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रावण दहन के समय धनुषवाण टूटना प्रधानमंत्री के लिए 2019 का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के लालकिला मैदान में दशहरा पर्व पर रावण के पुतले का दहन करने के लिए जैसे ही धनुष की प्रत्यंचा पर तीर रखकर चलाने की कोशिश की तो धनुष टूट गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्कराते हुए तुरंत तीर का भाले के रूप में प्रयोग किया और उसे रावण के पुतले की तरफ फेंक दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले पहुंचने से पहले ही दशहरा के रावण का पुतला गिर गया था. लालकिला की यह रामलीला तथा रावण दहन देश-विदेश में मशहूर है. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्री की मौजूदगी से पूर्व आयोजक और सुरक्षा एजेंसियां सघन जांच करती हैं. इसमें गलती या लापरवाही की गुंजाइश नहीं है. ऐसे में इन दोनों घटनाओं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अशुभ संकेत माना जा रहा है.
दिनोंदिन खराब होती अर्थव्यस्था की सही हालत बयान करने के लिए कई आंकड़े इन दिनों हमारे सामने आ चुके हैं. जीडीपी की रफ्तार इस वित्त वर्ष में घटकर 5.7 फीसदी रह गई है और ऐसा केवल मोदी सरकार बनने के बाद गणना की फार्मूला बदलने के कारण हुआ है जो मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में सबसे निचले स्तर पर है. यह आंकड़ा भी मापने के तरीके को बदलने की वजह से है जबकि पुराने फार्मूले के हिसाब से वास्तविक दर 3 प्रतिशत के आसपास पहुँच चुकी है. हाल ही में एक बड़े सरकारी बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था में नजर आ रही ये सुस्ती तकनीकी नहीं बल्कि वास्तविक है. असल में बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह इस सुस्ती को तकनीकी बता रहे थे. ब्लूमबर्ग द्वारा जारी टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में रोजगार की दर 12 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले दिनों में स्थिति और खराब होगी.रिपोर्ट में संभावना जताई गई है कि पिछले साल की तुलना में भारत के निर्माण क्षेत्र के रोजगार में 30-40 प्रतिशत की कमी आएगी.
सबसे चिंता की बात यह है कि इनमें पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद ही सबसे ज्यादा है. बेरोजगारों में 25 फीसदी 20 से 24 आयुवर्ग के हैं, जबकि 25 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद 19 फीसदी है. 20 साल से ज्यादा उम्र के 15.30 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है. विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ता बेरोजगारी का यह आंकड़ा सरकार के लिए गहरी चिंता का विषय है. वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार महिला बेरोजगारी भी लगातार बढ़ी है. बेरोजगारों में 10वीं या 12वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद 20 फीसदी है. यह तादाद लगभग 4 करोड़ है. तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले 22 फीसदी युवा बेरोजागारों की कतार में हैं. नोटबंदी ने कालेधन और आतंकवाद को कितना प्रभावित किया यह तो फिलहाल पता नहीं चल पाया है परंतु सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी के कारण भारत में 15 लाख लोग बेरोजगार हुए हैं एवं 60 लाख लोग दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो गए हैं. सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के सर्वे के मुताबिक, एक कमाऊ व्यक्ति पर घर के चार लोग आश्रित हैं, तो इस लिहाज से पीएम नरेंद्र मोदी के एक फैसले ने 60 लाख से ज्यादा लोगों के मुंह से निवाला छिन गया है. भारतीय जनता पार्टी के अपने संगठन भारतीय मजदूर संघ ने बयान जारी कर कहा था कि नोटबंदी से 20 लाख नौकरियाँ गई हैं. खुद जून माह में श्रम मंत्री द्वारा जारी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि भारत में बेरोजगारी के दर लगातार बढ़ रही है और रोजगार घट रहे हैं. पिछले सालों के मुकाबले रोजगार की दर 40 प्रतिशत से ज्यादा कम हुई है और ऊपर से पैट्रोल और डीजल पर मंहगाई के अलावा शिक्षा और स्वच्छता उपकर के नाम पर कर की वसूली की जा रही है और स्थायी रोजगार लगातार कम हो रहे हैं. एक अनुमान के अनुसार अगले एक-दो वर्षों में आई. टी. क्षेत्र में 8-10 लाख नौकरियां कम हो जायेगी.
अक्सर देखने में आता है कि पढ़े-लिखे युवा छोटी-मोटी नौकरियां करने की बजाय बेहतर मौके की तलाश करते रहते हैं. बेरोजगार युवाओं में लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो साल में छह महीने या उससे कम कोई छोटा-मोटा काम करते हैं. लेकिन उन्हें स्थायी नौकरी की तलाश है. कुल बेरोजगारों में ऐसे लोगों की तादाद लगभग 37 फीसदी यानि 2.10 करोड़ है. वर्ष 2001 से 2011 के दौरान 15 से 24 वर्ष के युवाओं की आबादी में दोगुनी से ज्यादा वृद्धि हुई है और उनमें बेरोजगारी की दर 17.6 फीसदी से बढ़ कर 20 फीसदी तक पहुंच गई है. वर्ष 2001 में जहां 3.35 करोड़ युवा बेरोजगार थे वहीं 2011 में यह तादाद 4.69 करोड़ पहुंच गई और अब यह तादाद लगभग 7 करोड़ के आसपास होने का अनुमान है. वर्ष 2001 में युवाओं की आबादी एक करोड़ थी जो 2011 में 2.32 करोड़ हो गई यानि इसमें दोगुना से ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई. इसके मुकाबले इस दौरान देश में कुल आबादी में 17.71 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई. इन आंकड़ों से साफ है कि युवाओं की तादाद जहां तेजी से बढ़ रही है वहीं उस अनुपात में नौकरियां बढ़ने का अपेक्षा घट रही हैं और मोदी सरकार बेरोजगारी के मुद्दे पर आँखें मूंदे बैठी है. लचर श्रम कानूनों का लाभ उठाकर बड़ी कम्पनियों को पहले छंटनी की छूट दी गई और अब यह शगूफा छोड़ा जा रहा है कि जो कम्पनियां पक्का रोजगार उपलब्ध करायेंगी, उन्हें टैक्स छूट के साथ नियोक्ताओं द्वारा भरा जाने वाला अंशदान सरकार करेगी लेकिन श्रम मंत्रालय ने श्रम सितारों पर जो नया ड्राफ्ट तैयार किया है, उससे कर्मचारियों का वेतन और कम हो जायेगा. अभी पांच साल पूरा करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने का प्रावधान है और यह नियोक्ता की जिम्मेदारी है लेकिन अब इसके लिए फंड बनाने की बात कही गई है और उसमें कर्मचारी के वेतन के कुछ भाग हर माह जमा कराना अनिवार्य होगा लेकिन उसे सीटीसी (कॉस्ट टू कम्पनी) बनाने की सहमति दी है, जिससे ग्रेच्युटी पर दिया जाने वाला अंशदान भी नियोक्ता कर्मचारियों को वेतन से काटेंगे. प्रोविडेंट फंड का भी यही प्रावधान है लेकिन अब ज्यादातर कम्पनियां सीटीसी के नाम पर नियोक्ता द्वारा भरा जाने वाला अंशदान भी कर्मचारियों को वेतन से काटकर जमा कराती हैं. हालांकि आधिकारिक रूप से सेलरी स्लिप और चालान में ऐसा न तो दिखाया जाता है और न ही कानूनन ऐसा किया जा सकता है लेकिन यह सब उदारीकरण के नाम पर हो रहा है. कर्मचारी वर्ग मोदी सरकार से आहत है और कर्मचारी यूनियनों मे संगठित होकर अगले माह देशभर में तीन दिवसीय काम रोको आंदोलन का ऐलान कर दिया है.
बढ़ती बेरोजगारी और मंहगाई किसी से छिपी नहीं है. इसके बावजूद सरकार पैट्रोल और डीजल पर बढ़ाई गई एक्साइज डयूटी घटाने को तैयार नहीं है. उल्टा नौकरशाह से सरकार में नए-नए मंत्री अल्फोंस ने जनता को धमकाने वाले अंदाज में समझाया है कि यदि मोटरसाइकिल, कार, ट्रैक्टर और ट्रक चलाना है तो टैक्स भरना पड़ेगा. वित्तमंत्री अरूण जेटली ने भी व्यापारियों को इसी अंदाज में समझाया कि विकास के लिए पैसा चाहिए, इसलिए टैक्स भरना पड़ेगा. नोटबंदी और जीएसटी के कारण 35 प्रतिशत लघु और मझोले कारोबारियों का व्यापार प्रभावित हुआ है. अब तो मोदी सरकार के समर्थक एवं आर्थिक विशेषज्ञ भी यह मानने लगे हैं कि नोटबंदी और जीएसटी के खराब प्रबंधन के कारण व्यापार और रोजगार प्रभावित हो रहा है. भाजपा सरकार के पूर्व वित्त मंत्री अरूण शौरी के बाद संघ के थिंकटेंक माने जाने वाले गुरूमूर्ति और अब वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की खरी-खरी सरकार की नींद हराम कर रही है. खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरा के मौके पर सरकार को नसीहत देते हुए जनता के मुद्दों पर गौर करने की सलाह दी है. विपक्ष तो लगातार कहता आया है लेकिन कमजोर विपक्ष की आवाज दबकर रह गई लेकिन अब जब भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के दिग्गज सवाल उठा रहे हैं तो सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए. लेकिन ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अरूण जेटली से अधिक विश्वसनीय सहयोगी नहीं मिल रहा है जिसपर विश्वास कर वह उसे वित्त मंत्री बना सकें. माननीय अरूण जेटली अच्छे वकील हो सकते हैं लेकिन वह अच्छे वित्त मंत्री साबित नहीं हुए हैं और आज बेरोजगारी, मंहगाई, टैक्स बढ़ोतरी, उपकर इन्हीं की नीतियों के कारण बढ़ी है. अगर यही हालत रही तो निश्चित रूप से सरकार की साख खराब होगी और कमजोर विपक्ष के बावजूद 2019 में भाजपा के सत्ता का सपना टूट सकता है. जनता में नाराजगी है लेकिन भाजपा भ्रम में है और भ्रम में 2004 में भी थी और सभी अखबारों और चैनलों के सर्वे भाजपा की सरकार बना रहे थे लेकिन भाजपा के 10 वर्षों तक सत्ता पाने को लिए इंतजार करना पड़ा था.

विजय शर्मा
डब्ल्यू जेड430 ए, नानकपुरा, हरि नगर, दिल्ली-64

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