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महिलाओं के नाम पर देश की बदनामी क्यों

भारत में कहा जाता है कि यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। भारत में नारी को देवी के रूप में देखा गया है। भारत में प्राचीन काल से ही यह परम्परा रही है की यहां महिलाओं को समाज में विशिष्ट आदर एवं सम्मान दिया जाता है। भारत वह देश है जहां महिलाओं की सुरक्षा और इज्जत का खास ख्याल रखा जाता है। भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी लक्ष्मी का दर्जा दिया गया है। अगर हम इक्कीसवीं सदी की बात करे तो यहां की महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला काम कर रही है।
हमारे देश में महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर अधिकार है। वे देश की आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है तथा विकास में भी आधी भागीदार है। इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता की आज के आधुनिक युग में महिला पुरुषों के साथ ही नहीं बल्कि उनसे दो कदम आगे निकल चुकी है। महिलाओं के बिना दिनचर्या की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारतीय संविधान के अनुसार महिलाओं को भी पुरुषों के समान जीवन जीने का हक है।
हाल ही में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की ओर से जारी किए गए एक सर्वे में भारत को पूरी दुनिया में महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक और असुरक्षित देश माना गया है। महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानव तस्करी और यौन व्यापार में ढकेले जाने के आधार पर भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है। इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे, सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं। 550 विशेषज्ञों के द्वारा किए गए इस सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा के खतरों के लिहाज से एकमात्र पश्चिमी देश अमेरिका है।
इस सर्वे में 193 देशों को शामिल किया गया था, जिनमें से महिलाओं के लिए बदतर शीर्ष 10 देशों का चयन किया गया। इस सर्वे को 26 मार्च से 4 मई के बीच ऑनलाइन, टेलीफोन के माध्यम के साथ, लोगों से मिलकर, बातचीत कर पूरा कराया गया था। इसमें यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया के पेशेवर, शिक्षाविद, स्वास्थ्य देखभाल कर्मचारी, गैर सरकारी संगठन के लोग, नीति निर्माता, विकास विशेषज्ञ और सामाजिक टिप्पणीकार शामिल थे।
इससे पूर्व 2011 में हुए इस प्रकार के सर्वे में अफगानिस्तान, कॉन्गो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश माने गए थे। वहीं इस साल भारत तीन पायदान ऊपर खिसक पहले स्थान पर आ गया है इससे यह साबित होता है कि 2012 में दिल्ली में एक चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद अभी तक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त काम नहीं किए गए हैं। साल 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा और उनके खिलाफ होने वाली हिंसा देश के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया था।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2007 से 2016 के बीच महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध में 83 फीसदी का इजाफा हुआ है। भारत में हर घंटे में 4 बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते है। सर्वे के मुताबिक भारत मानव तस्करी, यौन हिंसा, सांस्कृतिक व धार्मिक परम्पराओं के कारण और महिलाओं को सेक्स धंधों में ढकेलने के लिहाज से अव्वल है।
सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से पूछा गया कि 193 संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशो में से महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक पांच देश कौन से हैं। स्वास्थ्य, आर्थिक संसाधन, सांस्कृतिक और पारम्परिक प्रथाओं, यौन हिंसा, उत्पीडऩ, गैर-यौन हिंसा और मानव तस्करी के मामले में कौन सा देश सबसे खराब है। उत्तरदाताओं ने भारत को मानव तस्करी, यौन उत्पीडऩ और सेक्स स्लेवरी, घरेलू ग़ुलामी और जबरदस्ती विवाह कराने और भ्रूण हत्या कराने के आधार पर भी महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश बताया है। इस लिस्ट में पाकिस्तान 6 नम्बर पर है, जबकि अमेरिका का स्थान दसवां है। अफगानिस्तान आर्थिक संसाधनों, स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी और यौन हिंसा के कारण तीसरे स्थान पर है।
क्रिकेटर गौतम गंभीर ने इस रिपोर्ट के बाद ट्वीट करते हुये देश के राजनेताओं को एक सलाह देते हुए लिखा है कि जिस दिन उनकी बेटी, बहन, पत्नी और मां बिना किसी सुरक्षा के घर से बाहर निकलना शुरू कर देगीं। उस दिन हमें इस समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। गौतम गंभीर ने लिखा था कि आजकल बच्चों के साथ रेप की घटनाएं तकरीबन हर दिन सुनने और देखने को मिलती हैं। ऐसे में मुझे डर लगता है कि मेरी दोनों बेटियां कहीं इस शब्द का अर्थ न पूछ बैठें। दो बेटियों का पिता होने पर मुझे खुशी और गर्व है, लेकिन कई बार मैं परेशान भी होता हूं।
अब प्रश्र यह है कि क्या भारत सच में महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है। पाश्चात्य देशों का भारत के प्रति रुख कभी सकारात्मक नहीं रहा है। आज भारत जब जहां एक ओर विकास की लम्बीछलाग लगा रहर है वहीं दूसरी ओर कुछ विदेशी संस्थान दूर कहीं वातानुकूलित कमरों में बैठ कर भारत के ऊपर नकारात्मक रिपोर्ट बना रहे हैं। भारत एक ऐसा देश है जहां नारियों को देवी का स्वरुप मानकर पूजा की जाती है। हां कुछ घटनायें वाकई में शर्मनाक हैं, लेकिन कुछ घटनाओं के लिए पूरे देश को जिम्मेदार तो नहीं ठहराया जा सकता है। इस रिपोर्ट में आपराधिक घटनाओं में वृद्धि इसलिए दिखाई दे रही है, क्योंकि रिपोर्ट बनाने से पहले उनके द्वारा इस प्रकार का माहौल बनाया जाता है।जहां तक बात आती है महिलाओं की सुरक्षा की तो पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अभूतपूर्व निर्णयों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई प्रबंध किये हैं। ऐसे में भारत के प्रति ऐसी नकारात्मक रिपोर्ट भारत में खबर बनाने की विदेशी संस्थाओं की सोची समझी साजिश के अलावा कुछ और प्रतीत नहीं होता। भारत में महिलायें पहले की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित है। आज जहां महिलाये नयी ऊंचाइयों को छू रहीं हैं वहीं दूसरी ओर सुरक्षा के शीर्ष पदों में भी देश का गौरव बढा रहीं हैं। देया में महिलाओं की बेहतरी के लिए बहुत ही सकारात्मक प्रयास किये जा रहें है। भारत में महिला सुरक्षा से जुड़े कानून की सूचि बहुत लंबी है। इसमें हिंदू विडो रीमैरिज एक्ट 1856, इंडियन पीनल कोड 1860, मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1861, क्रिस्चियन मैरिज एक्ट 1872, मैरिड वीमेन प्रॉपर्टी एक्ट 1874,चाइल्ड मैरिज एक्ट 1929, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, हिन्दू मैरिज एक्ट 1955, फॉरेन मैरिज एक्ट 1969, इंडियन डाइवोर्स एक्ट 1969, मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन एक्ट 1986, नेशनल कमीशन फॉर वुमन एक्ट 1990, सेक्सुअल हर्रास्मेंट ऑफ वुमन एट वर्किंग प्लेस एक्ट 2013 आदि। इसके अलावा 7 मई 2015 को लोक सभा ने और 22 दिसम्बर 2015 को राज्य सभा ने जुवेनाइल जस्टिस बिल में भी बदलाव किया है। इसके अन्तर्गत यदि कोई 16 से 18 साल का किशोर जघन्य अपराध में लिप्त पाया जाता है तो उसे भी कठोर सजा का प्रावधान है।
आज महिलाओं के लिए गंदे होते माहौल को बदलने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं अपितु हर आम आदमी की है ताकि हर महिला गर्व से अपने जीवन जी सके। हमें आगे आकर महिला सुरक्षा की लड़ाई में महिलाओं का साथ देना होगा तभी देश की मातृ शक्ति सर उठा कर शान से चल सकेगीं। फिर कोई विदेशी संस्था भारत के खिलाफ इस तरह की नकारात्मक रिपोर्ट जारी करने से पहले सौ बार सोचेगी। अब महिलाओं को समझना होगा कि आज समाज में उनकी दयनीय स्थिति समाज में चली आ रही परम्पराओं का परिणाम है। इन परम्पराओं को बदलने का बीड़ा स्वयं महिलाओं को ही उठाना होगा।

 

रमेश सर्राफ धमोरा

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