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मूल प्रश्नो को टालते हैं राजनैतिक दल

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान और अभी हो रहे विधानसभा चुनाव के दौरान खुद मैंने नेशनल टी वी चैनल के लाइव कार्यक्रम में उस वक्त हाजिर तमाम राजनितिक दलों के प्रतिनिधियों से सीधा सवाल पूछा कि वो यह बात स्पष्ट करें कि सार्वजनिक विभागों का निजीकरण जो किया जा रहा है,उसके वो पक्ष में हैं या फिर विपक्ष में क्योंकि ये जनता से जुड़ा हुआ सीधा सवाल है और आपको जानकार हैरानी होगी कि इस प्रश्न का उत्तर किसी भी राजनितिक दल के प्रतिनिधि ने देना उचित नहीं समझा।यहाँ तक कि एक एंकर ने तो यहाँ तक लाइव कार्यक्रम में बोल दिया कि अगर आपके सवाल का जवाब इन नेताओं ने दे दिया तो इनकी दुकान बन्द हो जायेगी और मेरा ये शो बन्द हो जाएगा।
खेर,मेरे मन में प्रश्न यह है कि आखिर मूल प्रश्नों से देश के तमाम राजनितिक दल या फिर क्षेत्रीय दल आखिर कन्नी क्यों काटते हैं और इन प्रश्नों के जवाब क्यों नहीं हैं इनके पास।पेंशन को लेकर भी जो सवाल हैं,बेरोजगारी को लेकर जो सवाल है,शिक्षा,सुरक्षा और चिकित्सा को लेकर जो सवाल हैं,महिला सुरक्षा को लेकर जो सवाल है।यहाँ तक कि कच्चे कर्मचारियों को लेकर जो सवाल है।पता नहीं कोई भी दल इनसे बचता क्यों है?जबकि उल-जलूल सवालों के जवाब इनके पास बहुत है और शायद इन्हें उन सवालों को लेने और उनके जवाब देने में भी मजा आता है।
खेर,अब देखिए जनता का भी एक बड़ा तबका इन्हीं के छलावे में उलझकर रहा गया है और उसने भी सवालों का मुख ही मोड़ दिया जबकि सच यह है कि यदि कोई भी दल यदि सार्वजिनक विभागों के निजीकरण पर अपना रुख साफ़ नहीं करेगा तो वह बेरोजगारों को नौकरी देने का दावा या वादा कैसे कर सकता है?ये सवाल तो पूछा जाना लाजिमी है और जनता को इसका उत्तर चाहिए भी और इसलिए भी चाहिए कि अगर सार्वजनिक विभाग नहीं बचेंगे तो फिर जनता को मूलभूत सुविधाएं कौन और कैसे उपलब्ध करवाएगा?लेकिन जो सवाल गंभीर है वही सवाल अनुत्तरित है।जो सवाल हर समस्या से जुड़ा है,उसी सवाल का कोई जवाब नहीं देना चाहता,आखिर क्यों?गजब तो ये भी है कि वोट हथियाने के लिए लोकलुभावन वादे सभी कर रहे हैं और सभी जनता को हिपनोटाइज करके सत्ता की और चलना चाह रहे हैं।कहीं ऐसा तो नहीं है कि एक समय ऐसा आएगा और सब कुछ धूल धूसरित हो जायेगा और हम सब हाथ मलते रह जाएंगे।अब देखिये रेल का निजीकरण भी किया जा सकता है,किसी ने सोचा भी नहीं होगा लेकिन हो रहा है और ऐसा करने से कितने रोजगार चले जाएंगे,किसी ने सोचा भी नहीं होगा और निजी ठेकेदार किस तरह का रोजगार देगा और कितना शोषण करेगा,यह जग जाहिर है ही।लेकिन दूसरी तरफ बेवजह के मुद्दों पर इनसे कितनी ही कोई भी बात करवा ले,ये कर सकते हैं।आखिर कब तक चलेगा ये खेल इन तमाम दलों का मूल सवालों से कन्नी काटने का,देर सवेर ही सही जवाब तो देना ही पडेगा और जनता को भी चाहिए कि वो हर एक  पार्टी से सवाल करे और उनके घोषणा पत्र पर भी सवाल पूछे कि जो आपने लिखा है,उसे कैसे,किस तरह और कब तक पूरा करेंगे?तब जाकर ही कुछ ठीक होगा और लोकतन्त्र की ये खूबसूरती भी है जिसे हमेशा ज़िंदा रखना भी चाहिए वरना फिर पछताए क्या जब चिड़िया चुग गई खेत….
कृष्ण कुमार निर्माण

 

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