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योग प्रशिक्षिका राफिया पर फतवा क्यों ?

कहने को तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। लेकिन, यहां हमेशा धर्म के नाम पर वोट बटोरने, सत्ता हासिल करने और एक तबके को दूसरे तबके के खिलाफ लड़वाकर अपनी दाल गलाने का खेल होता आ रहा है। धर्म के नाम पर इंसान के प्रति इंसान के मन में अलगाव के बीज बोने वाले ये ठेकेदार किसी दानव से कमत्तर नहीं आंके जाने चाहिए। इन्हीं धर्म के ठेकेदारों ने हाल ही में रांची के डोरांडा की रहनी वाली राफिया नाज पर फतवा जारी कर दिया। एम् कॉम की छात्रा राफिया का कसूर इतना था कि उसने योग गुरू बाबा रामदेव के साथ योग का मंच साझा किया था। बस ! यही बात कट्टरपंथियों को रास नहीं आयीं। ओर फतवा जारी करके राफिया पर तरह-तरह के आरोप लगाने शुरू कर दिये। यहां तक कि उसके घर पर पत्थरबाजी भी की गई। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी राफिया को योग का प्रशिक्षण देने को लेकर धमकियां मिल चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर वे कौन लोग है जो योग को एक विशेष धर्म की जागीर समझने की भूल कर रहे है ? वे कौन लोग है जो योग सिखाने वाली राफिया को डरा और धमका रहे है ?

दरअसल, देश में फतवा जारी होना अब कोई नई बात नहीं रह गई है। कहा तो जाता है कि फतवे हमेशा अच्छाई व इंसान की भलाई में ही दिया जाता है। लेकिन, देखने में हमेशा इसका उल्टा ही नजर आता है। असम की गायक नाहिद आफरीन के खिलाफ फतवा, फिल्म में रोल करने पर जायरा वसीम के खिलाफ फतवा, तो योग सिखाने पर राफिया नाज पर फतवा इसका ताजातरीन उदाहरण है। तर्क तो यह भी दिया जाता है कि भारत के मुसलमान शेष दुनिया के मुसलमानों से अलग हैं। लेकिन, जब ऐसी वारदात सामने आती है, तो संशय दूर हो जाता है। ये समझ से परे है कि योग को धार्मिक दृष्टि से क्यों देखा जा रहा है। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि भारत में जहां योग और धर्म लेकर विवाद छिड़ा है, वहीं दूसरी ओर इस्लामिक देश सऊदी अरब में योग को एक खेल के तौर पर आधिकारिक मान्यता मिल गई है। यह हमारे लिये कोई कम गर्व की बात नहीं है। मुस्लिम देश सऊदी अरब की ट्रेड ऐंड इंडस्ट्री मिनिस्ट्री ने स्पोर्ट्स ऐक्टिविटीज के तौर योग सिखाने को आधिकारिक मान्यता दे दी है। सऊदी अरब में अब लाइसेंस लेकर योग सिखाया जा सकेगा। विशेष बात यह है कि नोफ मारवाई नामक एक महिला को सऊदी अरब की पहली योग प्रशिक्षक का दर्जा भी मिल गया है। इसके विपरीत भारत में योग को लेकर एक विशेष धार्मिक समूह के विशेष कहे जाने वाले लोग नवी नवेली दुल्हन की तरह रूठे हुए बैठे है। जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, ताजिकिस्तान और सऊदी अरब जैसे इस्लामिक देशों में योग को सिखाने-सीखने व प्रशिक्षण केंद्र आयोजित करने पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं है तो भारत में योग को लेकर यह बेवजह की आपत्ति क्यों ?

सच तो यह है कि योग को आज पूरी दुनिया अपना चुकी है। भारतीय परम्परा के प्रतीक माने जाने वाले योग पूरी दुनिया में योग बन गया है और 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में योग को वैश्विक तौर पर स्वीकृति मिलने के बाद 21 जून को हर साल विश्व भर में योग दिवस मनाया जाने लगा है। मगर यह दुर्भाग्य की बात है कि अपने जनक देश में ही योग को साम्प्रदायिक बना दिया गया है। किसी और देश में योग को लेकर इतना नाक भौं नहीं सिकोड़ा जा रहा। मगर भारत में योग के साम्प्रदायिक बताकर इसे सीधे-सीधे धर्म से जोड़ दिया गया और राजनीतिक दुकान चलाने वाले भी इसे राजनीति के चश्मे से देखने लगे हैं। खेल, फिल्म, कला, संस्कृति में कभी साम्प्रदायिकता को आड़े नहीं आने दिया गया। मोहम्मद रफ़ी ने जितने भजन गाये हैं और उनके भजन जितने लोकप्रिय हुए शायद ही किसी अन्य गायक को यह सौभाग्य मिला है। आज भी घर-घर में सुबह के समय मोहम्मद रफ़ी के गाये भजन सुने जा सकते हैं। उनके खिलाफ न तो कभी फतवा दिया गया और न ही भजन का आनंद उठाने वालों ने गायक के धर्म के बारे में पूछा, न जानना चाहा। यह कीड़ा हाल के दिनों में दिमाग में भर दिया गया है। इसके कई कारण भी हैं। देश की राजनीति ने जब से दो धार पकड़ी है, भारत में इस तरह के बेवजह मामले उछाले जाने लगे हैं और मूल समस्या की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। क्रिया-प्रतिक्रिया दोनों ही चरम पर है। और इससे समाज को बहुत हद नुकसान हो रहा है। मामूली बात को अब साम्प्रदायिक चश्मे से देखा जाने लगा है। कहने को तो हम अनेकता में एकता वाले देश के वासी हैं, मगर हकीकत में हमारी एकता दरक गयी है। ऐसी ताकते सक्रिय हैं जो देश को कमजोर करने में तुली हुई हैं। ऐसी विघटनकारी शक्तियों से सचेत रहने की जरूरत है।

पुलिस प्रशासन को भी ऐसे लोगों को चिन्हित किया जाना चाहिए। जैसा माहौल बनता जा रहा है वह शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। बात राफिया नाज की ही नही है, बल्कि इस सोच की है जो इस युग में भी बदलाव को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं। अपनी दुकान चलाने के लिये जो ताकते समाज को कमजोर करती हैं, चाहे वह जो भी हो, उन्हें हतोत्साहित करने की जरूरत है।

देवेंद्रराज सुथार
लेखक स्वतंत्र पत्रकार है
संपर्क – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025

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