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राजनीति के बिगड़ते बोल और स्तर का जिम्मेदार कौन

लोकतंत्र की छांव में फ़िर चुनावी धुन बज चुकी है। इस चुनावी फ़ेरी में अंतर है, तो वह राज्य का। इस बार राज्य है सरदार पटेल की भूमि। जिन्होंने देश की रियासतों को एकजुट करके एक विशाल देश का आकार दिया। क्या आज के दौर में उनके विचार किसी राजनीतिक दल का हिस्सा है, कह पाना शायद टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। आज देश के राजनीतिक पटल की गहराईयों में जाकर हकीकत को नापे, तो पता चलेगा, क्षेत्रवादी राजनीति ने एक सशक्त राष्ट्र की परिकल्पना को खूंटी पर टांगने की कोई कोर-कसर छोड़ी नहीं है। छोटे राज्य विकास का आधार होते हैं, कि परिपाटी को सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश को कब से बाँटने की साजिश हो रही है। यह सब दुष्चक्र राजनीतिक लाभ के लिए समय-समय पर रचा और बुना जाता है। ये सब तथ्य लोकतंत्र को कमजोर करते हैं, लेकिन आज बात इस विषय पर नही होगी। बात राजनीति के गिरते स्तर, उसकी शुचिता और लोकतंत्र की मूल भावना पर होगी। गुजरात की फिजाओं में राजनीतिक सरगर्मियां जैसे जैसे बढ़ रही हैं, राजनीति अपना धैर्य और नैतिकता खोती जा रही है।

यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी वर्तमान दौर की विडंबना है, कि चुनाव के शुरुआती दिनों के मुद्दे समाज सरोकार से समीपता लिए दिखते हैं, फ़िर राजनीति अपने पुरातन परम्परा की अनुगामी बनती चली जाती है। आख़िर इस परिपाटी से निजात कब मिलेगी? देश के किसी भूभाग पर चुनाव हो, बातें सिर्फ़ शहजादे और युवराज जैसे जुमलों पर टिक जाती है। राजनीति में किए गए कुकर्मों के गड़े मुर्दे उखाड़कर राजनीति की रोटी प्रत्येक दल सेंकने लगते हैं। फ़िर सवाल बहुतेरे क्या इन भ्रष्टाचार आदि के जिन्न को जगाने से राजनीति और देश का आजतक कोई भला हुआ? जब नहीं फ़िर वर्तमान समय की समस्याएं इन बेफजूल के मुद्दों के सामने दबा क्यों दी जाती हैं? क्या भ्रष्टाचार के घोटालों पर आज़तक किसी नेता को ऐसी सजा हो सकी, जो उदाहरण के रूप में प्रस्तुत की जा सके। फ़िर बेजा की राजनीति क्यों? बीती बात को तूल देने से जनता को क्या मिलने वाला? ऐसे में क्या कभी राजनीति में नैतिक मूल्यों पर भी चर्चा होगी? यह सोचा जाए, या फ़िर राजनीति की चौखट पर मताधिकार का प्रयोग करने का आधार सिर्फ और सिर्फ साम्प्रदायिकता और जातिवाद ही रह जाएंगे?

आज गुजरात के विकासवादी मॉडल के गुणगान चाहे चांद तक हो जाए, लेकिन राजनीति की शुचिता, नैतिकता और लोकतंत्र की जनभावना कहीं छिटक सी गई है। गुजरात के राजनीतिक गलियारों में भी हो वही रहा, जिसकी काली साया पूरे देश की राजनीति पर लोकतंत्र के जिंदा होने के वक़्त से मंडरा रही है। गुजरात की राजनीति भी जाति-पाती, धर्म आदि में उलझी दिख रही है। उसके साथ हार्दिक पटेल की अश्लील सीडी का चुनाव के ऐन पहले आना सूचित करता है, कि देश की मैली हो चुकी राजनीति अब सडांध हो चुकी है। जिसमें स्वच्छ विचारों और जनसरोकार का विषय लुप्तप्राय हो चला है। ऐसे में लगता यही है, कि विकास यात्रा से शुरू हुई बहस अब जातिवाद के दरवाजे से होते हुए चरित्र हनन और धीरे-धीरे सम्प्रदायिक होती जा रही है। फ़िर सवाल तो यही जब गुजरात विकास के उड़न खटोले पर सवार है, फ़िर वहां की राजनीति इतनी मैली क्यों होती जा रहीं है? क्या गुजरात से स्वच्छ राजनीतिक विचारों का द्वार नहीं खोला जा सकता है? जो देश की राजनीति को नई दिशा और दशा दे सके। सवाल यह भी क्या चरित्र हनन और जातिवाद की धुरी ही चुनाव जीतने का पहला मंत्र रह गया है? देश के बदजुबान नेताओं के न नाम बताने की जरूरत शायद आज के दौर में है, न ही जाति, धर्म की राजनीति करने वालों की, क्योंकि राजनीति में शायद कोई दूध का धुला है नहीं, आज के दौर में । आज की राजनीति की दशा ठीक वैसी ही है, जैसे कहावत है नौ सौ चूहा खाकर बिल्ली हज को चली। सभी एक रंग के रंगे सियार लगते हैं। अब बात गुजरात चुनाव में बढ़ती राजनीतिक बदजुबानी और गिरते नैतिक स्तर की।

आख़िर गुजरात में अश्लीलता की सीडी ऐन चुनाव के पहले क्यों? जब विकास बोलता है, फ़िर आरोप-प्रत्यारोप और मंदिर की दौड़ क्यों? इसको किस नजरिए से देखा जाए, शायद लोकतंत्र में राजनीतिक दलों ने अपने उचित कर्तव्यों से पल्ला झाड़ रखा। तभी इन बातों पर जोर देना पड़ रहा है। मंदिर-मस्जिद जाने पर रोक नहीं, लेकिन ये सब चुनाव के ऐन वक्त पहले ही क्यों दिखता है, बड़ा सवाल यही है। चरित्र हनन और गिरते राजनीतिक स्तर पर सभी दल मौन है, जो लोकतंत्र को शर्मिंदा कर रहा है। इस बिगड़ते राजनीतिक शैली में सुधार करना होगा, लोकतंत्र की मजबूती के लिए, जनतंत्र को सशक्त बनाने के लिए, युवाओं को उनका हक दिलाने के लिए, संविधान की मजबूती के लिए, अवसर की समानता के लिए। क्या कोई दल इस बीड़े को उठाने की ताक़त रखता है, आज के दौर में शायद यह प्रश्न उत्तररहित है, लेकिन महापुरुषों के विचारों की दुकान चलाने वाले राजनीतिक दलों को इस पर ध्यान केंद्रित करना होगा। किसी महान नेता ने कहा था, जिंदा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं कर सकती। फ़िर सत्तर सालों से जाति, धर्म और सम्प्रदाय की राजनीति की मुख़ालफ़त क्यों नहीं क्यों कर पा रहा। यह भी बड़ा लाख टके का सवाल है। अब जनता को ही इन परिपाटियों को तोड़ना होगा। तब शायद लोकतंत्र में स्वच्छ विचार की राजनीति पुनः आश्रय पा सके।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लेखन
9457560896

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