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रैली से विपक्षी एकता को नहीं, लालू को फायदा, वह भी आंशिक

चारा घोटाले में सजायाफ्ता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की भाजपा भगाओ देश बचाओ रैली अपने मंसूबों में आंशिक ही सफलता हासिल कर पाई। राजद मुखिया इस बात को लेकर खुश हो सकते हैं कि बेनामी संपत्ति में पूरे परिवार के उलझे रहने के बावजूद इस रैली में लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी और उनके दोनों बेटों को उनके समर्थक वर्ग ने अपना नेता मान लिया। लेकिन पीएम मोदी के खिलाफ विपक्षी एकता की जिस मंशा से उन्होंने इस रैली का आयोजन किया था वह उद्देश्य सफल नहीं हो पाया। रैली के ऐन पहले बसपा मुखिया मायावती ने इस रैली में शामिल होने से इनकार कर विपक्षी एकता की हवा निकाल दी। वहीं, कांग्रेस ने भी सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को भेजकर खानापूर्ति की। न तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इसमें शामिल हुई और न ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी।
विपक्ष के इन बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी से लालू की यह रैली पारिवारिक शो से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो पाई। रैली इस लिहाज से सफल मानी जाएगी कि लालू प्रसाद यादव भाजपा भगाओ, देश बचाओ रैली के मंच से राजद नेताओं को यह संदेश देने में जरूर सफल रहे कि पार्टी के किसी भी मंच पर चाहे वह रघुवंश प्रसाद सिंह हों या अब्दुल बारी सिद्दीकी, उनकी कुर्सियां तेज प्रताप यादव व तेजस्वी यादव के पीछे वाली कतार में ही लगेगी। हां, जिस मुस्लिम यादव गठजोड़ के सहारे लालू अब तक राजनीतिक किला फतह करते रहे हैं वह आज भी उनके साथ खड़ा है। उनके खुश होने की यह दूसरी वजह हो सकती है।
दरअसल, विपक्षी एकता की आड़ लेकर राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव बेनामी संपत्ति मामले में फंसे अपने बेटे तेजस्वी यादव, पत्नी राबड़ी देवी व बेटियों मीसा भारती तथा चंदा यादव आदि को सुरक्षा घेरा प्रदान करना चाहते थे। लेकिन विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं ने लालू को इस मामले में बंदूक रखने के लिए अपना कंधा देने से कन्नी काट ली। रैली तो थी भाजपा भगाओ के नाम पर मगर रैली में शामिल सभी वक्ताओं का निशाना बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रहे। इस रैली के माध्यम से पूरा लालू कुनबा खुद को छले जाने की कथा का बखान करने की मुद्रा में दिखाई दिया। हालांकि कौन किसको छल रहा था, बिहार की जनता यह बखूबी जानती समझती है।
बहरहाल, लालू की रैली की असफलता इसी से मानी जा सकती है कि इसके जरिए जिस विपक्षी एकता के सपने बुने गये थे वह रैली से पहले ही बिखरने शुरू हो गये थे। सोनिया, राहुल, मायावती, शरद पवार आदि विपक्ष के कद्दावर नेताओं की गैर मौजूदगी ने विपक्षी एकता की हवा निकाल दी। ऐसे में अब आधे अधूरे विपक्ष के जरिए लालू प्रसाद यादव इस लड़ाई को कितना आगे ले जा पाएंगे सबसे बड़ा सवाल यही है। हां, एक बात तय है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे लालू कुनबे के लिए आने वाला वक्त बेहद कठिनाइयों भरा रहने वाला है।
नीतीश से पुराना हिसाब चुकता करने के लिए शरद यादव के साथ मोदी व भाजपा विरोध के ईर्दगिर्द अपनी राजनीति सिमटा चुकी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व अभी हाल ही में भाजपा के हाथों करारी हार पाकर यूपी की सत्ता से बेदखल हुए अखिलेश यादव जरूर इस रैली में शामिल हुए। न केवल शामिल हुए बल्कि लालू के सुर में सुर मिलाते हुए मंच से नीतीश व पीएम मोदी के खिलाफ अपनी भड़ास भी निकाली। जहां तक ममता बनर्जी की राजनीति की बात है तो यह मुस्लिम तुष्टीकरण की सारी सीमाएं लांघ रहा है।
अपने तीखे तेवरों की वजह से अग्निकन्या का खिताब हासिल करने वाली ममता बनर्जी अपनी नई छवि केवल एक समुदाय विशेष की मुख्यमंत्री के रूप में गढ़ चुकीं हैं। उनके हाल के कुछ फैसले इस बात की तस्दीक करते प्रतीत होते हैं। तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को विरोध करने के लिए भाजपा और नरेन्द्र मोदी के अलावा कोई और दिखता ही नहीं है। कुछ इसी डगर पर शरद यादव भी चल चुके हैं। लोकतंत्र लोकलाज से चलता है की दलील देकर दो दशक पहले हवाला डायरी में नाम आने भर से संसद की सदस्यता छोड़ देने वाले शरद यादव आज महज नीतीश कुमार से अपनी व्यक्तिगत खुन्नस से उपजे खीझ की वजह से लालू कुनबे के भ्रष्टाचार के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। वहीं, अखिलेश यादव के सामने सियासत में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए दूसरा कोई रास्ता ही नहीं बचा है। ऐसे में आधे अधुरे विपक्ष के सहारे भाजपा भगाओ देश बचाओ का लालू का सपना साकार हो पाएगा या दिवास्वप्न साबित होगा यह तो वक्त ही बताएगा।

बद्रीनाथ वर्मा

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