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“यादों का काफ़िला”

दिन और साल, बितते चले गए,
उम्रों के पड़ाव भी, छूटते चले गए,
पर तुम्हारी यादों का काफ़िला “दर्शन”,
पल भर के लिए भी, रुक नहीं पाया है।

हमारी आखरी मुलाकात, वो काली रात,
अभी तक भी, भूला नहीं पाया हूँ,
जातेवक्त,जोकहाथातुमने,
उसीकेसहारे, खुदकोचलारहाहूँ।

अंदेशा नहीं था, यूँ किनारा कर जाओगे,
मुर्दों की भीड़ में, मुझे तन्हा कर जाओगे,
“अपना और मिशन का ख्याल रखना”,
यह कहकर, कभी लौट के ना फिर आओगे।

देश प्रेम एकता की, प्रेरणा देते थे तुम सदा,
अपनी शाहदत दी, अपने वतन के लिए आखिर।
“मरने वाले की शान हैं, मारने वाले की नहीं”
जो नारा दिया, उसे करनी में बदला आखिर।

तुम्हारी हर एक याद “दर्शन” बेहद अनमोल हैं,
उन्हें अश्कों से धो, मोती सा चमका के रखा हैं,
“राधा-कृष्ण” सा अमर प्रेम है, “कंत-दर्शन”,
“महरम यादों का काफ़िला”, कभी रुकना पाएगा।

दास दविन्द्र “महरम”
मोहाली(पंजाब)

 

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