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मोदी के हैप्पीनेस इंडेक्स पर हंगर का तमाचा

बाल मुकुन्द ओझा

विश्व खाद्य दिवस भूख के खिलाफ लड़ाई का एक दिन है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की स्थापना के उपलक्ष्य में समूचे विश्व में 16 अक्तूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मूल उद्देश्य विश्व के भूखे और कुपोषित लोगों की दशा के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करना और भूख के अभिशाप से मुक्ति पाना तथा इस समस्या के समाधान के ठोस उपाय करने के लिए सभी संबद्ध व्यक्तियों संस्थाओं को प्रोत्साहित करना है। यह दिन अब रश्मि होता जारहा है। ढोल नगाड़ा पीटने से न गरीबी दूर होगी और न हीं भूखे को खाना मिलेगा। यह हमारी जमीनी सच्चाई है जिसे स्वीकारना ही होगा।
भारत में खाद्यान वितरण प्रणाली में सुधार और मोदी सरकार के जनकल्याण के दावों के बावजूद पिछले साल की तुलना में वर्ष 2017 में वैश्विक भुखमरी सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स- जीएचआई) में भारत तीन पायदान नीचे उतर गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भूख एक गंभीर समस्या है और इस वर्ष 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 100वें पायदान पर आगया है। पिछले वर्ष भारत इस सूचकांक में 97वें स्थान पर था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में भूख से मरने वालों की संख्या घटने की बजाए और तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 25 सालों में भारत के खाना बर्बादी करने के आकड़ों में तो कोई फर्क नहीं पड़ा है। लेकिन कुपोषण की वजह से होने वाले बच्चों की मौत के आकड़ों में मामूली सुधार जरूर देखने को मिला है। नेपाल, पाकिस्तान के अलावा भारत इस मामले में सभी ब्रिक्स देशों में सबसे नीचे स्थान पर है।
दुनियां से जब तक अमीरी और गरीबी की खाई नहीं मिटेगी तब तक भूख के खिलाफ संघर्ष यूँ ही जारी रहेगा। चाहे जितना चेतना और जागरूकता के गीत गालों कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। अब तो यह मानने वालों की तादाद कम नहीं है कि जब तक धरती और आसमान रहेगा तब तक आदमजात अमीरी और गरीबी नामक दो वर्गों में बंटा रहेगा। शोषक और शोषित की परिभाषा समय के साथ बदलती रहेगी मगर भूख और गरीबी का तांडव कायम रहेगा। अमीरी और गरीबी का अंतर कम जरूर होसकता है मगर इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी पड़ेगी। प्रत्येक संपन्न देश और व्यक्ति को संकल्पबद्धता के साथ गरीब की रोजी और रोटी का माकूल प्रबंध करना होगा। बिना इसके खाध दिवस मनाना बेमानी और गरीब के साथ एक क्रूर मजाक होगा।
इस दिवस को मनाते हुए 36 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या आज भी तेजी से बढती जा रही है। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भूखमरी से जूझ रहे हैं। विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता । कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है।
दुनिया में पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थ में से करीब आधा हर साल बिना खाए सड़ जाता है। इण्डियन इन्सटिट्यूट आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल एवं 21 टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के चलते खराब हो जाती है तथा उत्सव, समारोह, शादी-ब्याह आदि में बड़ी मात्रा में पका हुआ खाना ज्यादा बनाकर बर्बाद कर दिया जाता ।
विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है । भूख और कुपोषण की मार सबसे कमजोर पर भारी पड़ती हैं । दुनिया में 60 प्रतिशत महिलाएं भूख का शिकार हैं । गरीब देशों में 10 में से 4 बच्चे अपने शरीर और दिमाग से कुपोषित हैं । दुनिया में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे है और 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय है।
एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है। इसके अलावा करोड़ों बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है क्योंकि उन्हें अपने शुरुआती वर्षों में पूरा पोषण नहीं मिल पाता है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

 

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