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युवाओं को युवाओं के मुद्दों की समझ, फ़िर राजनीति में उनकी हिस्सेदारी सीमित क्यों

मध्य प्रदेश के लगभग 15 ज़िलों के 25 महाविद्यालयों में 162 आदिवासी छात्र प्रतिनिधियों ने जीत का परचम लहराया। जिसमें मीडिया की ख़बरों के मुताबिक पचास फ़ीसद स्थान लड़कियों ने कब्जाया। तो क्या इस जीत को सूबे में नए सवेरे के रूप में देखा जाना चाहिए, या फ़िर बनी बनाई राजनीतिक ढ़र्रे पर होगा वही, ढाक के तीन पात। आज देश ही नहीं मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बढ़ती बेरोजगारी है। जिससे निजात के लिए सूबे की सरकार प्रयासरत तो है, लेकिन शतप्रतिशत सफलता हासिल नहीं पा रहीं है। देश के साथ मध्यप्रदेश की विडंबना भी यहीं है, कि युवाओं के मुद्दे को आवाज़ देने वाला युवाओं का कोई मसीहा उत्पन्न नहीं हो पा रहा। राजनीति के गलियारों में युवाओं को अधिकार दिलवाने की कितनी ही बात हो, लेकिन अमल होता दिखता नहीं। छात्रों के साथ जारी भेदभाव, छात्रावास, शिक्षा की गुणवत्ता और महाविद्यालय में शौचालयों की सुविधा आदि का विषय उठाने वाले इन छात्र नेताओं को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय फ़लक पर भी पहचान दिलानी होगी। तभी इन छात्र चुनावों का मकसद सफ़ल हो पाएगा।

भारत युवाओं का विश्व में सबसे विशाल जनसंख्या वाला देश है। जनगणना इसकी तस्दीक करती हैं। इसलिए अगर देश को विकास की राह पर दूर तलक ले जाना है, तो हमें नौजवान आबादी को इसका इंजन बनाना होगा। देश की गाड़ी उसके हाथों में सौपनी होगी? वर्तमान में लेक़िन ऐसा होता कहीं से नज़र नही आता। फ़िर वह बात चाहें नीति और योजनाओं के क्रियान्वयन स्थल संसद की बात हो, या अन्य क्षेत्रों की, युवाओं का जखीरा वहां तक पहुँच नहीं पा रहा। या उसके लिए वह जगह रिक्त की ही नहीं जा रहीं। बेरोजगार युवाओं की फ़ौज इधर- उधर भटक रही है, फ़िर उनके विचारों में कुंठा और नकारात्मक आना स्वाभाविक है। समाज की बिगड़ती रुपरेखा में कहीं न कहीं जिम्मेदार यह प्रवृत्ति भी है। जिसका पता इस आंकड़े से मिलता है, रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट यह भी है, कि केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति अभी तक नहीं की हैं। एक आंकड़े के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। तो फ़िर क्या विचार करें, जिस युवाओं का ज़िक्र हर क्षण किया जाता है, फ़िर उसके लिए रोजगार मुहैया क्यों नहीं करवाया जा रहा है। कुछ समय पूर्व राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया था, कि केन्द्र सरकार के मियाद से निकलने वाली सरकारी नौकरियों के कुल 4,20,547 पद रिक्त पड़े हैं। समस्या की जड़ किसी एक स्तर पर नहीं है। समस्या जटिलता का रूप धारण करती जा रही है। जिस देश में युवा वोटरों की बड़ी तादाद होने की बात बार-बार कही जाती है, उस देश में युवाओं की तादाद संसद में उतनी ही सिकुड़न महसूस करती है। फ़िर जब नए लोग नीति- निर्माताओं की कुर्सी पर बैठेगे नहीं शायद तब तक युवाओं की पूछ भी नहीं होगी।

लेकिन आज के दौर में जाति, धर्म की राजनीति को देश में चुनाव जीतने की रामबाण औषधि मान लिया गया है। आज देश की बात हो, या मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक शिक्षा का गिरता स्तर, बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और सामाजिक असन्तुलन की स्थिति है। इन सब से निजात का कोई ईलाज हमारे सियासतदानों के पास दिखता नहीं। आज के दौर में मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी तादाद किसी समुदाय की है, तो वह आदिवासी समुदाय की ही है, जो अपने जीवन जीने के अधिकार से वंचित दिखती है। एक सर्वे के मुताबिक देश की वर्तमान चल रही संसद में वंशवादी सांसदों की संख्या में दो प्रतिशत और सरकार में ऐसे मंत्रियों की संख्या में 12 प्रतिशत की कमी आई है। पैट्रिक फ्रेंच ने 2012 में अपनी एक किताब में देश के बारे में लिखा था, यदि वंशवाद की यही राजनीति चलती रही, तो भारत की दशा उन दिनों जैसी हो जाएगी जब यहां राजा महाराजाओं का शासन हुआ करता था।आंकड़े के खेल में इस गतिशील संसद में वंशवाद की राजनीति में कुछ फ़ीसद का सुधार हुआ है। पिछली संसद में 29 फ़ीसद राजनीतिक घरानों से थे, तो इस बार यह आंकड़ा 21 पर रुका है।
यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है, जिस देश की जनसंख्या में लगभग 65 फ़ीसद हिस्सेदारी युवाओं की हो, उस देश में अगर वैसे सांसदों की संख्या अधिक है, जिनकी उम्र 55 साल के ऊपर है, फ़िर युवाओं के साथ इंसाफ़ तो किसी स्तर पर होता दिखता नहीं? सोलहवीं लोकसभा में 543 सांसदों में से 253 सांसद ऐसे हैं, जिनकी उम्र 55 साल से ज़्यादा है। निष्कर्ष रूप में 47 फ़ीसद सांसद 55 की उम्र पार कर चुके हैं। उसके बाद अभी हाल में मध्यप्रदेश में भाजपा ने उम्रदराज नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। फ़िर इसको क्या समझा जाए। क्या युवाओं में राजनीति की समझ नहीं? या फ़िर ये अनपढो की फौज युवाओं के लिए उनसे अच्छी व्यवस्था और नीति बनाने में सफल होती है? 15 वीं लोकसभा में 55 साल से अधिक उम्र के सांसदों की संख्या 43 प्रतिशत थी, यानी यह आंकड़ा जब घटना चाहिए, उस दौर में औऱ बढ़ रहा है। फ़िर इस स्थिति के जिम्मेदार कौन हैं, हमारी समांतर राजनीति ही है, जिसने आपातकाल के बाद से देश की राजनीति में न छात्र राजनीति को उभरने दिया, और न ही किसी नेता को, क्योंकि अपनी झोली को भरने के बाद सत्ता के रण में अपने प्रोडक्ट रूपी भाई-भतीजे वाद को जिंदा जो रखना है। सोलहवीं लोकसभा में आए मात्र 71 सांसदों की उम्र 40 से कम है। फ़िर युवाओं पर नाज किस बात का। आंकड़े के खेल में इस गतिशील संसद में वंशवाद की राजनीति में कुछ फ़ीसद का सुधार तो हुआ है। लेकिन क्या राजनीति ने युवाओं को स्वीकार करना शुरू कर दिया। उससे बड़ी विडंबना की बात यह है, राजनीति के चाणक्य देश की युवा शक्ति पर कितना भी इठला ले, लेकिन आज देश की वहीं लगभग 65 फ़ीसद आबादी अपने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के लिए कहीं न कहीं भटक रही है।

ऐसे में सवाल यह जब देश, विदेशों का अंध अनुसरण संविधान निर्माण करते हुए नहीं चुका। फ़िर देश के युवाओं को राजनीतिक हक दिलवाने के मामले में विदेशों से कुछ सीख क्यों नहीं लेता? क्या राजनीति में आज के दौर में भी युवा कहलाने की प्रवृति 45 वर्ष पहुँचने तक चलती रहेगी? विश्व में राजनीतिक दलों की औसत आयु 43 वर्ष है। लेकिन हमारे देश का युवा तो सड़कों पर डिग्री लेकर घूमने को विवश है। देश में वर्ष 2014 में सिर्फ़ 12 सांसद 30 वर्ष से कम उम्र के लोग संसद तक पहुँचते हैं, फ़िर युवाओं की मानसिकता और उनकी समाजिक समस्याओं से संसद कैसे रूबरू हो सकती है? देश में युवाओं को गुमराह करने की फैक्ट्री तो लगभग हर राजनीतिक दल की चुनावी प्रोपेगैंडा का हिस्से में मिल जाएगी। जो छात्र यूनियन आदि के रूप में अपने स्वार्थ को साधती है, लेकिन उन संगठनों से कितने युवा संसद की चौखट तक पहुँच पाते हैं, इसका उत्तर शायद कोई राजनीतिक दल उपलब्ध करा पाए। फ़िर ऐसे संगठनों का क्या अर्थ। ऐसे में ये तो वह मीठा ज़हर साबित होता है, जिसे युवा खा कर भी पछताता है, और नहीं खाने पर भी। दक्षिण यूरोपीय देश सर्बिया 500 युवाओं का एक राजनीतिक नेता प्रोग्राम चलाता है, जिसके तहत देश में लोकतंत्र के पुनरुद्धार के लिए युवा नेताओं की खोज की जाती है।

फ़िर ऐसी कोई पहल हमारे देश के भीतर क्यों नहीं होती? इक्वाडोर, एल साल्वाडोर, सेनेगल, युगांडा, जैसे छोटे देशों में युवाओं को राजनीति में अवसर उपलब्ध कराने के लिए सभी विधायिकाओं में उम्मीदवारी की उम्र घटाकर 18 वर्ष निर्धारित की गई है, लेकिन हमारे देश में तो 25 से 30 साल की उम्र क्या 40 से 45 की उम्र में भी बडी मुश्किल से जगह मिलती है। बोस्निया जैसे देश में चुनाव में किसी दल को बहुमत न मिलने की दशा में चुनाव कानून की धारा 13.7 के तहत सबसे युवा उम्मीदवार को वह सीट मिल जाती है। लेकिन हमारे देश और प्रांतों में डिग्रियां बिक रही हैं, रोजगार नहीं। युवाओं पर नाज है, लेकिन राजनीति में उनका कोई स्थान नहीं। अब इस रवायत को बंद करना होगा, युवाओं की समस्या युवा नेता अच्छे से समझ सकते हैं, इसलिए युवाओं को राजनीति में मौका मिलना चाहिए। इससे बड़ा सवाल तो यही है, जब छात्र राजनीति राजनीतिक दलों के लिए आपातकाल के बाद कोई बड़ा नेता उपलब्ध करवाने की प्रयोगशाला साबित हो नहीं पा रही, फ़िर छात्र चुनावों का क्या अर्थ और मक़सद रह जाता है, यह देश के राजनीतिक सियासतदारों को सोचना होगा।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लेखन
9457560896

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