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महिलाओं को सामाजिक न्याय दिलाना है, तो संसद तक बढ़े पहुँच

भारत महिला और पुरुष के बीच भेदभाव को मिटाने के मामले में चीन और बांग्लादेश जैसे अपने पड़ोसी मुल्कों से काफ़ी पीछे छूट गया है। जो बदलते भारत और उन्नतशीलता के परवान को झटका देते हैं। वैश्विक लैंगिक असमानता सूची 2017 में हमारा देश 21 पायदान की गिरावट के साथ 108 वें स्थान पर पहुँच गया है। एक ओर देश का लैंगिक असमानता सूची में अपने पड़ोसियों से पिछड़ने का मुख्य कारण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की कमजोर भागीदारी और समान वेतन का समान मजदूरी न मिलना है। ऐसे में सवाल जब संविधान ने राज्यों को महिलाओं के उत्थान के लिए विशेष नीतियां बनाने का अधिकार भी प्रदान किया है। साथ ही साथ संविधान लैंगिक असमानता दूर करने, अवसर की पूर्ण समता उपलब्ध कराने पर जोर देता है। फ़िर महिलाओं की स्थिति समाज में कमजोर क्यों? इसके साथ हाल में आई, महिला व बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट देश के बड़े और अहम राज्यों में महिलाओं की हालत को लेकर उनके प्रदर्शन पर सवाल खड़ा करती हैं? वैश्विक लैंगिक असमानता रिपोर्ट के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति के क्षेत्र में महिला और पुरुष के बीच भेदभाव मिटाने में मिली सफलता का आकलन किया जाता है। आज के दौर में 66 फीसदी महिलाओं को बगैर भुगतान के काम करना पड़ता है। इसके साथ देश में स्वास्थ्य के मोर्चे पर महिला-पुरुष के बीच सबसे ज्यादा असमानता अगर व्याप्त है। फ़िर सभी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं की हवा निकल जाती है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश को 141वां स्थान मिला है यानि वह इस मामले में दुनिया का चौथा सबसे कमजोर देश है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश सबसे कमजोर चार देशों में शुमार है। इस स्थिति का कारण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की कमजोर भागीदारी और कम मजदूरी भुगतान है। ऐसे दौर में भारत लैंगिक समानता के क्षेत्र में बांग्लादेश जैसे पड़ोसियों से काफी पिछड़ गया। तो अब महिलाओं के बारे में सोचना होगा। नीतियों का सफ़ल क्रियान्वयन राजनीति को करना होगा, लेकिन उम्मीद क्या करें। जब महिला आरक्षण विधेयक 1996 से एच डी देवगौड़ा की सरकार के समय से अटका हुआ है। जिसका नाम लेकर चुनावी वैतरणी कांग्रेस भाजपा सभी की पार हुई, वह 33 फ़ीसद आरक्षण अभी तक महिलाओं को मयस्सर हो नहीं सका। फ़िर सरकारी नीतियों पर बड़ी शिद्दत से सवाल उठता है, कि बिना महिलाओं का कद संसद में बढ़ाए महिलाओं को उनका हक प्राप्त नहीं हो सकता।

सोलहवीं लोकसभा में आज़ादी के बाद अब तक की सर्वाधिक संख्या है, महिलाओं के संसद तक पहुँचने की। लेकिन 62 महिला सांसदों वाली संसद में महिलाओं की आनुपातिक स्थिति को लेकर 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व परिदृश्य से तुलना करें। तो 2016 में हमारा देश 191 देशों की सूची में 117 वें स्थान से फिसलकर 144 वें पायदान पर पहुंच चुका था। देश में संसद के निचले सदन में 12 फीसदी महिलाएं तो उच्च सदन में मामूली अंतर के साथ महिलाओं की यह संख्या 12.8 फीसदी है। जो 2016 कि रिपोर्ट के मुताबिक 22 फीसदी के वैश्विक औसत के आस-पास भी भटकती नहीं दिखती। यह देश का दुर्भाग्य या कहें, पुरूष प्रधान समाज की महिलाओं को समाज में न उभरने देने का फ़ित्तूर, कि आज़ाद भारत में संसद और आधी आबादी का नेतृत्व आज की तारीख़ में मात्र 12 फ़ीसद महिला सांसद कर रहीं हैं। ऐसे में भारत की स्थिति रवांडा जैसे पिछड़े देशों से भी पांच गुना पीछे है, जहां 63.8 फीसदी महिलाएं संसद के निचले सदन को और 38.5 फीसदी महिलाएं ऊपरी सदन का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह स्थिति उस देश की है, जो आर्थिक विकास और अन्य मुद्दों पर भारत के समकक्ष खड़े होने की हिमाकत नहीं कर सकता, लेकिन उसने लैंगिक समानता के लिए महिलाओं को संसद भेजना उचित समझा, और हमारे देश ने महिलाओं का शोषण। यह स्थिति बदलनी होगी, तभी महिला समाज सशक्त होकर समाज में अपने हक के लिए लड़ सकेगी।

देश में अक्सर लिंग भेद बहस का विषय बनता है। लेकिन कुशल नीतियों का सृजन न होने से आज के परिदृश्य में महिलाओं का एक बड़ा तबक़ा सामाजिक बराबरी के आस-पास नही भटक पा रही है। भारत में लिंग भेद हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। जिसका मुख्य कारण पुरूष प्रधान समाज का स्वामित्व होना है। हाल में जारी लिंग भेदता सूचकांक में विभिन्न राज्यों में महिलाओं के जीवनस्तर और सामाजिक समानता को व्यक्त किया गया है, कि महिलाओं की समाज में वास्तविक स्थिति क्या है। जिसमें मध्यप्रदेश के महिलाओं का जीवनस्तर और समानता का स्तर देश में काफ़ी पिछड़ा हुआ है। जो सूबे की राजनीतिक व्यवस्था को सोचने पर मजबूर करने वाला है, कि आख़िर चूक कहाँ हुई कि महिलाओं को उचित सामाजिक स्थिति देश के समक्ष नहीं मिल पाई।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तत्वावधान में प्लान इंडिया द्वारा तैयार की गयी जेंडर वलनरेबिलिटी इंडेक्स के चार प्रमुख मानक स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और गरीबी थी, जिस आधार पर सामाजिक सन्तुलन की ज़मीनी हकीकत को तौला गया।जिसमें मध्यप्रदेश राज्य भी तमाम सरकारी योजनाएं चलाने के बाद महिलाओं को पुरुषों के समान समानता दिलाने में काफ़ी पीछे रह गया। इस रिपोर्ट में अशिक्षा का प्रमुख कारण गरीबी को माना गया है। जो लड़कियों की शिक्षा में समानता लाने में मध्यप्रदेश के लिए बड़ा रोड़ा साबित हुआ। वहीं राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले सूबे में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर काफ़ी अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड, मध्य प्रदेश और मेघालय जैसे राज्यों में लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर सबसे ज़्यादा है। अगर मध्यप्रदेश की तुलना राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से महिलाओं को अधिकार दिला पाने में करें, तो उस दिशा में भी सूबे की आबोहवा काफ़ी मद्धिम दिखती है। दिल्ली में महिला साक्षरता दर 64.4 फ़ीसद है, साथ में लड़कियों के लिए लगभग प्रत्येक विद्यालय में अलग शौचालय की व्यवस्था है।।

जेंडर वलनरेबिलिटी इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश देश का ऐसा राज्य है, जहां नाबालिगों के साथ छेड़छाड़ व दुष्कर्म करने वाले लगभग 92 फ़ीसद आरोपी पीड़िता के परिचित होते हैं।  इसके अलावा प्रदेश की 33 फीसदी महिलाओं को कभी न कभी घरेलू हिंसा का सामना करना ही पड़ता है। इसके अलावा सरकारी नीतियों के तले कब 30 फीसदी लड़कियां आज भी 18 वर्ष की उम्र से पहले ही ब्याह दी जाती हैं। इसकी कोई खबर शासन- प्रशासन के कानों तक नहीं पहुँचती। राजधानी सहित हमारा प्रदेश महिलाओं के लिए कितना सुरक्षित और सजग है, उसका पता बीते सप्ताह राजधानी में हुई घटना से लगा सकते हैं? एक ओर प्रदेश में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएं हैं। इसके बावजूद रिपोर्ट के मुताबिक सूबे की महिलाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, हिंसा से सुरक्षा, आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय प्राप्त करने में पिछड़ी हुई हैं। जो प्रदेश की महिला सुरक्षा और न्याय सम्बन्धित नीतियों को कटघरे में खड़ा करती हैं। मध्यप्रदेश को लाल सूची में रखे जाने का अर्थ इससे समझा जा सकता है, कि सूबे की 30 फीसदी महिलाओं की शादी संवैधानिक तरीके को ठेंगा दिखाकर 18 वर्ष से पहले करा दी जाती है। 33 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं। तो संचार के युग में भी मात्र 28.7 फीसद महिलाओं के पास खुद का मोबाइल-फोन है। मात्र 37 प्रतिशत महिलाएं बैंक का उपयोग और जनप्रतिनिधियों की संख्या तो मात्र किसी तरह दहाई का आंकड़ा छूती है। ऐसे में महिला समानता का मुद्दा बेमानी लगता है, जब चुनावों में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसद आरक्षण की मांग होती है, तो उस पर राजनीतिक दलों को बगैर स्वार्थ के अमल भी करना चाहिए। स्वच्छ भारत के दौरान भी 64.4 फीसदी घरों में आज सूबे में टॉयलेट नहीं है। जिसके कारण महिलाएं खुले में शौच को मजबूर हैं।

सूबे की महिलाओं के शिक्षा स्तर की बात करें, तो आज़ादी के सत्तर साल बाद भी जब देश की साक्षरता 70 के आंकड़े को पार कर चुकी है, तब सूबे की लगभग आधी से अधिक आधी आबादी निरक्षर है। जबकि देश में महिलाओं का औसत सारक्षता स्तर 70 फीसद है। 99.7 फीसद स्कूली बच्चियों के लिए अलग से टॉयलेट बनाकर सूबे में खड़े तो कर दिए गए हैं, लेकिन उपयोग योग्य मात्र 45.9 फीसद ही है। इसके अतिरिक्त देश में मध्यप्रदेश की स्थिति महिला सुरक्षा में 22 वें स्थान पर , स्वास्थ्य में 14 वें, आर्थिक स्थिति में 25वें पर और शिक्षा में 26 वें स्थान पर है।
भारतीय महिलाएं आज के दरमियान में किसी क्षेत्र में पीछे नहीं है। बात मध्यप्रदेश की हो, तो सूबे से निकलकर महिलाएं लोकसभा अध्यक्ष, और मुख्यमंत्री भी बनी है। राजनीति, शिक्षा, कला, संस्कृति आदि सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाती हुई राज्य की महिलाएं दिख सकती हैं। संविधान ने राज्यों को महिलाओं के उत्थान के लिए विशेष नीतियां बनाने का अधिकार भी प्रदान किया है। साथ ही साथ संविधान लैंगिक असमानता दूर करने, अवसर की पूर्ण समता उपलब्ध कराने पर जोर देता है।

साथ में सूबे की सरकार महिलाओं और बेटियों को सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा देने की मियाद से अनमोल ऐप्प, मुख्यमंत्री कौशल संवर्धन योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान, निकाह विवाह योजना, कौशल्या योजना, राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना, मिशन इन्द्रधनुष अभियान, प्रतिभा किरण योजना, और पोषण आहार योजना जैसी अनेकोनेक योजनाएं चला रही है। ऐसे में अभी भी राज्य में महिलाओं की स्थिति और दशा में पूर्ण सुधार नहीं दिख रहा। तो उसका मुख्य कारण नीतियों का सफ़ल क्रियान्वयन न होना है। तमाम क़ानूनों के बाद भी महिलाएं सामाजिक स्थलों और कार्यस्थलों पर कुदृष्टि से संक्रमित होती हैं। तो इन असमाजिक तत्वों से महिलाओं को सुरक्षा दिलवाने का सबल और सार्थक प्रयास होना होगा। उसके साथ जनप्रतिनिधि के रूप में भी महिलाओं को ज्यादा से ज़्यादा मौका मिलना चाहिए, क्योंकि महिलाओं की समस्याओं को पुरुषों से बेहतर ख़ुद महिलाएं समझ सकती हैं।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन
9457560896

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