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कविता : मेरे अनुज

लाड़,दुलार, मनुहार
और फिर कभी-कभी तकरार
के बीच समय
ठण्ड की गुनगुनी धूप सा
यादों की सुराही में सिमट गया
अब तो समझदारी के ताने-बाने बुनते हुए
कभी उलझते हैं
कभी सुलझ जाते हैं
खुद में ही
एक दूजे के जज्बातों को
एकदम से समझ जाने का
ये जादुई सिलसिला तो
अनवरत रहेगा।

नदियों की भाँति
हम दो बहनों की कल-कल में
जब से तुम्हारा नाद शामिल हुआ
तब ये रिश्ता संगम बन
और भी पावन हो गया।

माता-पिता और बड़ों के
अनुभवों के चाक पर
तुम्हारी सम्वेदनाओं को
जो परिपक्वता मिली
सम्भाल रखना उन्हें
बिखरने से
और बढ़ चलना
लक्ष्य के उत्तुंग शिखर
छूने को।

मेरे अनुज
जन्मोत्सव का ये शुभअवसर
चिर काल तक तुम्हें
आशीष देता रहे॥

गुंजन गुप्ता
गढ़ी मानिकपुर
प्रतापगढ़ उ.प्र

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