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विश्व एड्स दिवस, 1 दिसंबर : एड्स के नए मरीजों में 26 फीसद की कमी

कभी विश्व में कोहराम मचा देने वाली बीमारी एड्स अब काबू में है। पिछले एक दशक के आकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे की पीड़ितों को मौत के अगास में सुलाने वाली यह महामारी धीरे ही सही मगर अब पकड़ में आ गई है। विश्व स्तर पर चेतना और जागरूकता के कारण इस पर विजय हासिल की जा सकी। मगर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि एड्स हमारे पूरी तरह नियंत्रण में आगया है। भारत अभी अभी विश्व के उन पांच देशों में शुमार है जहाँ एड्स का प्रभाव सर्वाधिक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार 2030 तक एड्स को जड़ मूल से समाप्त कर दिया जायेगा।
एड्स मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु ( एच.आई.वी ) से होता है जो मानव की प्राकृतिक प्रतिरोधी क्षमता को कमजोर करने के साथ साथ शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता पर आक्रमण करता है। जिसका काम शरीर को विभिन्न संक्रामक बीमारियों से बचाना होता है। एच.आई.वी. रक्त में उपस्थित प्रतिरोधी पदार्थ लसीका-कोशो पर हमला करता है। ये पदार्थ मानव को जीवाणु और विषाणु जनित बीमारियों से बचाते हैं और शरीर की रक्षा करते हैं। जब एच.आई.वी. द्वारा आक्रमण करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षय होने लगती है तो इस सुरक्षा कवच के बिना एड्स पीड़ित लोग भयानक बीमारियों क्षय रोग और कैंसर आदि से पीड़ित हो जाते हैं और शरीर को सर्दी जुकाम, फुफ्फुस प्रदाह इत्यादि घेर लेते हैं। जब क्षय और कर्क रोग शरीर को घेर लेते हैं तो उनका इलाज करना कठिन हो जाता है और मरीज की मृत्यु भी हो सकती है।
पूरे विश्व में फैल चुकी है इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 1 दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को एड्स की खतरनाक बीमारी के प्रति जागरूक करने के साथ एड्स के लक्षण, बचाव, उपचार, कारण आदि के बारे में जानकारी दी जाती है जिससे इस महामारी को जड़ से खत्म करने के प्रयास किए जा सकें। साथ ही एचआईवी एड्स से ग्रसित लोगों की मदद की जा सकें। एड्स एक खतरनाक बीमारी है, मूलतः असुरक्षित यौन संबंध बनाने से एड्स के जीवाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इस बीमारी का काफी देर बाद पता चलता है और मरीज भी एचआईवी टेस्ट के प्रति सजग नहीं रहते, इसलिए अन्य बीमारी का भ्रम बना रहता है। एड्स उन्मूलन के लिए अभियान चलाने वाले संगठनों की मानें तो पिछले दशक में हर साल बाईस लाख लोग एड्स की चपेट में आकर दम तोड़ रहे थे, पर अब यह संख्या घट कर 13 लाख रह गई है। वर्ष 1997 की तुलना में एड्स के नए मरीजों की संख्या में 26 फीसद की कमी आई है। कहा जा रहा है कि यदि इस गति से एड्स नियंत्रण पर काम चलता रहा तो दुनिया जल्दी ही एड्स-मुक्त हो जाएगी।
1980 में इस महामारी के शुरू होने के बाद से अब तक इससे करीब 3.5 करोड़ लोगों की मौत हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि 2016 में एड्स ने करीब 10 लाख लोगों की जान ली। यूएएआईडीएस वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया 2016 में एचआईवी ग्रस्त 3.67 करोड़ लोगों में से 1.95 करोड़ लोग इसका उपचार ले रहे हैं। विकासशील देशों में 52 लाख से ज्यादा लोग एड्स वायरस के खतरनाक प्रभाव को खत्म करने वाली जरूरी दवाओं का सेवन करते हैं। जबकि 1.48 करोड़ से ज्यादा लोगों को इनकी जरूरत है। एड्स से जुड़ी मौतों का आंकड़ा 2005 में जहां 19 लाख था वह 2016 में घटकर 10 लाख हो गया है। रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2016 में संक्रमण के 18 लाख नये मामले सामने आये जो 1997 में दर्ज 35 लाख मामलों के मुकाबले लगभग आधे हैं। भारत में 21 लाख से अधिक एड्स पीड़ित हैं। इनमें अधिकांश रोगी निम्नवर्ग के हैं।
भारत में यह बीमारी असुरक्षित यौन संबंधों के कारण फैल रही है, इसका प्रतिशत 85 है। आंकड़ें बताते हैं कि भारत में 8,68,000 फीमेल सेक्स वर्कर हैं । जिनमें से 2.8 प्रतिशत एचआईवी के साथ जी रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2005 से 2013 के बीच एड्स से हुई मौतों की संख्या में करीब 38 प्रतिशत की गिरावट आई है । इसकी वजह उपचार के साधनों का विस्तार माना जाता है। भारत के सक्रिय पहल से इस संक्रमण की दर विश्व की औसत गिरावट दर से कम हुई है। एक सरकारी रपट के अनुसार वैश्विक औसत गिरावट की दर 35 प्रतिशत है जबकि भारत में यह गिरावट दर 67 प्रतिशत है। एड्स के ज्यादातर मामले पूर्वोत्तर के राज्यों और दक्षिण के राज्यों में हैं। भारत में एड्स की प्रमुख वजह है प्रवासी श्रमिक और दूसरे देशों में जानेवाले नौकरीपेशा लोग, असुरक्षित यौन संबंध और असुरक्षित रक्तदान अनुसार । भारत में घर से दूर और लम्बी दूरी के गाड़ियों के ड्राइवर इसे तेजी से फैलाने का काम कर रहे हैं।
एचआईवी को लेकर एक चैंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया है कि विश्व में एचआईवी से पीड़ित होने वालों में सबसे अधिक संख्या किशोरों की है। यह संख्या 20 लाख से ऊपर है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2000 से अब तक किशोरों के एड्स से पीड़ित होने के मामलों में तीन गुना इजाफा हुआ है जो कि चिन्ता का विषय है। ये चिन्ता तब और भी बढ़ जाती है जब ये जानने को मिलता है कि एड्स से पीड़ित दस लाख से अधिक किशोर सिर्फ छह देशों में रह रहे हैं और भारत उनमें एक है। शेष पाँच देश दक्षिण अफ्रीका, नाईजीरिया, केन्या, मोजांबिक और तंजानिया हैं। कई लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि यह किस तरह फैलती है और इससे बचने के लिए क्या उपाय करना चाहिए। एड्स हाथ मिलाने, गले लगने, छूने, छींकने से नहीं फैलता. इससे बचने के लिए जरूरी है कि लोग इस बीमारी के प्रति जागरूक हों। अगर एचआईवी पॉजिटिव हो, तो दवा लें, और अपना और अपने साथी का खास ख्याल रखें। एड्स एक लाइलाज बीमारी है और इससे बचाव ही इसका एकमात्र उपचार है। हालांकि पिछले कुछ सालों से वैज्ञानिकों ने इस बीमारी का इलाज ढूंढने की कोशिश की है पर उन्हें बड़े स्तर पर सफलता नहीं मिल पाई है। अब हमारे सामने एक ही रास्ता बचता है वह है बचाव का रास्ता जो बिना सही जानकारी के संभव नहीं है। असल में अशिक्षा व जागरुकता के अभाव की वजह से लोगों के बीच भेदभाव विकराल रूप लेता चला जा रहा है। ऐसे में हमारे सामने सिर्फ एक उपाय बचता है कि हम सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों की सहायता से एड्स की स्वयं सही जानकारी लें व लोगों को भी एड्स की सही जानकारी से रूबरू कराएं।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
9414441218

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