सौंपे जाने का प्रस्ताव लाया गया और इसे पारित कर दिया गया। हालांकि इस बिल से पहले इस बारे में जारी किया गया अध्यादेश अभी भी बना हुआ है और इसकी वैधता 42 दिन तक बनी रहेगी। ऐेसे में जब तक सरकार अध्यादेश वापस नहीं लेती तब तक इसके प्रावधान लागू रहेंगे। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने देर रात अपने निजी अधिकारियों व मंत्रियों की बैठक बुलाई और विधेयक पर पुनर्विचार किया। इस विधेयक पर बुधवार को चर्चा होनी है। उसी समय सत्ता पक्ष यह प्रस्ताव ला सकता है कि इस विधेयक को प्रवर समिति को भेज दिया जाए। यह समिति विधेयक के प्रस्तावों पर विचार करेगी।

कांग्रेसी विधायक हिरासत के बाद छोड़े गए
इससे पहले कांग्रेसी विधायक विधेयक के विरोध में पैदल मार्च करते हुए विधानसभा पहुंचे। सभी ने मुंह पर काली पट्टी बांध रखी थी। विस की कार्यवाही से वाकआउट कर कांग्रेसी विधायक बाहर आ गए और प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृृत्व में प्रदर्शन में शामिल हुए।
सभी विधेयक के विरोध में राज्यपाल कल्याण सिंह को ज्ञापन देने जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने इन्हें रास्ते में ही रोक लिया। सचिन पायलट समेत सभी को धारा 129 के तहत हिरासत में ले लिया गया लेकिन बाद में छोड़ दिया गया। खास बात यह रही कि कांग्रेसी विधायकों का साथ कुछ असंतुष्ट भाजपा विधायकों ने भी दिया।

हाई कोर्ट में सुनवाई 27 को
इस बीच विवादित विधेयक को हाई कोर्ट में भी चुनौती मिल गई है। एक जनहित याचिका और दो अन्य याचिकाएं दायर की गई हैं। सभी में अध्यादेश को असवैंधानिक बताते हुए इसे चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एके जैन का कहना है कि सीआरपीसी में संशोधन करने से लेकर पूरे अध्यादेश में संविधान का उल्लंघन किया गया है। याचिका पर 27 अक्टूबर को सुनवाई होगी।

एडिटर्स गिल्ड ने किया विरोध
द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने राजस्थान सरकार से इस विधेयक को वापस लेने की मांग की है। गिल्ड ने एक बयान में कहा है कि यह मीडिया को परेशान करने वाला खतरनाक विधेयक है। यह मीडिया को परेशान करने का घातक साधन है, जो सरकारी कर्मियों के गलत कृृत्यों को छुपाता है और देश के संविधान द्वारा प्रदत्त प्रेस की स्वतंत्रता पर नाटकीय ढंग से रोक लगाता है। इसे वापस लिया जाना चाहिए।

ये प्रावधान बने विवाद के कारण

  • वसुंधरा सरकार ने हाल में एक अध्यादेश जारी किया है। इसमें भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन किया गया है, जो राजस्थान में ही लागू होगा।
  • यदि कोई व्यक्ति वर्तमान या पूर्व लोकसेवक, जज या मजिस्ट्रेट के खिलाफ कोर्ट में परिवाद दायर करता है तो कोर्ट तब तक जांच के आदेश नहीं दे सकता, जब तक कि सरकार की स्वीकृृति न मिल जाए।
  • परिवाद पर जांच की स्वीकृृति के लिए 180 दिन की मियाद तय की गई है। इस अवधि में स्वीकृति प्राप्त नहीं होती है तो यह माना जाएगा कि सरकार ने स्वीकृृति दे दी है।
  • जब तक सरकार की स्वीकृृति नहीं मिल जाती, लोकसेवक का नाम, पता, पहचान उजागर नहीं किया जा सकेगा।
  • ऐसा करने पर दो साल तक कैद की सजा का प्रावधान है।
  • इसी तरह का अध्यादेश महाराष्ट्र सरकार भी पारित कर चुकी है, लेकिन उसमें समय सीमा सिर्फ 90 दिन है और प्रकाशित करने पर रोक या सजा का प्रावधान नहीं है।
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