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महाराष्ट्र में ग्रेट पोलिटिकल ड्रामा

छत्रपति शिवाजी महाराज की जन्मस्थली मराठवाड़ा में मुख्यमंत्री पद को लेकर बीजेपी और शिवसेना के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। अमृत नाहटा की 1977 में बनी फिल्म किस्सा कुर्सी का मायानगरी महाराष्ट्र में एक बार फिर सजीव हो उठी है। किरदार जरूर बदले है मगर ले देकर कहानी वही पुरानी है। हम बात कर रहे है महाराष्ट्र की। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बीच कुर्सी की लड़ाई अपने चरम पर है। एक ही पाले के पहलवान एक दूसरे पर धोबी पछाड़ दांव आजमा रहे है। 24 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से शिवसेना राज्य में ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री बनाने के फॉर्मूले पर अड़ी है। जबकि भाजपा इस फॉर्मूले पर सहमत नहीं है। महाराष्ट्र की सत्ता में 50-50 का फॉर्मूला 1999 में भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने दिया था, मगर तब शिवसेना इस पर राजी नहीं हुई थी। ऐसे में गठबंधन सरकार नहीं बन पाई थी। बीस साल बाद इस बार 50-50 की यह शर्त शिवसेना की ओर से रखी जा रही और अब भाजपा इस पर सहमत नहीं हो रही है। कुर्सी प्राप्ति के दोनों के रास्ते जरूर अलग अलग है मगर सत्ता की मंजिल एक है। ये कैसी महायुति है जहाँ एक दूसरे पर लगातार आरोप प्रत्यारोप की बाण बर्षा हो रही है। महाराष्ट्र देश की आर्थिक राजधानी है जिस पर कब्जा जमाने के लिए सत्ता संघर्ष तेज हो गया है। भाजपा को शिवसेना से दुगुनी सीटें हासिल होने के बावजूद अपने ही गठबंधन के साथी से राज की चाबी के लिए दो दो हाथ करने पड़ रहे है। सत्ता संघर्ष के इस अनोखे ड्रामे को पूरा देश देख रहा है।
महाराष्ट्र की सियासत भी अजब गजब है। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की कभी यहाँ तूती बोलती थी। बड़े बड़े हुकमरान ठाकरे की हाजिरी बजाते थे। चाहे वे नेता हो या अभिनेता अथवा उधमी। वे तब तक अपना राजपाट सकुशल नहीं समझते जब तक ठाकरे की हरी झंडी नहीं मिलती। ठाकरे का हिंदुत्व किसी से छिपा नहीं था। भाजपा से गठजोड़ ठाकरे के समय ही हुआ था। उस समय शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में थी और भाजपा छोटे भाई की। अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी अपने मुंबई प्रवास के दौरान मातेश्री जाना नहीं भूलते।
अपने उग्र हिंदुत्व की छवि के कारण बाल ठाकरे की गिनती देश और प्रदेश के जाने माने राजनेताओं में होती थी। जिन्होने शिव सेना के नाम से एक प्रखर हिन्दू राष्ट्रवादी दल का गठन किया था। लोग प्यार से बालासाहेब ठाकरे कहते थे। वे मराठी में सामना नामक अखबार निकालते थे। उनके अनुयायी उन्हें हिन्दू हृदय सम्राट कहते थे। सामना आज भी अपने पुराने तेवर के साथ निकल रहा है। ठाकरे ने अपने जीवन का सफर एक कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू किया था। पहले वे अंग्रेजी अखबारों के लिये कार्टून बनाते थे। बाद में सन् 1966 में उन्होंने शिव सेना की स्थापना की। मराठी भाषा में सामना के अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी भाषा में दोपहर का सामना नामक अखबार भी निकाला। इस प्रकार महाराष्ट्र में हिन्दी व मराठी में दो-दो प्रमुख अखबारों के संस्थापक ठाकरे ही थे। अपने संघर्ष और जीवट के बलबूते उन्होंने शिव सेना को सत्ता की सीढ़ियों पर पहुँचा दिया। 1995 में भाजपा-शिवसेना के गठबन्धन ने महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाई। बताया जाता है दिवंगत भाजपा नेता प्रमोद महाजन ने भाजपा शिवसेना गठजोड़ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब तक ठाकरे जीवित रहे तब तक भाजपा जूनियर पार्टनर रही। बाल ठाकरे का निधन 2012 में हुआ। उनके बेटे और भतीजे में पार्टी के प्रभुत्व को लेकर हुए संघर्ष के बाद भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ाई और 2014 के चुनाव में 122 सीटों के साथ शिवसेना को पीछे छोड़ दिया और देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में शिवसेना के साथ मिलकर अपनी सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की। अब भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आ चुकी थी। बाल ठाकरे के निधन के बाद उनके बेटे उद्धव ने पार्टी की कमान सम्भाली। वे चाहते थे उनके पिता की तरह भाजपा के नेता उनके यहाँ हाजिरी लगाए मगर तब तक काफी कुछ बदल चुका था। 2014 से 2019 तक सत्ता के आपसी टकराव के बाद भी भाजपा शिवसेना युति की सरकार चलती रही। अब 2019 में हुए चुनाव में भाजपा की ताकत 122 से घटकर 105 पर आ गयी। हालाँकि शिवसेना का आंकड़ा भी 56 से आगे नहीं बढ़ पाया। दोनों को मिलकर स्पष्ट बहुमत मिला है मगर आधे आधे के फार्मूले पर शिवसेना अड़ गयी और हाल फिलहाल सुलह होते दिखाई नहीं दे रहा है। इसी बीच शिवेसना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने चेतावनी दी है हम बीजेपी की तरफ से जवाब का इंतजार कर लेंगे, लेकिन हमें किसी और विकल्प के बारे में सोचने के लिए मजबूर न किया जाए। हम कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते जो बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के लिए सही न हो। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस अप्रिय विवाद को कैसे निपटाते है यह विचारणीय है। गौरतलब है शिवसेना जैसे तैसे उद्धव के बेटे आदित्य को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहती है मगर भाजपा इसे मानने को तैयार नहीं है। इसी के साथ ग्रेट पोलिटिकल ड्रामे की शुरुआत हो चुकी है। देखना यह है इस ड्रामे में किसकी जीत और किसकी हार होती है।

बाल मुकुंद ओझा
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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