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यात्रा-वृतांत : इन दो घटनाओं ने मेरी उबाऊ रेल-यात्रा को सुखद बना दिया

वाराणसी-सियालदाह एक्सप्रेस से यात्रा करना मेरे लिए हमेशा से बोरियत भरा रहा है। दुर्गोत्सव की भीड़ के चलते पसंदीदा ट्रेनों में तत्काल टिकट भी नसीब नहीं हुआ।दरअसल,अच्छी ट्रेनों में तत्काल टिकट शुरुआत के दो मिनटों में ही खत्म होकर वेटिंग लिस्ट में चले जाते हैं।लेकिन,एक यह ट्रेन है,जहां दस मिनट बाद भी आपको कंफर्म तत्काल टिकट मिलने की गारंटी रहती है।वाराणसी-सियालदाह एक्सप्रेस से पहले भी दो बार यात्रा कर चुका हूँ।दोनों बार का सफर बीएचयू में नामांकन प्रक्रिया के समय ही हुआ था।उसके बाद से पिछले तीन वर्षों के दरम्यान इस ट्रेन से सफर के लिए आवश्यक हिम्मत जुटा पाने में मैं पूरी तरह विफल रहा।ऐसा क्या था,जिसके कारण मैं सफर से कतराता रहा?वो दरअसल इसलिए कि इस रेल में सफर वातानुकूलित डब्बे में की जाए या शयनयान में,कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।हां,दोनों ही स्थिति में ढेर सारा थकान और परेशानी उपहार में मिला करते हैं।इस ट्रेन की एक और महत्वपूर्ण खासियत यह है कि अच्छी ट्रेनें जिस दूरी को आठ से दस घंटे में तय करती हैं,उसे यह करीब बीस-बाइस घंटे में पूरा करने की कोशिश करती है।
गत 25 सितंबर को हम (दो और दोस्त) तय समय पर वाराणसी रेल जंक्शन पहुंच गए।प्लेटफाॅर्म संख्या चार पर रेल शांत अवस्था में खड़ी थी और शायद हमारा ही इंतजार कर रही थी,इसलिए हम सीधे अपनी आरक्षित सीट पर जाकर बैठ गए।रेल सुबह 8:40 बजे अपने तय समय पर प्रस्थान कर गई।हम सोच रहे थे कि आगाज समय पर हुआ है,तो मुकाम भी सही समय पर हासिल होगा।लेकिन,इस विश्वास पर तब गहरा झटका लगा जब,कुछ दूरी तय करने के बाद ही एक हाॅल्ट में ट्रेन को आधा घंटा रोककर रखा गया और बारी-बारी से तीन ट्रेनें बगल से इसे चिढ़ाती हुई पार हो गई।सफर के दौरान ऐसे अनेकों मौके आए,जब हमारी ट्रेन ने ‘दयावान’ बनकर,अन्य ट्रेनों को आगे जाने का मौके देती रही।हालात हुबहू वैसे थे,जैसे एक भिखारी दूसरे भिखारी को दान करने की जिद करता है या कहें कि परीक्षा में खुद नकल कर लिख रहा कोई विद्यार्थी किसी दूसरे को नकल कराकर तीस मार खां बनना चाहता है।
करीब डेढ़ घंटे के सफर के पश्चात,हम मुगलसराय जंक्शन पहुंचे।यह वही जंक्शन है,जिसे अब एकात्म मानववाद के जनक दीनदयाल उपाध्याय के नाम से जाना जाएगा।इसकी आधिकारिक घोषणा हो चुकी है,पर नये नामकरण का कोई बोर्ड नजर नहीं आया।हमारे प्रधानमंत्री जिस दिन ‘सौभाग्य योजना’ से बिजली से वंचित चार करोड़ भारतीयों के घरों को रोशन करने का आश्वासन दे रहे थे,उस दिन हम एक लंबे और ऊबाऊ सफर पर निकल पड़े थे।बोर होने ही वाला था कि दो लड़कियां मेरे बर्थ के सामने आकर बैठ गई।तब तक उसके दो युवा शुभचिंतक खिड़की के पास आ गये और उनसे खैरियत से बैठने और खाने के लिए कुछ लाने की बातें करते रहें।इस दौरान लड़कियों का ऊंची आवाज में बातें करना बदस्तुर जारी रहा।मैंने टोकना उचित नहीं समझा।मन ही मन सोचा,हंसों,खूब हंसों…ज्यादा हंसने से जो दांत मुंह से बाहर निकलने की फिराक में हैं,उसमें उसे सफलता मिल जाएगी।यह पहली लड़की की विशेषता थी।दूसरी,अधिक ‘माॅडर्न’ दिखना चाहती थी,पर मेरी नजर में इस कार्य में वह सफल नहीं थी।कुछ लोग ऐसे होते ही हैं,जो खुद को ऐसे पेश करते हैं,जैसे वो बहुत आधुनिक हैं,लेकिन उनकी छोटी-छोटी कुछ आदतें उनके ‘पिछड़े’ होने के सबूत दे देती हैं।खैर,
दूसरी लड़की का झूठा आत्मविश्वास देखकर एक समय मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।बैठे हुए लोगों तथा खिड़की के बाहर ‘पहरा’ दे रहे मित्रों के बीच अपना धौंस जमाने के लिए उसने बड़े आत्मविश्वास से कहा कि उसे उन्नीस नंबर की बर्थ मिली है।इस बात पर हम तीनों दोस्त अंदर ही अंदर मुस्कुरा पड़े।कारण यह था कि जिस उन्नीस नंबर की बर्थ पर वह अपना हक जता रही थी,वह मुझे ही मिली थी।पर,मैं शांत रहा।कुछ बोला नहीं।अगर बोलता तो उसकी प्रतिष्ठा पर दाग लग सकता था।इस विशेषता वाली यह एकमात्र लड़की नहीं है।दरअसल,आजकल लोगों में इस तरह की एक प्रवृत्ति जन्म ली है कि यात्रा के दौरान वे शयनयान की सीट पर अपना झूठा दावा कर पहले से उस सीट पर बैठे किसी व्यक्ति को उठाकर बैठ जाते हैं,फिर आगे आने वाले स्टेशनों में जब उस सीट का असल हकदार आता है,तो फिर ऐसे लोग किसी और को चकमा देने निकल पड़ते हैं।ऐसा करते-करते बिना आरक्षण के वे स्लीपर क्लास में सफर का आनंद भी ले लेते हैं।
वाराणसी से भागलपुर के सफर का आधा पड़ाव पटना में खत्म होता है।पटना पहुंचने का मतलब आधी चिंताएं खत्म हो जाने से होता है।लिहाजा,पटना पहुंचने के लिए हम बेसब्री से इंतजार करने लगे।वेबसाइट बता रहा था कि करीब तीन बजे हम पटना पहुंच जाएंगे।आरा स्टेशन पहुंचने से आधे घंटे पहले मेरी बर्थ के ठीक बगल में एक बुजुर्ग अपनी लाठी के साथ बैठने की जगह न होने के कारण खड़ा ही रह गये।मुझसे यह दृश्य देखा न गया।उस वक्त मैं नीचे की बर्थ पर बैठा था।मैं उठा और उनसे कहा-दादा आप यहां बैठ जाएं।वे बैठ गए।नीचे जगह न होने की वजह से मैं ऊपर की बर्थ पर चला गया और तभी नीचे उतरा जब अगले स्टेशन पर उस बर्थ का एक व्यक्ति उतर गया।वो बुजुर्ग,जो मेरी दादा के उम्र से कुछ कम उम्र के होंगे,शारीरिक रुप से कमजोर प्रतीत हो रहे थे और मटमैला धोती और कुर्ता धारण किये हुए थे।चूंकि,मैं घर जाने पर अपने दादा जी के कष्टों को सामने से देखता और महसूस करता रहा हूं,इसलिए उन वृद्ध से बातकर उनकी स्थिति जानने की जिज्ञासा हुई।मैंने पूछा,कहां जाना है दादा?अपनी भाषा में उन्होंने आरा जाने की बात बताई।मैंने कारण पूछा,तो उन्होंने दवा लाने की बात बताई और यह भी कि एक दिन शौच जाते समय गिरने की वजह से उनके कंधे की हड्डी टूट गई,जिसके दवा के लिए हर माह उन्हें बारह-पंद्रह किलोमीटर का सफर कर दवा लेने जाना पड़ता है।आपका बेटा क्या करता है और कहां है आजकल?पूछने पर बताया कि हिमाचल [प्रदेश] में सुपरवाइजर है और हर माह दस हजार रुपया भेजा करता है।इतना पूछने के बाद मुझे ऐसा लग रहा था कि पता नहीं,दादा कुछ खाए-पीएं हैं कि नहीं?पूछने पर बताया कि सुबह से कुछ नहीं खाया है या ना ही पानी पिया है।ईमानदारी से यह भी बता दिये कि प्यास जोर से लगी है।उस समय मेरे पास पानी की सिर्फ खाली बोतलें थीं।इसलिए उन्हें विश्वास दिलाया कि पानी बेचने वाला आएगा,तो पानी पिलाता हूं।इस पर उन्होंने हामी भरी।कुछ देर बाद मेरे एक मित्र अभिनव ने मुझे मेरे हिस्से के चार बिस्किट खाने को दिये।मैंने ले लिया और चारों बिस्किट बुजुर्ग दादा के हाथों में सौंप दिया।बड़े आराम से दादा ने चारों बिस्किटें खाईं और इस बीच पानी की बोतलें बेचने वाला भी आ गया।मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे।लिहाजा,अभिनव से बीस रुपये उधार लिये और पानी की एक बोतल खरीदी और उसका ढक्कन खोलकर दादा के हाथों में थमा दिया।दादा ने आनाकानी करते हुए कहा कि वे पूरा पानी पी नहीं पाएंगे।मैंने कहा पीजिए,जो बचेगा लेते जाइएगा।दादा ने पानी पीने की शुरुआत की,तो एक लीटर के बोतल का पचहत्तर फीसदी हिस्सा खत्म कर दिया।फिर,चेहरे पर निश्चिंतता व गदगद होने का भाव लेकर अपनी भाषा में कहा,युगों तक जियो।इसके बाद,प्यासे श्रवण कुमार के दशरथ द्वारा तीर मारे जाने का प्रसंग सुनाया।सिर हिलाकर मैंने भी उनके विचारों का समर्थन किया।
आरा स्टेशन पहुंचने से दस मिनट पहले उन्होंने कहा कि अब चलता हूं बेटे।मैंने पूछा,स्टेशन से कितनी दूरी पर है,आपका घर?उतरकर बस से जाना पड़ता है,15 रुपये किराया लगता है,उन्होंने बताया।अब मैंने पूछा,बस में किराया देने के लिए आपके पास कुछ रुपये शेष हैं या नहीं?उन्होंने ईमानदारी से बताया कि एक भी रुपये नहीं हैं।बताया कि केवल दवा के पैसे ही लाए थे।वे सच कह रहे थे।उन्हें देख ही रहा था कि मेरी नजर उनके कुर्ते के जेब पर गई।सच में,उनकी जेब में एक भी रुपये नहीं थे।बात करते-करते अब तक मैं भावुक हो चुका था।सोचने लगा कि जवान बेटे नौकरी के सिलसिले में बाहर तो चले जाते हैं,लेकिन घर में ही छोड़ दिये गए बुजुर्गों को कितनी उपेक्षित जिंदगी व्यतीत करनी पड़ती है।सुबह से इन व्यक्ति ने न तो कुछ खाया और ना ही पानी ही पीया था।सीमित पैसे घर से मिले थे,वो भी दवा में ही खत्म हो गये।आरा स्टेशन पहुंचते ही ट्रेन रुक गई।उन्होंने कहा,अब चलता हूं बेटे।चलिए,नीचे तक छोड़ देता हूं,मैंने कहा।सकुशल उन्हें ट्रेन से नीचे ले गया और मैंने अपने पर्स से कुल एक सौ बीस रुपये निकालकर उनके कुर्ते की जेब में डाल दिया और बता दिया कि इन बीस रुपये से बस का किराया दे दीजिएगा और बाकी सौ रुपये से आप अपनी जरुरत की चीजें खरीद लेना।यह भी ध्यान रखिएगा कि ये पैसे कोई आपको बुड़बक बनाकर ले ना ले।नहीं-नहीं,ऐसे कैसे कोई ले लेगा?उन्होंने बड़े इत्मिनान से कहा।अब उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और मैंने उन्हें विदा कर पुनः अपनी बर्थ पर बैठ गया।मैं बहुत खुश था कि आज अपने दादा-तुल्य किसी व्यक्ति की मदद कर सका।आशा है,उनका आशीर्वाद मुझे आगामी जीवन को सुखमय बनाने में मदद करेंगी।
हमारी यात्रा सत्रह घंटों की बजाय कुल तेइस घंटे की रही।इस दौरान हम थकान से चूर हो चुके थे।रेल से उतरकर मैंने बस पकड़ी और अपने घर पहुंच गया।इसी तरह और भी दोस्त अपने घर चले गये।कुल मिलाकर यह यात्रा झूठे आत्मविश्वास वाली उक्त लड़की के प्रसंग और बुजुर्ग से मुलाकात की वजह से यादगार बन चुकी थी।

धन्यवाद@भारतीय रेल (उबाऊ,किंतु यादगार यात्रा मुहैया कराने के लिए)

सुधीर कुमार

लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्येता हैं

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