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मूवी रिव्यू: ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’

फिल्म का नाम : टॉयलेट – एक प्रेम कथा
डायरेक्टर: श्री नारायण सिंह
स्टार कास्ट: अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, सुधीर पांडेय, दिव्येंदु शर्मा
अवधि: 2 घंटा 41 मिनट
सर्टिफिकेट: U/A
रेटिंग: 2.5 स्टार

पिछले कुछ वर्षों से अभिनेता अक्षय कुमार बायोपिक या असल मुद्दों पर आधारित फिल्मों का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं. उनकी एयरलिफ्ट, रुस्तम, बेबी, जॉली एलएलबी 2 जैसी फिल्मों ने दर्शकों को सिनेमाघर तक जाने की आदत डलवा दी है. और अबकी बार गांव में अहम मुद्दे ‘टॉयलेट’ पर अक्षय ने सबका ध्यान आकर्षित करने की बात कही है. फिल्म को एमएस धोनी, स्पेशल छब्बीस, बेबी और अ वेडनेसडे जैसी फिल्मों को एडिट करने वाले श्रीनारायण सिंह ने डायरेक्ट किया है. तो अक्षय कुमार और श्री नारायण सिंह ने कैसा काम किया है- आइए जानते हैं:

कई घरों से जुड़ी है कहानी
यह कहानी मथुरा शहर के पास के एक गांव के रहने वाले केशव (अक्षय कुमार) की है जो एक मांगलिक लड़का है. इस वजह से 36 साल का होते हुये भी उसकी शादी नहीं हो रही है. पहले उसकी शादी एक भैंस (मल्लिका) से कराई जाती है. केशव की एक साइकल की दुकान है और एक दिन जब वो साइकल डिलीवरी करने जया (भूमि पेडनेकर) के घर जाता है तो आंखों आंखों में प्यार हो जाता है और फिर शादी भी. लेकिन कहानी तब शुरू होती है जब शादी के बाद जया ससुराल आती है और पता चलता है कि घर में शौचालय नहीं है. वह ऐसे घर में रहने से साफ मना कर देती है और फिर कई रुढ़िवादी बातें सामने आती है और कहानी में अलग-अलग किरदार अपने अपने पात्रों को निभाते हुए कहानी को आगे ले जाते हैं.

इन बातों पर होगी टॉयलेट एक प्रेम कथा की तारीफ
– फिल्म का डायरेक्शन, सिनेमैटोग्राफी, लोकेशन बढ़िया हैं. गांव की रियल लोकेशंस के शूट कमाल के लगते हैं. अक्षय की पहनी नकली ब्रैंडेड टीशर्ट्स रियल और फनी लगती हैं.
– फिल्म में ‘खुले में शौच’ के मुद्दे को दर्शाने की कोशिश की गई है जो अमूमन सेकंड हाफ से शुरू होती है. इंटरवल से पहले केशव और जया के प्यार पर फोकस करने वाली कहानी दर्शाई गई है.
– फिल्म के कई संवाद प्रभावित करते हैं. जैसे- जब तक समस्या निजी ना हो कौन लड़े, कौन हल निकाले या तुम्हारी लड़ाई सभ्यता से है आदि. साथ ही सरकार की स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत गांव में क्या-क्या नियम-कानून हैं, के बारे में भी बताया गया है.
– अक्षय कुमार का अभिनय उम्दा और सराहनीय है. किरदार को बखूब निभाया गया है. वहीँ भूमि पेडनेकर ने भी सहज काम किया है. सुधीर पांडेय और प्यार का पंचनामा वाले दिव्येंदु आपको हैरान करते हैं. बाकी सह कलाकारों ने भी फिल्म के लिहाज से ही एक्टिंग की है. अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर का मोनोलॉग कमाल का है जो सोचने पर विवश भी करता है.

लंबी फिल्म में कमजोर संगीत फिल्म की ये बात खटकती है कि इसकी लंबाई बहुत ज्यादा है और इसकी एडिटिंग पर काम जरूर किया जाना चाहिए था. फर्स्ट हाफ जहां काम चलाऊ है वहीं सेकेंड हाफ में भी कहानी काफी खिंची हुई लगती है. डायरेक्टर होने से पहले श्रीनारायण ने एयरलिफ्ट, रुस्तम, बेबी, जॉली एलएलबी 2 जैसी फिल्में एडिट की है. इस बार भी वो हुनर प्रयोग में अच्छे से लाना चाहिये था. जहां तक फिल्म के संगीत की बात है तो ये औसत है. लठ्ठ मार वाला गीत ही कुछ अच्छा लगता है.

थोड़ी फूहड़ता भी दिखती है
वहीं फिल्म में कहीं-कहीं फूहड़ता भी नजर आती है जैसे अक्षय का संवाद है कि औरत धोती है क्या, जो मैं उसे संभालूं, या भाभी जवान हो गई दूध की दुकान हो गई आदि. ये जबरदस्ती से ठूंसे गए डायलॉग्स लगते हैं. टॉयलेट पर स्कैम और ना बनवाने के कारण भी दर्शाए गए हैं, लेकिन कोई भी ऐसी बात नहीं है जो सीधे दिल में घर कर जाए. वहीं फिल्म में ना ही रोमांस मुकम्मल हो पाया है और ना ही मुद्दे पर बात. सब घालमेल सा हो गया है.

बॉक्स ऑफिस
फिल्म का बजट लगभग 18 करोड़ है और कहा जा रहा है की अक्षय ने अपनी फीस नहीं ली है बल्कि वो प्रॉफिट शेयर करने वाले हैं. फिल्म में भी कई ब्रैंड्स को प्रमोट किया गया है. फिल्म 3200 से ज्यादा स्क्रीन्स में रिलीज की जाएगी. और मुद्दा ऐसा है कि बड़े वीकेंड की उम्मीद की जा रही है. सारे आंकड़े मिलाकर फिल्म की रिकवरी कॉस्ट 105 करोड़ है. यानी 110-115 करोड़ की कमाई पर ही ये हिट कहलाएगी और 140 करोड़ की कमाई पर सुपर हिट. वैसे बीते कुछ समय में जिस तरह बॉलीवुड की फिल्में फ्लॉप हो रही हैं, उसे देखते हुए तो टॉयलेट एक प्रेम कथा का इतनी कमाई करना जरूरी भी है.

कहानी

आपने घर में टॉयलेट ना होने पर पति से तलाक की कई खबरें पढ़ी होंगी. ये कहानी भी कुछ ऐसी है लेकिन थोड़ी बॉलीवुड टाइप की है. साइकिल की दुकान चलाने वाले केशव (अक्षय कुमार) को अमीर खानदार की लड़की जया से पहली नज़र में ही प्यार हो जाता है. प्यार परवान चढ़ता है और दोनों शादी कर लेते हैं. शादी की पहली रात ही जब महिलाएं सुबह होने से पहले जया को शौच के लिए खेतों के जाने के लिए जगाती हैं तो उसे पता चलता है कि घर में शौचालय नहीं है. जया का कहना है कि उसे घर में टॉयलेट चाहिए. केशव की मुश्किल उसके पिता हैं जो घर में पंडित हैं और वो मानते हैं कि जिस आंगन में तुलसी है वहां टॉयलेट नहीं बन सकता है. वैसे तो ये कोई बड़ी बात नहीं है कि जैसे सारी महिलाएं लोटा लेकर खेतों में चली जाती हैं वैसे जया भी चली जाए लेकिन वो ऐसा नहीं करती है. वो केशव को छोड़कर मायके चली जाती है और फिर शुरू होती है केशव की शौचालय बनवाने के लिए घर, परिवार और समाज से लड़ाई. बात जया और केशव के तलाक तक पहुंच जाती है लेकिन शौचालय नहीं बन पाता. यहां केशव डायलॉग भी मारता है, ‘आशिकों ने तो आशिकी के लिए ताजमहल बना दिया, हम एक संडास ना बना सके.’ इसके बाद केशव अपना प्यार बचाने और लोगों की सोच से लड़ने के लिए क्या-क्या करता है यही पूरी कहानी है.

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