National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

विकसित युवा, विकसित भारत के पांच लाइन पर देश को बढ़ना होगा

युवाओं की भागीदारी जीवन में तीन पड़ाव अहम होते हैं। बचपन, जवानी और बुढापा। देश की वर्तमान स्थिति में परेशानी तीनों को है। बचपन देश में सुरक्षित नहीं, तो नौजवान बेरोजगारी के दर्द से पीड़ित , और बुढापा अपनों के द्वारा उत्पीड़ित है। यह देश की कैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है। जिस परिवेश में सवाल तो बहुतेरे हैं, लेकिन उत्तर देने वाला कोई नहीं। समाज अपनी नैतिकी और सामाजिकता का पाठ भूल चुका है। चहुँओर असामाजिकता की गिद्ध दृष्टि नज़र आ रही है। भूख समाज पर ऐसी हावी है, कि अपनापन और नाते- रिश्तों की कोई अहमियत शेष दिखती नहीं। ज़िक्र भूख का हुआ, तो ये भूख खाने की नहीं। आज के दौर में समाज को जिस भूख की पड़ी है, वह थोड़ा अलग है। आज का समाज हवस के भूख से पीड़ित हो चला है। समाज के मनुष्य को पैसे की भूख बढ़ गई है। जिससे वह सामाजिकता को ताक पर रखकर अपनी हवस और भूख को शांत करने में लगा है। इस भूख ने उसे अंधा बना दिया है, अच्छा- बुरा दिखना भी बंद हो जाता है। देश में ऐसा भी नहीं कि उसने अपनी सम्पूर्ण जड़ को ही त्याग दिया हो। मानवता अभी भी जीवित है, लेकिन आज हम बात केवल युवाओं के बारे में करेंगे। युवाओं का देश, जिसपर अभिमान और गर्व करते हुए देश थकता नहीं है। क्या है, स्थिति आज उस युवा की देश के भविष्य की है? भारत युवाओं का विश्व में सबसे विशाल जनसंख्या वाला देश है। जनगणना इसकी तस्दीक करती हैं। इसलिए अगर देश को विकास की राह पर दूर तलक ले जाना है, तो हमें नौजवान आबादी को इसका इंजन बनाना होगा। देश की गाड़ी उसके हाथों में सौपनी होगी?

वर्तमान में लेक़िन ऐसा होता कहीं से नज़र नही आता। फ़िर वह बात चाहें नीति और योजनाओं के क्रियान्वयन स्थल संसद की बात हो, या अन्य क्षेत्रों की, युवाओं का जखीरा वहां तक पहुँच नहीं पा रहा। या उसके लिए वह जगह रिक्त की ही नहीं जा रहीं। बेरोजगार युवाओं की फ़ौज इधर- उधर भटक रही है, फ़िर उनके विचारों में कुंठा और नकारात्मक आना स्वाभाविक है। समाज की बिगड़ती रुपरेखा में कहीं न कहीं जिम्मेदार यह प्रवृत्ति भी है। आज के वक़्त में सरकारें डिजिटल इंडिया के चकाचौंध में भी रोजगार की रोशनी उत्पन्न नहीं करवा पा रहीं हैं। जिसका पता इस आंकड़े से मिलता है, रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट यह भी है, कि केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति अभी तक नहीं की हैं। एक आंकड़े के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। तो फ़िर क्या विचार करें, जिस युवाओं का ज़िक्र हर क्षण किया जाता है, फ़िर उसके लिए रोजगार मुहैया क्यों नहीं करवाया जा रहा है। कुछ समय पूर्व राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया था, कि केन्द्र सरकार के मियाद से निकलने वाली सरकारी नौकरियों के कुल 4,20,547 पद रिक्त पड़े हैं। समस्या की जड़ किसी एक स्तर पर नहीं है। समस्या जटिलता का रूप धारण करती जा रही है। जिस देश में युवा वोटरों की बड़ी तादाद होने की बात बार-बार कही जाती है, उस देश में युवाओं की तादाद संसद में उतनी ही सिकुड़न महसूस करती है। फ़िर जब नए लोग नीति- निर्माताओं की कुर्सी पर बैठेगे नहीं शायद तब तक युवाओं की पूछ भी नहीं होगी।

यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है, जिस देश की जनसंख्या में लगभग 65 फ़ीसद हिस्सेदारी युवाओं की हो, उस देश में अगर वैसे सांसदों की संख्या अधिक है, जिनकी उम्र 55 साल के ऊपर है, फ़िर युवाओं के साथ इंसाफ़ तो किसी स्तर पर होता दिखता नहीं? सोलहवीं लोकसभा में 543 सांसदों में से 253 सांसद ऐसे हैं, जिनकी उम्र 55 साल से ज़्यादा है। निष्कर्ष रूप में 47 फ़ीसद सांसद 55 की उम्र पार कर चुके हैं। उसके बाद अभी हाल में मध्यप्रदेश में भाजपा ने उम्रदराज नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। फ़िर इसको क्या समझा जाए। क्या युवाओं में राजनीति की समझ नहीं? या फ़िर ये अनपढो की फौज युवाओं के लिए उनसे अच्छी व्यवस्था और नीति बनाने में सफल होती है? 15 वीं लोकसभा में 55 साल से अधिक उम्र के सांसदों की संख्या 43 प्रतिशत थी, यानी यह आंकड़ा जब घटना चाहिए, उस दौर में औऱ बढ़ रहा है। फ़िर इस स्थिति के जिम्मेदार कौन हैं, हमारी समांतर राजनीति ही है, जिसने आपातकाल के बाद से देश की राजनीति में न छात्र राजनीति को उभरने दिया, और न ही किसी नेता को, क्योंकि अपनी झोली को भरने के बाद सत्ता के रण में अपने प्रोडक्ट रूपी भाई-भतीजे वाद को जिंदा जो रखना है। सोलहवीं लोकसभा में आए मात्र 71 सांसदों की उम्र 40 से कम है। फ़िर युवाओं पर नाज किस बात का।

देश में रोजगार के कम होते अवसरों पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट भी परेशान करने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार जीडीपी विकास दर के अनुपात में रोजगार दर 1991 से 2007 तक 0.3 फीसदी रहा, लेकिन 2007 के बाद इसमें गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक औसतन एक फीसदी आर्थिक विकास दर से 0.3 फीसदी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, लेकिन यह संख्या घटकर 0.15 फीसदी हो गया है। ऐसे में निवेश बढ़ने के बावजूद रोजगार के अवसर नहीं बढ़ पा रहे हैं, जबकि भारत में रोजाना लाखों लोग श्रम बाजार में शामिल हो रहे हैं। इसके साथ विश्व की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है । रोजगार ना पाने के हालात ये है , कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट देश मे नौकरी लायक नही है । फ़िर देश किस चौराहे पर खड़ा है, यह कोई समझाने की बात नहीं है। आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र सहमे हुए हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेत स्पष्ट है, कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे हैं, जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है । और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई तंत्र अगर हमारे रहनुमाई व्यवस्था में नहीं, फ़िर मात्र युवाओं के नाम लेने भर से देश की बदरंग स्थिति में उजाला नहीं आ सकता। युवा तभी अपनी भूमिका अदा कर सकता है, जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो। इसलिए सरकार हर युवा को रोजगार देने को लेकर गंभीरता दिखाए। न की राजनीति के लिए युवाओं का मात्र राजनीतिक प्रयोग पर जोर दे। आज के वक़्त की नजाकत कहती है, कि मात्र युवाओं का देश होने मात्र से देश की स्थिति और रूपरेखा नहीं बदलने वाली। जरूरत है, तो युवाओं को रोजगार दिलाने की। जिसके लिए एक नई पंच लाइन हमारी राजनीतिक व्यवस्था को जन्म देना होगा, विकसित युवा, विकसित भारत, इसके साथ इसके मूल को अमल में भी लाना होगा, तभी देश के युवाओं की तक़दीर और तस्वीर में परिवर्तन दिख सकता है।

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar