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भुखमरी से संघर्ष करता भारत

भारत जैसे देश में जहां अन्न को भगवान माना जाता है। अन्न को बर्बाद करना या खाना खाते वक्त भोजन को जूठा छोडऩा गलत माना जाता है। उस देश को भुखमरी के मामले में पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़े यह बड़े दुख की बात है। 21 सदी में भी आज वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी का शिकार है। अगर भुखमरी की इस समस्या को भारत के संदर्भ में देखे तो भुखमरी पर जारी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक भुखमरी से पीडि़त देशों में भारत का नाम प्रमुखता से है। खाद्यान्न वितरण प्रणाली में सुधार तथा अधिक पैदावार के लिए कृषि क्षेत्र में निरन्तर नये अनुसंधान के बावजूद भारत में भुखमरी के हालात बदतर होते जा रहे हैं।

भुखमरी और कुपोषण के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2019 में भारत 117 देशों में से 102वें स्थान पर है। बेलारूस, यूक्रेन, तुर्की, क्यूबा और कुवैत सहित 17 देशों देशों ने पांच से कम जीएचआइ स्कोर के साथ शीर्ष रैंक हासिल की हैं। आयरिश एजेंसी कंसर्न वल्र्डवाइड और जर्मन संगठन वेल्ट हंगर हिलफे द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई रिपोर्ट ने भारत में भुखमरी के स्तर को गंभीर करार दिया गया है। 2018 में भारत 119 देशों में से 103 वें स्थान पर था। वहीं साल 2000 में वह 113 देशों में से 83वें स्थान पर था। इसका जीएचआइ स्कोर भी कम हो गया है। जहां 2005 और 2010 में जीएचआइ स्कोर क्रमश 38.9 और 32 था। वहीं 2010 से 2019 के बीच जीएचआइ स्कोर 30.3 रहा।

हंगर इंडेक्स में किसी भी देश में भुखमरी के हालात का आकलन वहां के बच्चों में कुपोषण की स्थिति, शारीरिक अवरुद्धता और बाल मृत्यु दर के आधार पर किया जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में बच्चों में कुपोषण की स्थिति भयावह है। देश में 21 फीसदी बच्चों का पूर्ण शारीरिक विकास नहीं हो पाता इसकी बड़ी वजह कुपोषण है। रिपोर्ट के अनुसार सरकार द्वारा पोषण युक्त आहार के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चलाए जा रहे अभियान के बावजूद सूखे और मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण देश में गरीब तबके का एक बड़ा हिस्सा कुपोषण के खतरे का सामना कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार भुखमरी के लिहाज से एशिया में भारत की स्थिति अपने कई पड़ोसी देशों से खराब है।

भारत में गरीबी और भुखमरी जैसी बुनियादी समस्याएं देश के विकास में बाधक साबित हुई हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि आजादी के सात दशक बाद भी देश में करोड़ों लोगों को सही से दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती। ये हमारे समाज के वे अंतिम लोग हैं जिन्हें मुख्यधारा में लाए बिना समावेशी विकास के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता। चूंकि देश में नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है। इसलिए भुखमरी से होने वाली मौतों को रोकना तथा प्रभावित जनसंख्या को विकास की मुख्यधारा में शामिल करना सरकार व समाज की एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।

नेपाल और श्रीलंका जैसे देश भारत से सहायता प्राप्त करने वालों की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में ये सवाल गंभीर हो उठता है कि जो श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार हमसे आर्थिक से लेकर तमाम तरह की मोटी मदद पाते हैं मगर भुखमरी की रोकथाम के मामले में हमारी हालत उनसे भी बदतर क्यों हो रही है? इस सवाल पर ये तर्क दिया जा सकता है कि श्रीलंका व नेपाल जैसे कम आबादी वाले देशों से भारत की तुलना नहीं की जा सकती। यह बात सही है लेकिन साथ ही इस पहलू पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि भारत की आबादी श्रीलंका और नेपाल से जितनी अधिक है। भारत के पास क्षमता व संसाधन भी उतने ही अधिक हैं।

दुनिया के देशों के बीच भारत की छवि एक ऐसे मुल्क की है जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लेकिन तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले इस देश की एक सच्चाई यह भी है कि यहां के बच्चे भुखमरी के शिकार हो रहें हैं। एक ऐसा देश जो अगले एक दशक में दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली देशो की सूची में शामिल हो सकता है। वहां से ऐसे आंकड़े सामने आना बेहद चिंतनीय माना जा रहा है।

महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि हर वर्ष हमारे देश में खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद क्यों देश की लगभग एक चौथाई आबादी को भुखमरी से गुजरना पड़ता है? हमारे यहां हर वर्ष अनाज का रिकार्ड उत्पादन तो होता है पर उस अनाज का एक बड़ा हिस्सा लोगों तक पहुंचने की बजाय कुछ सरकारी गोदामों में तो कुछ इधर-उधर अव्यवस्थित ढंग से रखे-रखे सड़ जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक देश का लगभग 20 फीसद अनाज भण्डारण क्षमता के अभाव में बेकार हो जाता है। इसके अतिरिक्त जो अनाज गोदामों में सुरक्षित रखा जाता है, उसका भी एक बड़ा हिस्सा समुचित वितरण प्रणाली के अभाव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने की बजाय बेकार पड़ा रह जाता है। खाद्य की बर्बादी की ये समस्या सिर्फ भारत में नही बल्कि पूरी दुनिया में है। पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष 1.3 अरब टन खाद्यान्न खराब होने के कारण फेंक दिया जाता है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ दुनिया में इतना खाद्यान्न बर्बाद होता है और दूसरी तरफ दुनिया के लगभग 85 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं। क्या यह अनाज इन लोगों की भूख मिटाने के काम नहीं आ सकता? पर व्यवस्था के अभाव में ये नहीं हो रहा।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भूख का संकट चुनौतीपूर्ण स्तर पर पहुंच गया और इससे दुनिया में लोगों के लिए भोजन की उपलब्धता और कठिन हो गई। इतना ही नहीं जलवायु परिवर्तन से भोजन की गुणवत्ता और साफसफाई भी प्रभावित हो रही है। साथ ही फसलों से मिलने वाले भोजन की पोषण क्षमता भी घट रही है। रिपोर्ट कहती है कि दुनिया ने वर्ष 2000 के बाद भूख के संकट को कम तो किया है, लेकिन इस समस्या से पूरी तरह निजात पाने की दिशा में अब भी लंबी दूरी तय करनी होगी।

इस देश की बदकिस्मती है कि यहां भुखमरी और गरीबी किसी को नजर नहीं आती है। भारत में योजनाएं तो बड़ी-बड़ी बनती हैं लेकिन आम आदमी तक आते-आते या तो यह योजनाएं दम तोड़ चुकी होती हैं या अधिकारियों की फाईलों में ही गुम हो जाती है। योजना आयोग के द्वारा संतुलित विकास के लिए राज्यों को अनुकूल योजनाएं बनाने की नसीहत दी जाती है। लेकिन इन योजनाओं के बनने के बाद इनको क्रियान्वित करने की प्रक्रिया इतनी लचर और भ्रष्ट है कि भूख से पीडि़त व्यक्ति तक इनका लाभ नहीं पहुंचता है।

यह कड़वा सच है कि बढ़ती आबादी घटते क्षेत्रफल और इन सब से ऊपर दिन प्रति दिन सीमित होते कृषि क्षेत्र की चिन्ता किसी को दिखाई नहीं देती। धीरे-धीरे भारत सहित पूरी दुनिया में कृषि योग्य भूमि समाप्त होती जा रही है। सच तो यह है कि दुनिया भर के देशों में निजी और सामूहिक तौर पर इतनी राजनैतिक इच्छाशक्ति नहीं है कि भुखमरी से ग्रस्त गरीब आदमी को उसकी मुश्किलों से बाहर निकाल सके।

भारत में भुखमरी से निपटने के लिए अनेको योजनाएं बनी हैं लेकिन उनकी सही तरीके से पालना नहीं होती है। महंगाई और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल ने गरीबों और निम्न आय के लोगों को असहाय बना दिया है। हमारे देश में सरकारों द्वारा भुखमरी को लेकर कभी उतनी गंभीरता दिखाई ही नहीं गई जितनी कि होनी चाहिए। यहां सरकारों द्वारा हमेशा भुखमरी से निपटने के लिए सस्ता अनाज देने सम्बन्धी योजनाओं पर ही विशेष बल दिया गया। कभी भी उस सस्ते अनाज की वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने को लेकर कुछ ठोस नहीं किया गया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली हांफ रही है और मिड-डे मील जैसी आकर्षक परियोजनाएं भ्रष्टाचार और प्रक्रियात्मक विसंगतियों में डूबी हैं।

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

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