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मुसीबत की थैलियां !

एक साहित्यिक विमर्श के दौरान इस बात पर चर्चा हुई कि सड़क के किनारे पन्नी खाती गाय को देखकर ख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी उसे अपने व्यंग्य में उकेरा है । वह स्थिति आज भी उतनी ही गंभीर बनी हुई है । पन्नियां घटी नहीं बल्कि बढ़ती ही गई और आए दिन शहरों में न जाने कितनी ही गाय पन्नियों को खाकर बीमार होतीं हैं या फिर मर जाती है । आज इसके खिलाफ की जाने वाली तमाम बातों के बावजूद हालात में कितना बदलाव आया है । मेरे दिवंगत पिता पशु चिकित्सक थे । मुझे याद है कि उन्होंने कितनी ही गायों का ऑपरेशन करके पेट से पन्नियों का ढेर निकाले जाने की चर्चा की थी । आश्चर्य है कि गाय को लेकर आम लीग कई बार हमलावर होने कि हद तक संवेदनशील होते हैं, लेकिन पन्नी खाकर उनके मरने को लेकर उन्हें कोई फ़िक्र नहीं होती । अधिकतर लोग बाजार से खरीदारी करने के बाद सामान के लिए पन्नियों का ही उपयोग करते हैं । हर रोज शाम को हाथ हिलाते हुए बिचरने जाते हैं और लौटते वक्त दोनों हाथों की पांचों अंगुलियों में सब्जियों से भरी पन्नियों की थैलियां घर लाते हैं ।

हमारी परंपरा में चीजों के बारंबार उपयोग में विश्वास है । अक्सर ‘यूज़ एंड थ्रो’ यानी ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाली चीजों को भी हम बार-बार उपयोग करने से नहीं चूकते हैं । प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें और डिब्बे अधिकतर घरों में बार-बार धोकर उपयोग में लाए जाते है ! देश में पॉलिथीन की थैलियों का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है । थोड़ी-सी सुविधा के चलते लोग कपड़े से बने थैलों की अपेक्षा पॉलिथीन की थैलियों को ज्यादा उपयोगी समझ रहे हैं और धड़ल्ले से स्तेमाल कर रहे हैं । पूरे विश्व में प्रति मिनट, कितना प्लास्टिक कचरा इकट्ठा होता है, इसकी कल्पना भी नहीं कि जा सकती । यह तकनीकी जानकारी भी देना उचित नहीं लगता कि कितने माइक्रोन की पॉलिथीन का उपयोग करना चाहिए । दरअसल, उपयोगकर्ता चाहे वह कितना ही पढ़ा-लिखा क्यों ना हो, इतनी निपुणता नहीं रखता कि वह नियत माइक्रोन की पॉलिथीन की बनी थैलियों को चुनाव कर सके । इसलिए प्लास्टिक को पूरी ‘न’ कहा जाए, इस बात पर जोर दिया जाना ज्यादा जरूरी है । अब इसके व्यापक नुकसानों और पर्यावरण घटक असर को देखते हुए राजनीतिकों कि ओर से भी इस पर पाबंदी कि बातें कि जाने लगीं हैं, सच यह है कि पर्यावरणविद लम्बे समय से इस बारे में देश और समाज को चेतावनी देते रहे हैं । अगर वक्त रहते देश के राजनीतिक वर्ग और समाज ने इसके प्रति कोई ठोस संकल्प नहीं लिया तो आने वाले वक्त में इसका भयावह खामियाजा भुगतना पड़ ।

कुछ समय पहले एक खबर आई थी कि कचरे के ढेर से अपनी भूख मिटाती गायें अचानक बीमार पड़ गई । खाना पीना बंद कर दिया था, उनके पेट बुरी तरह फूल गए थे और फिर कई गायों कि तड़प-तड़प कर मौत हो गई थी । गायों जब पोस्टमार्टम किया गया तो पता चला कि उनकी आहार नलिका पॉलिथीन की थैलियों से बुरी तरह अवरुद्ध हो गई थी । ऑपरेशन से जो थैलियों का कचरा आंत से निकाला गया, उनमें से अधिकतर थैलियों में घरों से फेंका गया अतिरिक्त खाना अब भी सुरक्षित था । ऐसा केवल इसलिए हुआ कि लोग घर लाई गई पॉलीथीन की थैलियों को फेंकने के पहले उनमें घर की अतिरिक्त खाद्य सामग्री, फलों या सब्जियों के छिलके आदि को भरकर रख देते हैं । फिर इसको पोटली नुमा बना कर फेंक देते हैं । कचरे के ढेर से अपनी भूख मिटाते जानवर इन पोटलियों को साबुत निगल जाते हैं ।

भारत तीज-त्यौहार और उत्सवों का देश है । जगह-जगह मंदिर निर्मित किए गए हैं । इनमें पूजन प्रसाद का वितरण प्लास्टिक की थैलियों, कटोरिया और गिलासों में किया जाता है । भक्त और दर्शनार्थी इस प्रसाद को श्रद्धापूर्वक ले तो लेते हैं, लेकिन प्रसाद को खाने के बाद लापरवाही पूर्वक सड़क पर फेंक देते हैं । इनमें बचा हुआ प्रसाद जानवरों को आकर्षित करता है और वे उसे निगल लेते हैं । कामोवेश सभी पर्यटन स्थलों की स्थिति भी ठीक नहीं है । मैं कुछ पांच साल मुंबई में पदस्थ था । एक सपना लेकर गया था कि गेटवे ऑफ इंडिया से खूबसूरत नीले समुद्र को निहारूंगा, लेकिन वहां की हालत देखकर सारे सपने टूट गए । मुंबई के अधिकतर समुद्र तट पानी की खाली प्लास्टिक की बोतलों से अटे पड़े हैं । ज्यादातर पर्यटक लापरवाही से खाली बोतलें समुद्र में उछाल देते हैं ।

मुझे किसी फिल्म का एक वीभत्स दृश्य याद आता है, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के सिर पर पालीथीन की थैली इस तरह पहना देता है कि उसकी सांस अवरूद्ध हो जाती है । उखड़ती सांसों के साथ फूलती-पिचकती पालीथीन देखकर जी दहल जाता है । तो क्या हम मनुष्यों का जीवन भी इसी तरह प्लास्टिक की पन्नियों के अंधाधुंध प्रयोग से अवरूद्ध हो जाएगा ? अब चेतने का समय नहीं आ गया है ?

[] राकेश सोहम्
एल – 16 , देवयानी काम्प्लेक्स, जय नगर
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फ़ोन : 0761 -2416901 मोब : 08275087650

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