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विधान सभाओं में आखिर कैसे बढ़ेगा महिला विधायकों का प्रतिनिधित्व!

आधी आबादी महिलाओं की है. देश में भी और प्रदेशों में भी कमोवेश यही स्थिति है. यदि महिलाएं देश की आबादी का आधा हिस्सा हैं तो राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है? इस सवाल का जवाब हमारे किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है. आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद आज भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पाई है. महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं लेकिन राजनीतिक पार्टियां उन्हें अपने वरिष्ठ नेताओं को फूलमालाएं पहनाने, गुलदस्ते भेंट करने और नारे लगाने तक सीमित रखती हैं. राजनीतिक हिस्सेदारी के मामले में सभी पार्टियों का रवैया लगभग एक जैसा होता है. विधान सभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है इसलिए पार्टियों का तर्क होता कि सरकार बनाने के लिए जिताऊ उम्मीदवारों को टिकट दिया जाता है. स्थानीय स्तर पर जहां पार्टियों को लगता है कि उनकी किसी महिला कार्यकर्ता तथा परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि है और वह सीट जीत सकती है तो पार्टी टिकट देती है. लेकिन पार्टियां इस आधार पर टिकट नहीं देती कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है और उसे बढ़ाने की जरूरत है. आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 12 प्रतिशत ही है. विधान सभाओं और लोकसभा तथा राज्य सभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए 1996 में देवेगौड़ा सरकार के समय बिल लाया गया था, जो 22 वर्षों के बाद भी लंबित है और अभी ऐसी कोई उम्मीद नहीं है कि अगले कुछ वर्षों में भी यह पास होकर कानून के रूप ले सके.
नवम्बर में सम्पन्न होने वाले विधानसभा के चुनावों में भी स्थिति में कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है. कहा जा रहा है कि इस बार टिकट वितरण के लिए जब हिमाचल भाजपा की केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक सम्पन्न हुई और टिकटों का सूची को अंतिम रूप देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिखाया गया तो महिलाओं को कम प्रतिनिधित्व देने पर उन्हें हैरानी हुई और उन्होंने महिलाओं और युवाओं को अधिक टिकट देने का निर्देश दिया, तब जाकर भाजपा ने 6 महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है.
हिमाचल विधानसभा चुनाव के लिए दो बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के टिकट वितरित हो चुके हैं. भाजपा ने 6 महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है. इनमें इंदौरा की आरक्षित सीट से रीता धीमान, रोहरू की आरक्षित सीट से शशि बाला, भोरंज की आरक्षित सीट से कमलेश कुमारी, शाहपुर से सरवीन चौधरी, पालमपुर से इंदू गोस्वामी और कसुम्पटी से वीरभद्र सिंह की रिश्तेदार विजय ज्योति सैन को उम्मीदवार बनाया गया है. कांग्रेस विपल्व ठाकुर को देहरा और आशा कुमारी को डलहौजी से उम्मीदवार घोषित कर चुकी है लेकिन पार्टी अभी ठियोग और मंडी समेत तीन से चार और सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतार सकती है. कमोवेश दोनों ही बड़ी पार्टियों की स्थिति एक-जैसी रहने वाली है. कुल्लू, बिलासपुर और किन्नौर जिलों से आज तक कोई महिला विधायक नहीं चुनी गई है. अब तक प्रदेश विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी 10 प्रतिशत से भी कम रही है. पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने वाले प्रदेश की विधानसभा में अब तक केवल 39 महिला विधायक ही विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो पाई हैं. वर्ष 1972 से 2012 तक हिमाचल में 174 महिलाओं ने विधानसभा चुनाव लड़ा है लेकिन सफलता केवल 39 को ही मिली है. हैरानी की बात यह है कि पिछले कई विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेश में पुरुषों के मुकाबले महिला मतदाताओं की संख्या अधिक रही है और इस बार भी महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के लगभग बराबर ही है और इस लिहाज से तो महिलाएं 50 प्रतिशत की हकदार हैं लेकिन 50 प्रतिशत न सही, बड़ी राजनैतिक पार्टियों को स्वयं आगे आकर महिलाओं को कम से कम 30 प्रतिशत सीटों अवश्य ही टिकट आबंटित करने चाहिए. मतदाताओं और जनसंख्या के अनुपात में उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम है.
महिला अधिकार संगठनों के गठबंधन, “द नैशनल अलायंस फॉर द वुमन रिजर्वेशन बिल” के शोध के मुताबिक हाल ही में जिन पांच राज्यों पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वहां महज 6 फीसदी महिला उम्मीदवारों को ही चुनाव लड़ने का मौका मिला है. लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की उम्मीदवारी को मजबूत आधार देने वाला महिला आरक्षण विधेयक अब तक कोई भी सरकार पारित नहीं करवा सकी है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी संसद के दोनों सदनों में कुल 12 फीसदी है. वर्ष 2010 में संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीट आरक्षित करने वाला विधेयक उच्च सदन द्वारा पारित किया गया था. लेकिन निचले सदन यानि लोकसभा में यह अब तक चर्चा के लिए भी पेश नहीं किया जा सका है. विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी इसके पड़ोसी देशों से भी कम है. पाकिस्तान में महिलाओं की भागीदारी करीब 21 फीसदी, अफगानिस्तान में 28 फीसदी, नेपाल में 30 फीसदी और बांग्लादेश में 20 फीसदी है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में यदि महिलाओं की भागीदारी इसी तरह से कम रही तो लिंग असंतुलन को पाटने में 50 वर्ष से अधिक लगेंगे. हालांकि एक उम्मीद की किरण यह है कि महिलाएं जागरूक हुई हैं और अपने मताधिकार का अधिक इस्तेमाल करने लगी हैं.
पंचायतों और नगर निकायों के मामले में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसका सीधा सा कारण है कि कई राज्यों में पंचायतों और नगर निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई है जिसका कारण पंचायतों और नगर निकायों में 12.7 लाख महिला प्रतिनिधि अपना दायित्व निभा रही हैं और पंचायतों और नगर निकायों में इनकी संख्या 43.56 प्रतिशत हो गई है.
वर्ष 1998 में सबसे ज्यादा 6 महिलाएं चुनकर विधानसभा पहुंची थीं. वहीं वर्ष 2003 में वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में 5 महिलाओं ने जीत हासिल की थी. वर्ष 2012 में भाजपा व कांग्रेस ने एक दर्जन महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा था, लेकिन 3 महिलाएं ही चुनाव जीत पाईं थी. ठियोग से विद्या स्टोक्स, डल्हौजी से आशा कुमारी तथा शाहपुर से सरवीण चौधरी ही जीत पाईं थी. विद्या स्टोक्स, आशा कुमारी तथा सरवीण चौधरी तीनों ही मंत्री रह चुकी हैं. विद्या स्टोक्स तथा आशा कुमारी कांग्रेस सरकार में मंत्री रही हैं और सरवीण चौधरी भाजपा सरकार में मंत्री थी. अब तक ज्यादातर बड़े एवं धनी परिवारों की महिलाएं ही राजनीति में अपनी जगह बना पाई हैं और कांग्रेस की सरकार ज्यादा समय रही है और इसलिए कांग्रेस में महिलाओं को ज्यादा मौका मिला है.
हिमाचल प्रदेश में 1952 से लेकर 1971 तक कोई भी महिला मंत्री नहीं रही हैं. वर्ष 1972 में सरला शर्मा और 1977 में श्यामा शर्मा को मंत्री बनाया गया था. 1995 में कांग्रेस की सरकार बनने पर आशा कुमारी और विप्लव ठाकुर को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था. साल 1998 में उर्मिल ठाकुर को भाजपा की सरकार में संसदीय सचिव बनाया गया था. अनीता वर्मा को भी कांग्रेस की सरकार में संसदीय सचिव बनाया गया था. वर्ष 2003 में कांग्रेस सरकार में पहली बार तीन महिलाओं विद्या स्टोक्स, आशा कुमारी और चंद्रेश कुमारी को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था. वर्ष 2007 में धूमल सरकार में सरवीन चौधरी को मंत्रिमंडल में जगह मिली थी. 1952 में तीन महिलाएं प्रदेश से लोकसभा पहुंची थी. राजकुमारी अमृत कौर महासू मंडी सीट से चुनाव जीती थी और उन्हें केंद्र में स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था. चंद्रेश कुमारी वर्ष 1984 में कांगड़ा से लोकसभा पहुंची थी. प्रतिभा सिंह मंडी से दो बार लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद रह चुकी हैं. प्रतिभा सिंह वीरभद्र सिंह की पत्नी हैं. लीला देवी महाजन 1956 से 62 तक पहली महिला राज्यसभा सदस्य रहीं हैं. सत्यावती डांग, महेंद्र कौर, उषा मल्होत्रा, चंद्रेश कुमारी, विप्लव ठाकुर और विमला कश्यप हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा पहुंची हैं.
प्रदेश की 68 विधानसभा सीटों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरूष मतदाताओं के लगभग बराबर है. पिछले चार विधानसभा चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरूषों से अधिक रही है. प्रदेश सरकार ने पंचायतों और नगर निकाय में 50 फीसदी सीटें आरक्षित की हैं. सहकारी संस्थानों में भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है. लेकिन विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए निश्चित आरक्षण की व्यवस्था नहीं है इसलिए पार्टियों का ध्यान महिलाओं को अधिक भागीदारी देने की बजाय सीटें जीतने पर होता है. चुनाव आयोग के अनुसार हिमाचल में कुल 49.13 लाख वोटर हैं. 15 सितम्बर तक 24,98,173 पुरूष हैं और 24,07,503 महिला मतदाता थे लेकिन उसके बाद करीब 8 हजार नए मतदाता जुड़े हैं. सरकार चुनने में महिलाओं का अहम रोल है. प्रदेश की साक्षरता दर 83 फीसदी है और 76 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं लेकिन बावजूद इसके बड़ी पार्टियां महिलाओं की दावेदारी को दरकिनार करती रही हैं जिसके कारण विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम रहा है. चुनाव लड़ना अब बेहद खर्चीला हो गया है, इसलिए आम पृष्ठभूमि की महिला आजाद उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकती और हिमाचल में आजाद उम्मीदवार को उतनी तरजीह नहीं दी जाती और अब तक जो आजाद उम्मीदवार जीते भी हैं, उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि रही है और वह पार्टियों से सम्बद्ध रहे हैं लेकिन पार्टी का टिकट न मिलने पर बागी प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े हैं.
हालांकि चुनाव आयोग ने महिलाओं को वोटिंग के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से इस बार प्रदेश के 68 विधानसभा क्षेत्रों में 136 पोलिंग स्टेशनों पर महिलाओं पर वोटिंग करवाने से लेकर सुरक्षा तक का जिम्मा सौंपा है. हर विधानसभा क्षेत्र में ऐसे दो-दो मॉडल केन्द्र बनाये गये हैं. इससे महिलाएं वोट देने के लिए तो प्रेरित होंगी लेकिन विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व पार्टियों के समुचित टिकट वितरण से ही बढ़ेगा.

सोनिया चोपड़ा

 

 

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