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मरीजों के जीवन से खिलवाड़ करते,’झोलाछाप डाॅक्टर’

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अंतर्गत आने वाले बांगरमऊ तहसील के दो-तीन गांवों के चालीस लोगों की जिंदगी सांसत में चली गई हैं।उनकी सिर्फ एक ही गलती थी कि उन्होंने बीमार होने पर झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करवाया था।उम्मीद तो यही थी कि समस्या का समाधान हो जाए,किन्तु डाॅक्टरों द्वारा की गई लापरवाही की वजह से एड्स जैसी भयानक बीमारी उपहार में मिल गई।बताया जाता है कि इलाज के क्रम में झोलाछाप डॉक्टरों ने एक ही सीरिंज से कई लोगों को इंजेक्शन लगाया था।गांव के ही किसी एक आदमी को पहले से एड्स था,लेकिन संक्रमित इंजेक्शन ने चालीस लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लिया।अगर स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्वास्थ्य शिविर नहीं लगाया जाता तो,इस बीमारी का सही समय पर जाहिर भी नहीं हो पाता।ग्रामीणों का कहना है कि कायदे से जांच कराई जाए,तो गाँव में कम से कम पांच सौ लोगों के एचआईवी संक्रमित होने का खुलासा हो सकता है।उन्नाव जिले की यह घटना बताती है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का अभाव और झोलाछाप डाॅक्टरों पर संपूर्ण निर्भरता की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती हैं!

लापरवाही का पर्याय बने झोलाछाप डाॅक्टर
हालांकि,झोलाछाप डाॅक्टरों की लापरवाही का यह पहला मामला नहीं है।आए दिन,ऐसे कई तरह मामले सामने आते रहते हैं।कुछ मामलों को दबा भी दिया जाता है,तो कुछ मामलों में ऐसे गैर-जिम्मेदार डाॅक्टरों पर कार्रवाई भी की गई हैं।अधिकतर मामलों में,झोलाछाप डाॅक्टरों ने पुरानी सीरिंज का इस्तेमाल किया,मरीज को गलत या एक्सपायरी दवा दी या समय पर मरीज को रेफर करने का सुझाव न देकर,कई की जिंदगी खराब की हैं।दरअसल,स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भारतीय गांव आज भी बदहाल हैं।यही वजह है कि उपचार के लिए स्थानीय झोलाछाप डाॅक्टरों पर एक बड़ी ग्रामीण आबादी की निर्भरता तेजी से बढ़ी है।निजी अस्पतालों में डाॅक्टरों की मोटी फीस और सरकारी अस्पतालों में इलाज से पूर्व होने वाली फजीहत की वजह से ग्रामीण स्थानीय झोलाछाप डाॅक्टर से इलाज कराना ही उचित समझते हैं।देश के लगभग हर गांव में दो-तीन झोलाछाप डाॅक्टर देखे जा सकते हैं।ग्रामीणों की सामान्य बीमारियों का इलाज कर ऐसे लाखों झोलाछाप डाॅक्टर अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं।झोलाछाप डाॅक्टरों की एक विशेषता,जो शहरी डाॅक्टरों में नहीं है,वह-मरीजों के घर-घर तक सेवाएं देने से संबंधित है।मान्यता प्राप्त डाॅक्टरों की कमी की वजह से झोलाछाप डाॅक्टरों का कारोबार खूब फल-फूल रहा है।हालांकि,कई मोर्चों पर ऐसे डाॅक्टर हमारी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते!

ग्रामीणों की सेहत से खिलवाड़
देश के ग्रामीण अंचलों में झोलाछाप डाॅक्टरों की भरमार है।उनके पास न तो डिग्री है,पंजीयन है और न ही लाइसेंस।महज सीमित जानकारी के साथ,वे कई गांवों के ‘डाॅक्टर साहब’ बन बैठे हैं।हालात ये हैं कि दवा दुकान चलाने वाले केमिस्ट भी मरीजों का इलाज कर रहे हैं।दरअसल,अप्रशिक्षित डाॅक्टरों का यह वर्ग आधी-अधूरी जानकारी के सहारे ग्रामीणों की सेहत और जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहा है।अस्पष्ट जांच कर,तरह-तरह की दवाईयां देना,आवश्यकता से अधिक दिनों तक ईलाज करना और गरीबों की मजबूरी का नजायज फायदा उठाकर पैसे ऐंठतें रहना इनकी पारंपरिक कला है।विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक,गांवों में इलाज कर रहे हर,पांच में से सिर्फ एक डाॅक्टर के पास प्रैक्टिस के लिए जरुरी योग्यता होती है।जबकि ऐसे 57 फीसदी डाॅक्टरों के पास कोई मेडिकल योग्यता ही नहीं है।इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मानें,तो भारत में मान्यता प्राप्त डॉक्टर से ज्यादा झोलाछाप डॉक्टर हैं।लेकिन,सरकार की कमजोर नीति की वजह से इन पर रोक नहीं लग पा रही है।दो दशक पहले से इन्हें हटाने की मुहिम चल रही है,लेकिन अब तक उसमें कामयाबी नहीं मिली हैं।डाॅक्टरों की कमी को देखते हुए 2014 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅ हर्षवर्धन ने झोलाछाप डाॅक्टरों को मान्यता देने की वकालत की थी,जिसका विरोध डिग्रीधारी डाॅक्टरों ने पुरजोर तरीके से किया था।झोलाछाप डाॅक्टरों पर अत्यधिक निर्भरता और अनियंत्रित छूट देना उचित नहीं है।ऐसे डाॅक्टरों द्वारा इलाज के दौरान की गई लापरवाही के कई मामले सामने आ चुके हैं।

प्रशिक्षित डाॅक्टरों की कमी है प्रमुख वजह
सवाल यह है कि आजादी के सात दशक बाद भी ग्रामीण आबादी की निर्भरता झोलाछाप डाॅक्टरों पर क्यों हैं?इसकी साफ वजह यह है कि देश में बहुतेरे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों,रेफरल और सदर अस्पताल बेहद दयनीय और चिंताजनक स्थिति में हैं।यहां,एक ओर आवश्यक दवाओं और जांच-यंत्रों की घोर कमी है,तो वहीं समय पर चिकित्सक के उपलब्ध ना हो पाने से ग्रामीण मरीज झोला-छाप डॉक्टरों की शरण में चले जाते हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के ‘द हेल्थ वर्कफोर्स इन इंडिया’ रिपोर्ट के मुताबिक,देश में प्रति एक लाख की जनसंख्या पर केवल 80 चिकित्सक नियुक्त हैं।अगर इनमें से झोलाछाप डाॅक्टरों को हटा दिया जाए,तो यह 36 डाॅक्टर के आसपास बैठता है।विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के अनुसार,प्रति एक हजार की आबादी पर एक चिकित्सक होना चाहिए,लेकिन इस मामले में भारत की स्थिति बहुत खराब है।देश में आबादी के हिसाब से डाॅक्टरों की संख्या में भारी कमी है।अमेरिका में प्रति एक हजार आबादी पर डाॅक्टरों की संख्या 25 है,जबकि यूरोपीय देशों में यह संख्या 32 है,लेकिन भारत में 1700 की आबादी पर मात्र एक डाॅक्टर हैं।चीन की आबादी भारत से अधिक है,लेकिन प्रति एक लाख जनसंख्या पर वहां 130 डाॅक्टरों की नियुक्ति है,जबकि हमारे यहां उतनी ही आबादी पर केवल 80 डाॅक्टर!केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने स्वीकार किया है कि देश में अभी छह लाख से ज्यादा डॉक्टरों की कमी है,लेकिन वे विश्वास दिलाते हैं कि 2022 तक डाॅक्टरों के रिक्त पदों को भर लिया जाएगा।

बदहाल है ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था
केंद्र सरकार ने ‘नई स्वास्थ्य नीति’-2017 के जरिये सभी देशवासियों को अनिवार्य स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने का ध्येय रखा है।लेकिन,इस लक्ष्य की प्राप्ति में डाॅक्टरों की कमी बड़ी बाधक हो रही है।वहीं,कुकुरमुत्ते की तरह शहर में खुले निजी अस्पतालों और कुछ डॉक्टरों में सेवाभाव की बजाय,धनार्जन की बलवती होती भावना ने चिकित्सा को लूट का माध्यम बना रखा है,जबकि सरकारी अस्पतालों में जरुरी दवाओं,प्रशिक्षित डाॅक्टरों और आपातकालीन सुविधाओं के अभाव ने गरीब परिवारों के जीवन को कीमतहीन बना दिया है।हम डॉक्टर को भगवान का दूसरा रुप मानकर उन्हें उचित मान-सम्मान देते हैं,लेकिन आज ऐसे कितने डॉक्टर हैं,जो सेवा की भाव से अपने मरीजों का इलाज करते हैं?ग्रामीण अंचल स्थित स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी सुविधाएं बहाल हों,तो स्थिति काफी हद तक बदल सकती हैं।ये केंद्र ग्रामीण-भारतीय चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ और ग्रामीणों का भरोसा हैं।देश की एक बड़ी आबादी को सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र प्रमुख भूमिका अदा करते हैं।दरअसल,ग्रामीण भारत की एक बड़ी आबादी आज भी चिकित्सा के लिए इन केन्द्रों पर ही आश्रित है।इनकी नजदीकी उपलब्धता तथा निःशुल्क प्रकृति के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग प्राथमिक तौर पर उपचार हेतु इन केन्द्रों में आते हैं।प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को अधिक क्षमतावान बनाने की जरुरत है।आम तौर पर देखा गया है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में प्रशिक्षित डाॅक्टर की कमी रहती है और दवा तथा जांच मशीनों की अनुपलब्धता की वजह से जटिल बीमारियों का इलाज संभव नहीं हो पाता।इस वजह से,मरीज रेफर कर दिये जाते हैं।

पर्याप्त निवेश की जरुरत
भारतीय चिकित्सा व्यवस्था की एक और प्रचलित समस्या पर्याप्त सरकारी निवेश को लेकर है।मौजूदा समय में सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र पर सकल घरेलू उत्पाद का महज एक फीसदी हिस्सा ही खर्च कर पा रही है,जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सकल घरेलू उत्पादन का करीबन 5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करने का मानक बनाया हुआ है।चिंताजनक यह है स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च के मामले में हम निम्न आय वाले देश मसलन श्रीलंका,बांग्लादेश,नेपाल से भी पीछे हैं।सर्वाधिक आबादी वाले देश चीन में वहां की सकल घरेलू उत्पाद का 3 फीसदी खर्च स्वास्थ्य सुविधाओं पर किया जाता है।जबकि,अमेरिका और ब्रिटेन में यह आंकड़ा क्रमशः 8.3 और 9.6 फीसदी के आसपास का है।स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र है,जिसपर अधिक ध्यान देने की जरुरत है।एक बच्चा जिसने जन्म लिया है,वह आगे जाकर क्या बनेगा या क्या करेगा,यह बहुत हद तक उसकी सेहत पर ही निर्भर करता है।समाज का भविष्य कैसा होगा,इसका निर्धारण भी किसी प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति ही करती है,लिहाजा इस क्षेत्र में अधिक से अधिक निवेश की जरुरत है।स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त निवेश तथा निगरानी से ही हालात सुधरेंगे।

सुधीर कुमार
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
संपर्क-09308242631,8787254803

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