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विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए केन्द्र सरकार को बनानी होगी ठोस व कारगर योजना

उच्चतम न्यायालय ने विधवाओं की दुर्दशा पर चिंता प्रकट करते हुए केन्द्र सरकार से कहा है कि वह विधवाओं के पुनर्विवाह को बढ़ावा देने की योजना बनाए ताकि विधवाओं को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके. न्यायामूर्ति मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की खंड पीठ ने यह भी कहा कि यद्यपि सरकार ने पिछले दस वर्षों के दौरान विधवाओं के कल्याण की कई योजनाएं बनाई है लेकिन उन योजनाओं के बावजूद कुछ विधवाएं अत्यंत कष्टकारी का जीवन व्यतीत कर रही हैं. कुछ मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए पीठ ने कहाकि विधवाओं को परिवार के लोग वृंदावन जैसी जगहों में छोड़ देते है और वहां के आश्रमों में उनकी स्थिति दयनीय बनी हुई है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार जागी है और वृंदावन की विधवाओं को अब 1300 रूपए प्रतिमाह पेंशन दी जा रही है. सरकार की राष्ट्रीय नीति के बारे में कटाक्ष करते हुए कोर्ट ने कहा है कि महिला सशक्तिकरण पर 2001 में राष्ट्रीय नीति बनाई गई है जिसे 16 वर्ष हो चुके हैं और अब इसमें व्यापक बदलाव की जरूरत है. कोर्ट ने छोटी आयु की विधवाओं के पुनर्वास के बारे में स्पष्ट निर्देश दिया है कि सामाजिक कुरीतियों की समाप्ति के लिए विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. दरअसल सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसने विधवाओं के पुनर्वास एवं उपलब्ध योजनाओं के अध्ययन के लिए एक कमेटी का गठन किया है जिसमें एनजीओ जागोरी से सुनीता धर, गिल्ड फोर सर्विस से मीरा खन्ना, वकील और एक्टिविस्ट आभा सिंघल जोशी, हेल्पेज इंडिया और सुलभ इंटरनेशनल से नामित एक- एक सदस्य और सुप्रीम कोर्ट की वकील अपराजिता सिंह को शामिल किया है. देशभर की विधवाओं के हालात पर क्या कदम उठाए गए, इस पर जवाब ना देने पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 राज्यों व एक केंद्र शासित प्रदेश पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए दो-दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. इनमें उतराखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, मिजोरम, असम, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडू और अरूणाचल प्रदेश के अलावा केंद्रशासित दादर व नगर हवेली शामिल हैं. जस्टिस मदन बी लोकुर की बेंच ने विधवाओं के लिए उठाए गए कल्याणकारी कदम पर केंद्र सरकार को रिपोर्ट ना देने पर ये जुर्माना लगाया है. अब इसपर आगे 30 जनवरी को सुनवाई होगी.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी ने अपने प्रारंभिक अध्ययन में पाया है कि देश में विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय है. कुछ राज्य सरकारों ने विधवा पुनर्विवाह योजनाएं बनाई हैं लेकिन नाममात्र की प्रोत्साहन राशि का प्रावधान किया है और उसका भी समुचित प्रचार -प्रसार नहीं किया जाता है. कुछ राज्य सरकारें विधवा पेंशन के नाम पर 150 से 200 रूपए तो कुछ शर्तों के साथ 500 रूपए मासिक पेंशन दे रही हैं और वह भी पूरी तरह निराश्रित और आयविहीन विधवाओं को दी जा रही है जो मातृ शक्ति का अपमान है.
असल में हिंदू समाज विधवाओं को लेकर हीन भावना से ग्रस्त है. विधवाओं को उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है. सरकार को विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए केन्द्रीय प्रोत्साहन नीति बनाकर इस हीन भावना को दूर करना चाहिए. हिंदुओं में कथित ऊंची जातियों ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के अलावा अन्य श्रमजीवी जातियों में हमेशा से तलाक, पुनर्विवाह, विधवा विवाह की प्रथाएं प्रचलित हैं लेकिन कथित ऊंची जातियों में इसे हीन दृष्टि से देखा जाता है. हालांकि कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं और उदारवादी लोगों के नजरिए के कारण समाज में बदलाव की शुरुआत हुई है लेकिन इसे अभी सरकारी प्रोत्साहन की जरूरत है जो न के बराबर है. वर्तमान सामाजिक परिदृश्य के कारण बहुत कम युवा विधवाओं के विवाह होते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि केन्द्र और राज्य सरकारों को विधवा विवाह को बढ़ावा देना चाहिए. इस समय विधवा विवाह की कोई केन्द्रीय सरकारी योजना नहीं है. जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 2001-2011 के बीच देश में विधवाओं की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है. 2001 में देश में विधवाओं की संख्या 18 लाख 50 हजार थी यानि कुल जनसंख्या का 0.7 प्रतिशत, जो 2011 में बढ़कर 5 करोड़ 60 लाख हो गई, यानि कुल जनसंख्या का 4.6 प्रतिशत विधवाएं एकाकी जीवन जी रही हैं. विश्व में भारत में सबसे अधिक विधवाएं हैं. भारत के बाद चीन का नंबर है. भारत में कुल विधवाओं का 0.45 प्रतिशत 10-19 आयु वर्ग में हैं, 9 प्रतिशत 20-39 आयु वर्ग में हैं, 32 प्रतिशत 40-59 आयु वर्ग में हैं और 58 प्रतिशत 60 वर्ष से ऊपर हैं. देश में बाल विवाह पर रोक है लेकिन इसके बावजूद 2011 की जनसंख्या के अनुसार देश में 1,94,000 बाल विधवाएं हैं.
हिमाचल प्रदेश में विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहन योजना पिछले कई वर्षों से लागू है लेकिन उस योजना में प्रोत्साहन राशि केवल 25000 रूपए थी जिसमें से 10 हजार रूपए नकद शादी के वक्त और 15 हजार रूपए पति-पत्नी के संयुक्त खाते में 5 वर्ष की सावधि जमा योजना में निवेश किया जाता था. अब इस राशि को दुगना कर दिया गया है. महिला और बाल विकास विभाग द्वारा शुरू की गई विधना पुनर्विवाह योजना का मुख्य उद्देश्य विधवाओं के पुन:-विवाह में मदद करना है तथा विधवाओं के साथ पुनर्विवाह करने के लिए पुरुषों को प्रोत्साहित करना है. सरकार ने अब विधवा पुनर्विवाह योजना के तहत दी जाने वाली अनुदान राशि को 25 हजार रुपए से बढ़ाकर 50 हजार रुपए कर दिया है और उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 188 लाख रुपए खर्च कर 432 विधवाओं को अब तक इस योजना का लाभ भी दिया जा चुका है. इसके अतिरिक्त मदर टैरेसा असहाय मातृ संबल योजना के अंतर्गत दी जाने वाली राशि को भी बढ़ाया है और पिछले पांच वर्षों के दौरान प्रदेश की करीब 78,847 महिलाएं लाभान्वित हुई हैं. लेकिन विधवा और एकल महिलाओं के लिए कल्याण को नाम पर जो पेंशन योजना चलाई जा रही है उससे किसी का जीवन यापन करना बेहद मुश्किल है. सरकार की इस विधवा और एकल महिलाओं की पेंशन योजना के मुताबिक पेंशन पाने को लिए आयु 45 वर्ष से अधिक होनी चाहिए और किसी दूसरे स्त्रोत से महिला की वार्षिक आय 9000 और परिवार की वार्षिक आय 15000 से अधिक नहीं होनी चाहिए. इस योजना के तहत केवल 500 रूपए प्रतिमाह पेंशन का प्रावधान किया गया है जो ऐसी महिलाओं के साथ सरकार का भद्दा मजाक है. सरकार मानती है कि 500 रूपए प्रतिमाह से विधवा, एकल या परित्यक्ता महिला महीने भर रोटी, कपड़ा और मकान का इंतजाम कर सकती है. ऐसी महिलाओं के लिए कम से कम 2500 रूपए मासिक पेंशन का प्रावधान होना चाहिए और वार्षिक आय कम से कम एक लाख से अधिक न हो. उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में विधवाओं को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन में काफी बढ़ोतरी की है और वार्षिक आय को भी दो लाख तक बढ़ा दिया है. मध्य प्रदेश सरकार ने भी इसी वर्ष विधवा पुनर्विवाह योजना को बढ़ावा देने के लिए 45 वर्ष आयु तक की विधवा महिला से शादी करने पर 2 लाख रूपए प्रोत्साहन राशि का ऐलान किया है लेकिन अभी यह योजना पूर्णत: लागू नहीं हो पाई है.

विजय शर्मा

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