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महिलाओं के लिए हर गली असुरक्षित

देश में महिला सुरक्षा को लेकर किये जा रहे तमाम दावे खोखले साबित हुए है। गैर सरकारी संस्थाओं की रिपोर्टों पर महिला अत्याचार की खबरें रोज ही मीडिया की सुर्खियां बनती है मगर इस बार एक सरकारी रिपोर्ट में शर्मसार करने वाली स्थिति उजागर हुई है। यह रिपोर्ट महिला व बाल विकास मंत्रालय की ओर से जारी की गई है। महिला सुरक्षा को लेकर देशभर से रोजाना अलग-अलग खबरें सामने आती रहती हैं। देश में महिलाओं की स्थिति पर हमेशा ही सवाल खड़े होते रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावों और वादों के बाद भी उनकी हालत जस की तस है। रोज दुष्कर्म, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और अत्याचार से रूबरू होती है हमारे देश की महिलाएं।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में गोवा महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से सबसे सुरक्षित राज्य है। इस लिस्ट में देश की राजधानी दिल्ली बहुत नीचे है। महिला व बाल विकास मंत्रालय की ओर जारी की गई पहली जेंडर वलनर्बिलटी इंडेक्स यानि जीवीआई की रिपोर्ट में ये तथ्य आये हैं। इस रिपोर्ट को प्लान इंडिया नाम की एक गैर-सरकारी संगठन ने तैयार किया है। गोवा के बाद इस लिस्ट में शुमार हैं केरल, मिजोरम सिक्किम और मणिपुर। इस रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से जिन राज्यों की हालत सबसे ज्यादा खराब है वो हैं बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और फिर आती है दिल्ली है।
आखिर 21वीं सदी में महिलाओं की सुरक्षा के तमाम कानून बनने के बाद भी महिलाओं को देश में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इस उद्देश्य को लेकर ही यह रिपोर्ट तैयार की गई थी। इन उद्देश्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा, हिंसा से सुरक्षा, गरीबी और पुलिस की ओर से मिलनी वाली सहायता शामिल किये गये थे।
देश में एक बार फिर महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ के खिलाफ भारी आक्रोश के स्वर सुनाई देने लगे है। राजनीतिक दलों की कथनी और करनी से भी पर्दा उठने लगा है। महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय ही नहीं है यही वजह है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हो रही है। महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा की रोकथाम के लिये उठाये गए कदम कोई खास असर दिखाते नजर नहीं आ रहे हैं।
भारत में आए दिन महिलाएं हिंसा और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है। महिलाओं के साथ अत्याचार, शारीरिक शोषण और घरेलू हिंसा के मामले सामने आते हैं लेकिन शारीरिक शोषण के मामलों का ग्राफ काफी ऊपर है। यौन अपराधों पर सख्त कानूनों के बावजूद भी जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं हुआ है। देश में यौन हिंसा के लगातार सामने आ रहे मामलों की वजह से महिलाओं के प्रति समाज के नजरिये पर फिर चर्चा शुरू हो गई है। पिछले कुछ अर्से में महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार, छेड़छाड़ और शोषण जैसे अपराधों में तेजी आई है। छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरों में दर्ज होने वाले हाईप्रोफाइल मामले इसी का सबूत हैं। ऐसा लगता है निर्भया से लेकर चंडीगढ़ तक के सफर में कहीं सुधार के लक्षण परिलक्षित नहीं हो रहे है।
गृह मंत्रालय की 2016-17 की रिपोर्ट के अनुसार साल 2016 में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कुल 3,27,394 मामले दर्ज किए गए थे। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के आंकड़े भयावह तस्वीर पेश करते है। लगभग 96 प्रतिशत महिलाएँ भावनात्मक हिंसा की शिकार होती है जबकि 82 प्रतिशत शारीरिक हिंसा झेलती है । इनमें 70 प्रतिशत महिलाओं को आर्थिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जबकि 15 प्रतिशत महिलायें दहेज प्रताड़ना और 42 प्रतिशत महिलाएँ यौन अत्याचारों का शिकार होती है।
चुनाव सुधार के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच की एक रिपोर्ट में खुलाशा किया गया है कि देश में चुने गए कुल 1500 नेताओं में 51 सांसद और विधायक ऐसे हैं जिनपर महिलाओं के साथ अपराध के मामले दर्ज हैं। इन सांसदों, विधायकों में से 48 विधायकों और तीन सांसदों पर शील भंग, अपहरण, बलात्कार, महिला को विवाह के लिए मजबूर करना, महिला के साथ क्रूरता, वेश्यावृत्ति के लिए नाबालिग लड़कियों की खरीद-फरोख्त और अश्लील इशारा करने जैसे आरोप हैं। यह सभी गंभीर आपराधिक मामले हैं जिनमें या तो आरोप तय हो चुके हैं या फिर कोर्ट ने संज्ञान लिया है।
एडीआर के मुताबिक बीते पांच साल में महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मामले वाले 334 लोगों को राजनीतिक दलों ने अलग-अलग चुनावों में टिकट दिया था। इनमें से 40 लोग लोकसभा या राज्यसभा के चुनाव में, जबकि 294 विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी थे। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार कुल 334 उम्मीदवारों ने अपने ऊपर ऐसे आपराधिक मामलों की जानकारी शपथपत्र में दी, जो महिलाओं पर अत्याचार से संबंधित थे।

– बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
9414441218

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